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विदरोह के सुर_Vidroh Ke Sur


रामू ह रिक्सा चलावय। वोकर एकलौता बेटा ह तीर के सरकारी स्कूल म पढ़य। रामू सोचय के वोकर लइका पढ़-लिख के कुछ बन जाय। इसी सोच के मास्टर के लइकामन ल कभु-कभु अपन रिक्सा म बइठा के फोकट म किंजार देवय।

सांझकुर जब रामू घर लहुटिस त देखिस के वोकर बेटा रोवत रिहिस। पूछिस त बताइस के मास्टरजी ह आज वोला छड़ी से अब्बड़ पीटे हावय। रामू ह पूछिस - तेहां कांही गलती करे होबे? 
ल्इका ह सिसकत बोलिस - कोनो लइका ह मास्टरजी के टेबल म मेचका ल रख दे रिहिस अउ वोकर नांव ले दीस। तहां ले मास्टरजी ह मारिस।
श्रामू ह लइका ल पोटार लीस अउ कहिस - मार के डर ले पढ़ई-लिखई ल छोड़ देबे का रे? तुहूं ल मोर जइसे रिक्सा चलाय बर हे का? हमर समे म तो हमनल मास्टर ह अब्बड़ मारंय। मार के डर ले पढ़ई-लिखई छोड़ देंव, स्कूल ल तियाग देंव, तेकर सेती आज रिक्सा खिंचत हंव। बिहनिया वोहा रिक्सा निकालिस अउ जइसे सड़क म आइस त देखिस के मास्टर के लइका ह हुत करावत रिहिस। ये रिक्सा, चल मोला स्कूल पहुंचा दे। राहू ह मास्टर के लइका राजू डाहर देखिस, फेर रिक्सा ल नइ रोकिस। वोहा आज सुरूआत कोनो गरीब से करे बर चाहत रिहिस। वोला इहु सुरता आगिस के मास्टरजी ह वोकर लइका ल बिना कोनो गलती के पीटे रिहिस। वोहा तेज चलावत रिक्सा ल आगू बढ़ादीस। राजू ह रिक्सा वाले ल भद्दा-गंदा गारी दीस। फेर रामू के पांव रिक्सा के पैडल उप्पर जल्दी-जल्दी चलत गीस, चलत गीस। 

महेश राजा

दुख के दधिजि _ Dukh ke Dadhiji


आजादी के दिन माने पदं्रह अगस्त। पंद्रह अगस्त के के तिहार ह घुटरू मंडल बर सबले बड़का तिहार होय। पंद्रह अगस्त के दिन वोकर मन के उत्छाह ह देखते बने। बड़े बिहनिया ले वोहा खादी के धोती-कुरता पहिर के तियार हो जाय अउ हाथ म तिरंगा झंड़ा धर के स्कूल पहुंच जाय। जब लइकामन परभात फेरी निकाले, तब उंकर आगू-आगू झंड़ा लेके चलय। वोइसने चलय जइसे सुतंत्रता संग्राम के सेनानी मन के मुखिया बन के अजादी के लड़ई के समे चलय। जब ले वोकर जांगर ह थके लागिस तब ले वोहा स्कूल नइ जाके अपन चांवरा म बइठ के लइकामन ल टुकुर-टुकुर देखत भर राहय। लकामन के चेहरा म खुसी के भाव ल देख के वोला अपन बचपना के दिन ल सुरता करके भीतरे-भीतर वो खुसी ल महसूस करय। वोहा मने-मन लइकामन के भाग ल ये पाय के सहराय कि ये मन सतंन्त्र देस म जनम धरे हे।
सुतंत्रता ह कोन ल पियारा नइ होय। मनखे का, चराचर के सबो जीव-जंतु, पसु-पक्छी मन घलो सुतंत्रता चाहथे। परबस जीना कोन ल बने लागही। परतंत्रता म जीना तो नरक बरोबर होथे।इही भाव म तो घुटरू मंडल ह अपन जिनगी ल होम दिस।
घुटरू मंडल ह आज हमर बीच म नइ रही गे हे। रहिगे हे त सिरिफ वोकर सुरता। जियत म कोनो काकरों सुरता नइ करय। मर जाय के बाद वोहा सबसे के सुरता म बस जाथे। इही ह संसार के नियम होगे हे। मनखे मन जियत म बाप ल पसिया बर नइ पूछे अउ मरे के बाद दूसर ल पितर भात खवाथे अउ वोला पानी देथे।
हप्ता भर पहिल ले गांव म मुनादी होगे हे, येसो के पंद्रह अगस्त के दिन घुटरू मंडल ल गजब सुरता करे जाही। सरकार डहर ले फरमान आय हे, इहां के हाईस्कूल के नांव ह अब घुटरू मंडल माने ‘पोसन साव’ के नांव म करे जाही। अब येहा सरकारीहाईस्कूल नइ कहा के -सुवरगी पोसन साव’ हाई स्कूल कहाही अउ गौरव पाही। काबर कि पोसन साव ह ये गांव के गौरव रहिस। सुतंत्रता संग्राम के सेनानी रहिस। इही पाय के ये अतराब के बिधायक ह सरकार के प्रतिनिधि बन के गांव म आही अउ घुटरू मंडल के मुरति के इस्थापना करही। वोकर सुरता म गजब अकन घोसना तको करही, येमा गांव के इस्कूल के नामकरन तको हे।
सुरता! टाज ले साल भर पहिली के बात आय। पंद्रह अगस्त के दिन झमाझम पानी बरसत रहिस। घुटरू मंडल अपन चांवरा म ढेरा आंटत बइठे राहय। जइसे-जइसे वोकर ढेरा घुमे, वोइसने-वोइसने वोकर अंतस म बिचार ह घलो घुमे। जब वोहा बिचार म जादा गहरी म चल दे, तब वोकर आंखी ले टप-टप आंसू टपकय। वोहा अपन आंखी म आय आंसू ल धोती के कोर म पोंछ लेवे अउ फेर ढेरा ल घुमाये। पर बस मनखे ह आंसू बोहाय ले जादा अउ का कर सकथे।
गांव के सियान मन कहिथे, घुटरू मंडल ह आजादी के लड़ई लड़े हे। अजादी के लड़ई म वोहा अपन सरबस लगा दिस। एक जमाना म घुटरू मंडल ह गांव के संबो ले बड़हर किसान रहिस। वोकर तीर बीस-पचीस एकड़ धनहा अउ पचास ठन गाया-गरूवा के एक पाहट रहिस। वोहा अपने सबो संपति ल देस के अजादी खातिर उरका डारिस। आज उही घुटरू मंडल ह पर-भरासी होगे ये कहे जाय, वोहा अब बिन पूछन्ता के होगे हे। दूसर तो दूसर अपनो मन बर अनपूछन्ता होगे हे। वोहा अपन लइकामन बर तो बैरी बरोबर होगे हे। कहे गे हे, अपन बैरी, पुर हित। ये बात ह घुटरू मंडल के जिनगी म चरितार्थ दिखथे।
आज के लइकामन बर घुटरू मंडल के जिनगी ह कहिनी बरोबर लागथे। वोकर जीवन चरित ल सुन के अइसे लागथे, का ये दुनिया म अइसनो परमारथी मनखे होथे जउन परहित बर अपन सरबस लुटा देथे? मन म अइसने अउ गजब अकन सुवाल उपजथे, त कभु मन म एक पीरा, संवेदना अउ खुसी के भाग घलो बनथे।
संसार म कई किसम के मनखे हाथे। कोनो अपन बर जिथे, तब कोनो परमारथ बर। अपन बर तो सबसे जिथे फरे परमारथ बर जियइया मनखे तो लाखों म एक होथे। घुटरू मंडल परमारथ बर जियइया मनखे रहिस। वोहा अपन जिनगी म पर पीरा ल अपन पीरा के रूप् म जानिस दूसर के दुख में दुखी होना अउ दुसर के सुख में सुखी होना वोकर जीवन के ध्येय हो गे रहिस।
गांव के जुन्ना सियान मन जब घुटरू मंडल के बारे म बताथें, तब आंखी ले आंसू निथर जाथे। वोहा सही अरथ म ये जुग के दधिचि आय, जउन अपन रीड़ के हाड़ा ल दान कर दिस। सियान मन कहिथे, जब देस हर सुतंत्र होइस, तब छोटे-बड़े गजब अकर मनखे मन पदवी पाय बर भागा-दउड़ा करिन। अपन आप ल नेता कहाये बर चुनाव लड़ीन। सुतंत्रता संग्राम सेनानी कहाये बर अपन नाम लिखाइन, कागद-पत्तर सकेलिन, फेर घुटरू मंडल ह ये उदीम ले अपन ल अगल राखिस। वोकर कहना राहय, हम देस के सेवा बर जउन करने वोकर का हम मेहनताना लेबोन? एक जनम का दस जनम लेबोन, तभो ले माटी के करजा ल नइ उतार सकन। अपन सुअभिमान के खातिर बर वोहा सुतंत्रता संग्राम सेनानी मन ल मिलइया पेंसन ल घलो ठोकर मार दिस अउ अपन आखिर समे तक काकरो आगू हाथ फैलाइस।
अजादी के दिन स्कूल गराउंड म पंडाल तना गे। बिहनिया आठ बजत ले गांव भर के लइका-सियान सबो जुरियागे। गांव बर तो आज बड़का तिहार हो गे रहिस। लइका-सियान सब के मन म एक नवा उत्साह रहिस कि घूटरू मंडल के जिनगी भर के तपस्य ह आज मान पाही।
अतराब के बिधायक ह जब आइस, तब सबले वोहा पहिली झंड़ा फहराइस। पोसन साव के मुरति के अनावरन करिस। अब सरकारी स्कूल होगे। सरकारी फरमान आगे जउन घर म स्व. पोसन साव ह अपन जिनगी के आखिरी सांस गिनिस, वो घर ल इस्मारक बनाय जाही अउ उहां घुटरू मंडल के जिनगी के कहिनी ल दरसाय जाही। ये बात ल सुन के गांव के मनखे मन के छाती है दू गज हो गे। घुटरू मंडल के मुरति ल देखके अइसे लागथे मानो सुतंत्र देस के पहली मनखे उही ह आय।

बलदाऊ राम साहू

पगली - छत्तीसगढ़ी कहानी _ Chhattisgarhi Kahani

जब मेहा वो फोटो ल धियान से देंखेव त मोर बिहाव के रिहिस। जेमा मोर, मोर घरवाले अउ वोकर संगवारी बिसाल के फोटो रिहिस। वोहा बिसाल ल अपन घरवाला बतावत रिहिस। मेहा अपन जेठानी ल कहेंव कहीं इही ह तो वोकर घरवाला नोहय? मोर जेठानी हांसत कहिस - पागी के बात ल भला कोनो बिसवास करथे का?

जब वोला मेहा अपन सहर म पहिली बेर देखेंव त वोहा छह-सात महीना के पेट म रिहिस हे। वोहा बस स्टैंड बस मन के पाछू दउड़त दिखय। मेहा वोला अइसन हालत म पहुंचइया ल मने-मन जी-भरकर कोसे रहेंव।
कुछ महीना बाद म मोला पता चलिस के वो पगी माइलोगिन ह सड़क म एकझन बेटी ल जनम दे हावय। सड़क साफ करइया माइलोगिन मन लइका होवाय म मदद करे रिहिन। अइसे समे म घलो पुरूस मन बोटबाय तमासा देखत दूरिहा म खड़े रिहिन। कोनो डॉक्टर ल बलाय, वोला अस्पताल पहुंचाय के नई सोचिन। एकझन जमीदारिन ह इलकरहा गारी दीस त भीड़ लगा के खड़े मनखे मन हटिन नइ जानव फेर वो पगली म अइसन का रिहिस के मेहा वोकर बारे म जाने बर मरे जात रहेंव। वोकर बारे म जाने बर मरे जात रहेंव। वोकर बेट होय के खबर सुनके मेहा देखे बर चल देंव। वोहा अपन बेटी ल दूध पिलाय बर तो दूर, हाथ तक नइ लागवत रिहिस। एकझिन माइलोगिन ह लइका ल वोक कोरा म रखिस त वोला ढकेलदीस। लइका ल थोरकिन लाग घलो गे। ऐला देखके के नइ जानव कइसे मो मुंह ले निकल गे, लानव ये लइका ल मेहा 
पालहंव अउ लइका ल धर के घर आ गेंव। घर पहंचेंव त कोरा म नवजात लइका ल देखके मोर जेठानी ह ताना मारत कहिस-देख ले एक पागली ब दूसर पगली के सहानुभूति के नतीजा ल। जाने ये बला कहां ले उठाके लाने हस?
सर ह देखिस त राम-राम काहत घर भर ल मुंड़ म उठालीस। राम जाने कोन जात के ए? काकर पाप हेध् चल जा जिहां ले लाय हस उहें छोड़के आ। मेहा कहेंव मनखे के संतान हे। कहुं मर जही त देस आपमान ल लगही। बाद म मोर पति रोहन आइस। उहू ह मोर बिरोध करे बर धरलीस। घर भर म कोनो मोर संग दिस तो वो रिहिस मोर पांच बच्छर के बेटा परसांत। वोहा लइका ल देख के बहिनी-बहिनी कहे लागिस।
जम्मो के बिरोध ल सहिके घलो मेहा वोकर देखरेख करे बर धर लेंव। एक दिन अंगना म खड़े रहेंव त उही पगी दिखिस। वोहा कचरा म बइठ के रोटी ,खोजत रिहिस। मोर मन रो डारिस। मेहा वोला इसारा करके बलायेंव अउ गरम-गरम रोटी खाय बर देंव। लोटा म पानी पिये बर देंव त मोर जेठानी ह लोटा ल मोर हाथ ले छिन के कहिस - ये पगली ल पानी पिलाय बर हे त चुल्लू से पिला। मेहा चुप रहिगेंव। मेहा वोला भीतर अंगना म बा के कुंआ ले पानी निकाल के पिलायेंव। वोहा पानी पीके उही मेर बइठ गीस। वोहा बड़ धियान से परछी म लगे एकठिन फोटा ल उतार के मोला कहिस - यही ह मोर घरवाल ए। वोहा मोर हाथ ल पकड़ के खिंचत कहिस - बता मोर घरवाला कहां हे? मेहा डररागेंव। अपन जेठानी ल हुंत कराएंव। वोहा उदड़त आइस सास घलो आ गिस। वोमन मोला पगली ले बड़ मुसकुल ले छोड़ाइन। पगली चलदीस।
घरवाले मन मोर से बात करे बर छोड़दीन। वोमन काहंय ये लइका ल छोड़ के आ। मेहा जानत रहेंव, ये बेदर्द दुनिया म वोकर का हाल होही तेन ल। बेनाम बन के कउन गली म का सजा मिलही तेल ल। मेहा वो लइका के नांव बैसाली रखेंव। एक दिन घर के दरवाजा खुले रिहिस त वो पगली ल खुसरगिस अउ फोटा डाहर अंगरी देखा के जोर-जोर से कहे लगिस - इही मोर घरवाला ए। मेला मोर घरवाला ल देवव।

जब मेहा वो फोटो ल धियान से देखेंव त वो मोर बिहाव के रिहिस। जेमा मोर, मोर घरवाले अउ वोकर संगवारी बिसाल के फोटा रिहिस। वोहा बिसाल अपन घरवाला बतावत रिहिस। मेहा अपन जेठानी ल कहेंव कहीं इही ह तो वोकर घरवाला नोहय? मोर जेठानी हांसत कहिस - पागली के बात ल भला कोनो बिसवास करथे का? 
 अब पगली ह दू-चार दिन म आय बर धरलीस। वो फोटो ल दूरिहा ले देखके चल दय। अब मोला बिसवास होय बर धरलीच के पगली सच काहत हे। मेहा अपन पति ले वोकर संगवारी के बारे म पूछेंव त वोहा कहिस - वोकर दू बछर पहिली बिहाव हो गे हे। वोकर बिहाव के नेवता म हमन नइ जाय सके रहेन। उहू ह पगली के बात ल बिसवास नइ कर सकत रिहिस। 
मेहा जिद करके अपन पति ल वोकर संगवारी घर जाय बर मनाएंव। बिसाल के घर पहुंचेन। संग म परसांत अउ बैसाली घलो रहिस। बैसाली ह सात महीना के होगे रिहिस। उहां पहुंचने त चारोंमुड़ा चहल-पहल  रिहिस। बिसाल के बिहाव होवत रिहिस। बिसाल के हरदी चढ़त रिहिस। दू बछर पहिली बिहाव के नेवता मिले रिहिस, फेर बिहाव अभी कइसे होवत हे, ये बात ल जाने बर मोर मन बेचैन हो गे। आखिर, मेहा पूछेंव, बिसाल भइया आपमन के पाहिली पत्नी कहां हे? मोर बात ल सुनके सबझन थोरकिन अचरज म पड़त कहिन के सुभ काज म ये उटपुटांग सवाल काबर? बिसाल के चेहरा गंभीर होगे। वोहा कुछू बोलतीस वोकर पहिली वोकर दाई ह बोल पड़िस - वो कुलछनी के नांव झन ले। नइ जानन कहां भाग गीस। हमर मन उप्पर आरोप लगिस के दहेज के सेती मार-मार के वोला पागल बना देन। वोहा ते पहिली के पागल रिहिस हे। वोकर दाई-ददा मन हमन उप्पर थोप दे रिहिस। फेर, तेहां काबर वोकर वकालत करत हस? तेहां कउन अस? मोला अब पक्का बिसवास होगे रिहिस के वो पगली ह बिसाल के बिहाता ए।
मेहा तुरते जबलपुर ले रइपुर आ गेंव अउ वो पगली ल खोजे ब लेंव। दू दिन के खोजबीन म वोहा मिलिस फे कोन हालत म? पगली ह मोला लास के रूप मिलिस। मेहा वोकर लइका ल छाती लगाय रो डरेंव। वोकर लास ल लावारिस समढ के मुक्तिधाम वाले मन न जाने मोला का होइस मेहा वो लास ल ‘आसा’ के रूप पहिचान कर देंव। अब आसा के लास वोकर पति के अंगना म रिहिस। सबोझन नवा दुलहिन समेत एक अभागिन के लास ल हक्का-बक्का देखत रिहिन। मेहा कहेंव -बिसाल ये पगली तो पत्नी आसा हे जउन घर ले भागे नइ रिहिस। बल्कि तुमन वोला घर से निकाल दे रहेंव। वोला घर से निकाल दे रहेंव। वोला मार-मार के पागल बना दे रहेंव। वोकर कसुर अतकेच रिहिस के तोर जइसे लालची पति अउ दहेजलोभी सास के मांग के पूरति गरीब के बेटी ह नइ कर सकिस।
मेहा बिसाल ल वोकर बेटी सउंपत कहेंव - ऐला पहिचान, येहा तोर बेटी ए। जब तेहां
 आसा ल घर ले निकाले रहेस त वोहा पेट से रिहिस। अब तहुं ह एकझन बेटी के बाप हस। सायद बेटी मन के दुःख-पीरा  समझ सकबे। वोकर नवा दुलहिन ह नफरत अउ घीन से बिसाल डाहर देखिस अउ अपन मुंह ल फेर लिस।
बिसाल पगली के लास उप्पर गिरके फूट-फूट के रोवत रिहिस। मेहा देखेंव मरे पगली के हाथ उही फोटो जकड़े रिहिस हे।

शैल चन्द्रा,

लोहा ल घुन लागे - Loha La Ghun Lage

एक ठिन गांव म एकझन साधु रहिस। दान-दक्छिना मिलय तेला मोटरी म राखय। साधु ह सोचय ये जिनिस ल कामा राखंव। मोटरी म चोरी-हारी के डर बने राहय। वोहा लोहा के एकठन लउठी बनवाइस। वोकर भीतरी म उठंका जगा राहय। साधु ह सोना के मोहन ल लोहा के लउठी के भीतर रख दीस। रोज एक-एक ठन मोहर ल खोंचे। अइसन जम्मो पइसा ह वोमा समागे।
एक घांव साधु ह सोचथे। कउन जाने जिनगी रिही के जाही? तीरथ बरत घूम आना चाही। इही बिचार करके साधु अपन बिसवास के चेला ल कइथे। चेला, ए, लउठी ल तोर घर म रख देबे। मय तीरथ जावत हंव। जब लहूटहूं, तब मांग लेहूं। 
हव महराज कहिके चेला ह लउठी ल धर के बजात-बजात घर पहुंचगे। साधु तीरथ-बरत चलदीस। एक दिन चेला ह सोचिस- साधु ह ये लउठी ल मोला काबर दीस। लउठी घलो वजनदार हे। वोहा लउठी ल जोर-जोर से पटके लागिस। थोरकिन म सोना के माहर ल बिखर गे। येला देखके चेला ललचागे।
साधु तीरथ-बरत ले लहूट के अपन लउठी ल मांगिस। चेला कहिस - महराज लोहा के लउठी म तो घुन लगगे अउ नंदागे। साधु ह चुप्पे रहिगे। वोहा चेला के लइका ल अपन आसरम म ले आनीस। थोरिन बेरा म चेला ह साधु के आसरम आइस अव अपन लइका के बारे म पूछिस।
साधु ह कहिथे - अरे, का बतांव चेला, तोर लइका ल तो गिधवा उठा के लेगे। चेला ल भरोसा नइ होवय। वोहा फेर पूछिस - साधू महराज लइका ल गिधवा ह कइसे लेग सकत हे?
साधु कहिथे - जइसे लोहा के लउठी ल घुन खागें, वइसने तोर लइका ल गिधवा लेगे। चेला सन्न खा गे। झट ले वोहा गुरू के चरन ल धरलीस। तहां ले दउड़त अपन घर गिस अउ लोहा लउठी ल ले लानिस। साधु ह वोकर लइका ल आसरम ले निकाल के दे दीस। तभे ये बात कहें जाथे - ‘जइसने ले तइसने भिड़े, सुन ले राजा भील, लोहा ल घुन लागे, लइका ल लेगे चील।

डॉ. प्रकाश पतंगीवार

प्रदेश के दूरदसा

अन्ते-तंते के कमाई के पइसा जेकरे घर पलपलाथे तेकरे घर दिल्ली के छापा घलो परत हे। इहां सरकार म गांधीजी के बेदरा बइठे हें ददा हो । न देखब, न सुनव, न बोलब । बड़का-बड़का घपला के खबर अखबार मछपत हे । दूसर दिन मोल-भाव सुरू हो ज़थे । तीसर दिन के जांच जारी हे। कुछ दिन पाछू त्तइहा के बात बइहा करा चल दिस कहुं ल हथकडी-खेडी जेलखाना सजा…जेली नइ होवे। समे कटगे। बादर छटगे। गडूडा पटगे। झंझट
हटगे । ' इति सिरी घपला समरपियामी रेखारझंडे समाप्त बड़का-बड़का साहेब सूभा मन ल छूट हे। उछरत-बोकरत मरत ले खाव । बांच जाहूं त तुम, मरिहवत  तुमा कहुं ल कुछूनइ करना हे। ते पाय के आंखी मूंद के बटोरो । ककरो कोई  डर नइ हे। कहुं कुछु करत हे बोला चमका दवा राजा, मंतरी ल कोई झेपइया नइये। बोमन तो अब चहक गे हे। ऐमन तो चोरहा हे, बोमन अली बबा हे। त्तहू खा हमूं खाबो। जेकर लार टपकत हे उहूमन ल परसाद मिलही । अखबार छपइया भाई मन के कागज कलम लाल लोम देख के उकरो मन के आजीब बंदोबस्त हवे। भाड़खानी के मंगलचरन लिखइया-गत्नहया जय गंगान गाएबर पड़हिंच । मेला, मड़ईं, खेलकूद, कुंभ, परयाग, गांव, सहर, राजधानी घला नवां…नबां होवत हे। धरम-करम, ग्यान-हबन, धुंगिया, मिल…कारखाना, फेक्टरी के चिमनी के पहिया असन छस्तीसगढ़ भरम छा ने है । मंदिर-तीरथ म घंटा झालर शंख बाजत हे। छस्तीसगढिया कतक्रो क्रोढिया, कूंग़-बहरा है, त्तभो ले आज नाहिं त एक दिन कलथहीँचा हमर मुखिया असन  भागमान लाखों… करोडों म एकाध झन होथे बोकर मुहरन ल ओढ के पारटी ह छत्सीसगढ़ म जियत-जागत हे। जउन दिन राज़लीला खतम होहे बो दिन दल, नेता, मंतरी, विधायक, महापौर सब भसक जाहीं। अभेद किला ओदर ज़हीं। बो दिन कमल के फूल म धंधाय भंवरा ह बोकर चिक्वान पांखी ल छेदक्रे उडिया जही। तहां ले जा, जपा, आजमा, भाजपा, नत्नतपा खल्लासा मुखिया बन के सपना तक कहुं नह देखे। सबके सब गोड़ के नाल असन है टोटा के जात ले सबके बोजा गे हे। बोल नइ सके। कल-कारखाना, फेक्टरी, गोदाम के बंधाये-छंदाये लाखों…करोडों …चार झन मिलके गिन देथें । बांचे-ड्डेचे मन बर खराब, सटूटा, नौकरी-चाकरी, ट्रांसफर, नियुक्ति, परमोसन म बिना दुहना के दुहत्त हें। कइसनों करके सरकार के गुजर-बम चलना चाही। चलत है त्तेला चलन दवा थ्रोर-बहोत्त कहुं अइठइया हवे त्तेकरो टोटों के गेरूआ मुखिया के हाथ म बंधाय हे। तुम लाहो घलो नह ले स्रक्रो। कलेचुप खाओ-पियो। गाडी-मोटर मिले है,
घूमौ-फिरो। सभा…ज़लसा म जावत-जावत रहबा हमर ज़य रावत रहबा छस्तीसगढ़ के संस्करीति ल दुनिया भर म तुहों उजागर करिहव पानी म बरा…स्रोहारी चुस्त हवया कोई कहने वाले नइये । अंबिकापुरल बने त बिहार म जिने देतेव ददा हो। कहिये त आधा छस्तीसगढ़ आज के दिन म उही मन हे । छस्तीसगढ़ के एक्रोठन बैक नइ जांचे। बांट…ब्रिराज के सबके खाता खुलल हें। चार…छह छोकरा म दिन दहाड़े लइका छोले के बंदूक देखाक्रे लूट-मार करत है । चोर चिंहार डाकू, दाईं…बहिनी के टोंटा के माला…मुंदरी झटक-मुद्रक करइ सबके बस म नइ हो लिके । लइका-लुका के लहुटव्रनी वसूल करना, वगेपाल्लेड़गा मन के बूता नोहे ददा हो। चोर…चिहार उही मना थाना पुलिस दरोगा उही मना मार-काट, लूटपात बंद नइ हो सके न तो चिता करंय न हम चिता करन होइहै जो सरकार रुचि राखा । है दिल्ली के लाखों…करोडों रुपिया माओवाद ल खतम करे बर अजित हवे । जब तक माओवाद रहहीं, पइसा आवत रिही । अनिवासी छोकरा मन ल पुलिस म एसपीओ बना के, 6- 7 हजार रुपिया तनखा देके होकर विकास करत है हमर सरकारा माओवादी मन संग घलो अनिवासी छोकरा हें । पुलिस संग घलो आदिवासी जवावें। मरने वाला घलो उही, मारने वाले घलो उही। जेबनी हाथ ह डेरी हाथ ल काटत हे… ददा हो। एक समे रिहिस आदिवासी भोला-भाला रहंया लड़हँ-झगरा, सक…सूभा म ककरो टोंटा ल काट के कटाय मुड़ ल थाना म मड़ा देवंय अउ साफ-सीफ बता देवंया आज उंकर हाथ म बंदूक अउ बम थमा देहना आदिवासी धीरे-धीरे मनुखमार होवत हें । पूरा बस्तर म ऐकर आगी लमही काली इंकर वाल-बच्चा घलो इही म
बढ़ही-पलहों अउ  मनुखमार हो जाहीं । पूरा छस्तीसगढ़ ल ये पाप भोगे बर परही।

‘‘बिजली” के घुस्सा (Bijli ke gussa - cg kahani hamarangana)

Image result for lightningराम राम संगी हो! 
आप मन तो जानत हो ह कि क्रोध करे लें बुरा फल मिलथे। एकर एक ठ उदाहरण आप मन के सामने राखत हउ। 
ऐ तब के बात ए जब ‘‘बिजली” और ‘‘तुफान” हमर बीच रहत रिहिन। लेकिन ‘‘बिजली” के घुस्सा ले राजा ह ओला हमर बीच ले नीकाल दीस। 

कहानी

बिजली ह तुफान के बेटी रिहिस। जब कभू बिजली ल कछु बात म घुस्सा आय त ओहर बिजली गिरा के काकरों घर ल काकरो खेत ल अपन आग म जला देय अव वोहर मनखे मन ल भी नी झोड़े अहू ल जला देय। 
जब कभू बिजली इसने करें त ओकर सियान (तुफान) ह गरज-गरज के रोके बर लग जाय। बिजली ह ढीठ रिहिस काकरों बात नइ सुने। ओहर ओकर सियान के बात भी नइ सुने। तुफान के रोज गरज-गरज ओला मनाय के कोशिश करें । एकर गरज-गरज के कारण गांव के मनखे मन के मुड़ी पिराय बर धर दीस। 
तब मुड़ी पिरा ले तंग आके गांव के मनखे मन राजा करा शिकायत ले पहुचिन। राजा ल ओ मन के शिकायत ह सही लागिस। ओहर उद्देज बिजली अउ तुफान ल गांव छोड़ के जाय बर किहिस और जंगल म खेद दिस। 
बिजली ह घुसेली तो रिहिस हे ओहर का मानहि जंगल म घले ओकर घुस्सा ले रूख मन ल जला देय अउ तिर-तखार मन के खेत ल घलो जला देय। 
फेनेच गांव के मनखे मन राजा करा शिकायत ले के पहुंचिन तब राजा बिजली और तुफान ल धरती से बाहर बादर में खेद दीस । 
ओमन अब मनखे मन ल ज्यादा नुकसान नि कर सकें। 
इकर लागिर कथे कि ’’क्रोध के फल बुरा होथे”। 

भारतीय नर्क (Bhartiya nark Kahani Cg - hamar angana)

हमर भारत देश के मे कई ऐसे काम होथे जेला देखके हमर भारत के बारे में सोचना पड़ जाथे।
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एक कहानी ऐसे हि जेला मै बतात हो ........
एक बार एक झन भारतीय मनखे मर के नर्क में पहुंचिस। अउ ओहर देखिस कि कोनो मनखे कोनो देश के नर्क मे जान सकत हे। वोहर गुनिस कि अमेरिकावासियों के नर्क मे जा के देखें, जब वो मनखे ह अमरिकावासियों के नर्क में गिस त मुहटा म एकझन पहरेदार खड़े रहे त ओला पुछिस कि भैया अमरिकावासी ल नर्क में का सजा देथे।
त पहरेदार ह किहिस - पहली तो तोला एक लाईन के चुल्हा म बिठा के करंट देहि। तहा ले खीला के खटिया म सुतये जाथे। तहा ले एक झन राक्षस आके ओकर पीठ म 100 कौर्रा मारथे।
वो मनखे डरागें।
तहा ले वो एक-एक करके सब्बो देश के नर्क में जाके यही सवाल ल करिस त सबों झन यही बताईस तब वो मनखे ह देखिस के सामने कतका झन मनखे एक ठन लाइन मे खड़े हे। अउ मुहटा म लिखाय हे भारतीय नर्क। तहा वो मनखे एक झन ल पुछिस कि भारतीय नर्क क मे का बात जो ऐमा अतका भीड़ जागे। तब ओहर वही बात ल बतिस। तो वो मनखे फेने पुछिस भैया सब नर्क में तो यही सजा हे फेर का बात हे जो अतका भीड़ हे -
त मनखे ह जवाब दिस -
यहा लाइन के चुल्हा हे लेकिन लाइन नी ये।
खिला के खटिया हे लेकिन खिला चोरा के ले गेय हे।
यहा राक्षस भी हे लेकिन ओहर आथे अउ हाजरि देथे अव चल देथे। अउ कभी ओहर मुड़ म होथे त 2-4 कोर्रा मार के चल देथे। 
इकर लागिर यहा ज्यादा भीड़ हे।

गुस्से म कहे बात के कोनो हर्जाना नई होवव (gussa me kahe baat - Kahani Hamar angana)


Image result for wall nailएकझन लड़का ह बहुतेच गुस्सेल रहिस। एक दिन ओकर ददा ह ओला खीला ले भरे एक झोला दीस अउ कहिस कि जब तोला गुस्सा आही तब तेहर घर के कोठ (दीवार) म एकठन खीला ठेंस देबे। पहिली दिन लड़का ह 50 खीला कोठ म ठोक दीस। एक हप्ता म ओहर अपन गुस्सा ल काबू म करे बर सीख गे रिहिस। अब कोठ म खीला ठोकना कम हो गे रिहिस। ओहर कोठ म ठोकाय खीला मन ल देखके सोचिस, अपन गुस्सा ल रोके के इही ह सबसे सरल तरीका हे। धीरे-धीरे वो लड़का ह अपन गुस्सा ल पूरी तरह ले काबू म कर ले रिहिस। ओहर अपन ददा ल ये बात बताइस त ओकर ददा ह सलाह दीस की अब तेहर रोज के एकठीन खीला ल कोठ ले निकालबें। जब लड़का ह सब्बे खीला ल कोठ ल निकाल लीस तब अपन ददा करा पहुंचिस। ददा ह लड़का के हाथ ल पकड़िस अउ कोठ करा लेके कहिस-तेहर बहुत बढ़िया काम करे हस बेटा। फेर वे कोठ के छेदा मन ल देख। अब ये कोठ ह पहिली जइसे नइ होवय। अइसने जब तेहर गुस्सा म काहीं कहिथस तब ककरो दिल म अइसने लगथे। तेहर कतको माफी मांग ले, फेर निशान ह हमेशा रहिथे। ये कहिनी ले हमन ल ये शिक्षा मिलथे कि , गुस्से म कहे बात के कोनो हर्जाना नई होवव, तेकर सेती गुस्सा ल काबू म रखना चाही। 


किसुन साहू

बहुरिया (Bahuriya)

समेरी काकी के नांव गांव म मंथरा काकी के नांव ले जाने जाय। काबर कि, जहां समेरी तहां हेमरी। एखर लागा, वोकर बोहाता। सब के बरोबर खभर राखे। त तो मंथरा अपन पाठ म पाके राहय। फेर घर-बार के थोरिक चिन्ता-फिकर नइ करय। फकत गांव-गोदहीं के चिन्ता डाटे राहय। फलानी के बहु, ते ढेकानी के दमाद, त काखर गरवा, काखर छेरी-बरई अउ रंग-रंग के अमका-ढमका ताय।

कहानी

गांव म एकझन सुकालु नांव के ठेठवार राहय। वोकर एकझिन बेटा रिहिस। बड़ सिधवा-सुजानिक। पढ़ई के बारा पुरिस, ताहन ले तीर के गंवई ले बहुरिया लालिन। बड़ सुग्घर चंदैनी कस बहु के नांव सिमरन रिहिस। जस नाव तस गुन। त ठेठवार पारा म बहुरिया मन के चलती राहय। दूध-दही लेवइया काकी-दाई अउ जहुरिया के बिकट मान-मरजादा करय। तभे तो गांव भर उखर सनमान म कोनहो किसम के टिपा-टिपली नइ बजाय। फकत गुन गावत राहय।
मंथरा काकी के करिया छांव का परिस ठेठवार के घर अउ पारा-परोस म हांव-हांव करई चालू हो गे। साल भर होय नइ होय हे फेर सिमरन के देह गरू नइ होवत हे कहिके गांव भर गोहार परइया मंथरा काकी आय। का नइ केहे होही माइलोगन जात ला, फेर अपन भुला जथय के बहु ह कोनहो दाई के बेंटी आय। नवा बहुरिया मन के तरिया म नहवउ मुसकिल होगे। गांव-गली म निगलंय तभो डरत राहंव के कोनो मंथरा काकी मत उभर जाय। काबर के जेन मिलही तेकर करा दू के चउदह बतइया आय। कोनो नई मिलही त वोकरे सात पुरखा ल नइ चुरो दिस त अपन बाप के बेटी नोहे मंथरा काकी ह। ऐसो के असाड़ म सरलग पनदरही पानी के गिरई अउ झड़ी करई म सबो के जांगर टूट गय तइसे लागय। एक दिन गांव म देखो-देखो होगे। मंथरा काकी के हाथ-पांव जुड़ हेागय। जीभ हर एकंगू निकल गे राहय। आंखी ह बोड़बोटाय, खटिया मं बेसुध परे राहय। कोनो डाक्टर बाबू के दवई अउ गुलूकोज के बाटल हर काट नइ करत रिहिस। तभे सिमरन ला जानबा होइस। त तुरते मंथरा काकी के सुध लेवत, उंकर घर गीस। देखते भर जान डारिस के काकी ल एकंगू लकवा मारे हावय।
सिमरन हर नरस बाई के पढ़ई घला करे रिहिस। अउ डाक्टर तीर साल-दू साल रहिके सीखे घलो रिहिस। डाक्टर के सुजी-पानी देवई अउ गंवई के मरीज के तुरते इलाज करई ल। सिमरन ह गुलूकोज ल तुरंते हेरके हाथ-पांव बढि़या मालिस करें के उदिम करिस, मंथरा कानी के थोरकुन सुध लागिस अउ हुद करइस पानी-पानी।  
सहर के बड़का अस्पताल लेगे बर मंथरा काकी ल सरकारी जीप म बइठइन। फेर सरकारी डरावर ह आने गांव के रिहिस। सांझ कुन गंवई के अस्पताल बंद होईस तहां वोहर अपन गांव चल दे रिहिस। त हिमत करके सिमरन ह डरावर के सीट म चघिस अउ आंगनबाड़ी वाली बहिनी अउ मितानिन ल संग धर के सहर के अस्पताल पहुचीन। डाक्टर मन किहिस बरे करेस बेटी, ते हिम्मत करके अतका दुरिहा अस्पताल ले आनेस। नइ ते काकी के सरीर के लहू ह पानी बरोबर जुड़ होवत रिहिस हावय। लकवा ह बीमारी नोहे, काम-काजी अउ खान-पान के लापरवाही के सेती होथे। खून के दउरा बरोबर सरीर म नइ होवय तेकर सेती कभू-कभार जान घलो चल देथे।
बिहान दिन मंथरा काकी ह बोले-चाले लागिस। अउ सिमरन ले हाथ जोर के माफी मांगत गोहार पर के रोय लागिस। अस्पताल वाला मन घलो डरा गय। फेर सिमरन ह काकी के हिम्मत बढ़इस। अउ पोटार के कहिस- काली हमन गांव जाबो, अब तेहां बने होगे हस। चिन्ता-फिकर के बात नोहे। मंथरा काकी ह सिमरन ल पोटारत कहिथे - तोर असन बहुरिया गांव-घर मं रहि त काबर काखरों तबियत बिगड़ही दाई। काकी हर गांव लहुट के सबोल अपन दुलौहिन बहुरिया के जस के गूनगान करत दिन बिताथउ अउ संझा बेरा अपन बेटी के हाथ के चाय पीये खातिर सिमरन ल सुरता करत वोकर मुहाटि म खच्चित जाथय। गंवई भर कहिथे-सिमरन ह वो जनम के मंथरा के बेटी आय। त मंथरा कहिथे - यहूं जनम म सिमरन मोर मयारूक बेटी आय।

राजा राम रसिक
भिलाई


बंधन अउ सुरक्षा कवच म बहुत बारीक अंतर होते (Bandhan au Surksha Kawach m Bahut Anter hote)


अपन परिवार के लोगनमन के बात-बात म टोकइ ले परेशान होके एकझन लड़का ह घर ल छोड़े बर मन बना लीस। अउ रात के कलेचुप झोला धर के रेलवे स्टेशन डहर निकल गे। रद्दा म गांव के गुरूजी ह ओला देख के रात म झोला धर के जाए के कारण पूछिस। अतका में लड़का ह बताइस कि ओहर घरवाले मन के टोकइ से परेशान होगे हे। ओला एकोकनी आजादी नइ हे। एकरे सेती घर ल छोड़के जात हावव। अतका सुनके गुरूजी ह कहिस- तेहर रात ल इहिंचे बिता गे बिहिनिया चल देबे। लड़का ह सुते बर धरिस त गुरूजी ह ओकर खटिया तीर दोठीन दीया जला दीस। एकठीन दीया ल कांच के बने स्टैंड के तरी रख दीस अउ दूसरे दीया ल अइसने खुल्ला में रखीस। खुल्ला म रखे दीया ह थोकीन बेरा म बुता गे। फेर स्टैंड में रखे दीया ह जलत रिहीस। गुरूजी बोलिस।देख। जोन दीया बंधनमुक्त अउ खुल्ला म रिहीस हे वो ह जल्दी बुता गे। अउ जेन दिया ह सुरक्षा घेरा म हे ओहर अभी ले उजियारा फइलावत हे। ओला हवा-पानी काहीं के डर नइयें। अतका सुन के लड़का ल अपन गलती के अहसास होगे। ओहर बिहिनिया उठिस अउ गुरूजी के पांव पड़के अपन घर चलदीस। ये काहिनी ले हमन ल ये शिक्षा मिलथे कि बंधन अउ सुरक्षा कवच म बहुत बारीक अंतर होते।


शिवराम चंद्राकर 

धीर म खीर हे, लउहा म हउआ हे

माखन ह धर-मकरम के मनइया अउ सद्विचार वाले मनखे आय। बनी-भूती ह ओकर आमदानी के साधन हरे। ओकर मेर एको पतरी धरती नइये। कमाथे तभे खाथे। नइते हंडि़या उपास रइथे। गांव म भगवान तिहार के सेती ओला काम नइ मिलिच। ओ दिन ओकर घर खाय बर दाना नई रहिच। पेट भूख म पोट-पोट करत रहाय। गांव के परेमू सेठ करा जा के कइथे सेठ ‘मोला थोर-बहुत खाय बर चांउर दे दव में हर बनी करके तुंहर कर्जा ल छूट दे हूं। सेठ घर पइसा रूपिया अउ दाना लबालब भरे राहय तभो कांहीच गाहना धरे बिना कोनो ल उधार बाढ़ी नइ दय। माखन मेर राहन धरे बर कांहीच नइ रहाय। एक दिन झन साधु ओला एक ठन कागज म लिख के एकठन विचार दे रहाय। उही नानकुन कागज ल धर के सेठ करा जाके कथे - ‘‘धीर म खीर हे, लउहा म हउहा हे।’ सेठ कथे ये कांही काम के नइये फेर तोर करलइ देख के दे दे देंथव। कइके ओ-कागज ल अपन मुड़सरिया के ऊपर मिथिया म चटका दीच। अउ उहीच दिन सेठ ह बेपार करे बर परदेश निकल गे।

टोती सेठ ह परदेश जाय बर पाछू करिच अउ ऐती सेठइन के छोकरा लइका अवतरंगे। ओ बखत फोन तार मोटर गाड़ी काहिंच नइ राहय। सेठ मेर संदेसिया घलो नइ पठोइच। अइसे-तईसे सेठ ल परदेश म बारा बच्छर पहागे। ये डाहर सेठ घर माखन ह केउ बेर कर्जा दे बर आवय फेर सेठ मेर भेंट नइ होवय।

सेठ के छोकरा सेठे सही गोरिया अउ ऊंच पुर सइघो जाड़ होगे। एक दिन अपन सेठ दाई ल कथे दाई मोर माथा खोले असन अब्बड़ पिरावत हे। सेठइन ओकर कपार म घी ल ठोकिंच, अउ माथा ल चपकत-चपकत ओकरे संग ढनगे रहिच। ढनके-ढनके महतारी-बेटा के एकेठन खटिया म नींद लटक गें। ओतकेच बेर सेठ परदेश ले घर लहुटथे। घर ले उघरा भिंडिंग-भड़ांग देखथे। मुहाटी कुरिया कोनो मेर कपाट-फैरिका नइ ओधे राहय। सेठ सोज अपने सुते के कुरिया जाथे। कुरिया ल देखके ओहा अकबका जथे। आकर गोसइन पर पुरूष संग एके खटिया म सुते हे। अतका ल देखिच तांह ले सेट के मइन्ता भोगा गे, जी अगियागें, एडी के सिर तरवा म चढ़गे। सेठ मनेमन सोंच डरिच। अब इन दुनो झन के जान लेहूं।

सेठ ह कोठा डाहर जाके टांगिया धर के मारे बर तीर म जाके उबाय रहिच। ओतके बेर सेठ के नजर भिथिया मा चटके लिखना म पर गे। ओमा लिखाय राहय ‘‘धीर म खीर हे, लउहा म हउहा हे’’। सेठ सोंचथे मारबेच तो करहूं फेर थोकन जगा के पूछ लेथव, घर ले भगा तो नइ सकय।

सेठ दुनो झन ल चेचकार के उठाथे, अरे पापिया-पापनीन हो तुमन कइसे निसंख सुते हो। ओतका म बाबू उठके कइथे-दाई ओ उठ तो कोन आय हे। टंगिया धरे हे, हमन ल मारे बउ उचाय हे। सेठइन उठ के पांव ल परिच अउ कथे-पांव ल पर के बेटा ये ह तो ददा आय। सेठइन सेठ ल सब हाल-चाल ल बताथे अउ कथे - तुमन घर ले निकलेव अउ ये तुंहर बेटा अवतरिच हे। सेठ कइथे हाय! में का करत-करत का कर डरे रहेंव? तुम दुनो झन ल मारहूं कइके सोचे रहेंव। फरे ये माखन के दे चिट्ठी भिथिया म चटके रहिच तेला देख के धीरज धरेंव अउ बेटा दुनों झन ल मान डरतेंव। लिखना के तेसी बांच गेंव।

दुसरइया दिन माखन पइसा धर के सेठ करा आ के पांव परथे। सेठ मोर लइका मन ल खाय बर देके बचा देच। सेठ तोर पइसा अउ ओकर बियाज घलो कतका हो ही तेला बता अउ मोर कागज ल लहुटा दे। सेठ कइथे माखन भाई आज तो कागज ह मोर बुढ़त परवार ल उबार लीच। एक कागज के लिखना ल नई पढे रइतेंव त मोर गोसइन अउ बेटा के मुख ल नइ देख पातेंव। सेठ ह माखन मेर हाथ जोड़ के कइथे ये ले अउ पइसा फरे ये कागज ल इहें राहन दे। तभे तो केहे गे हे - ‘‘धीर म खीर हे, लउहा म हउआ हे’। कोनो काम ल बने सोंच विचार के करय नहीं ते फरे पाछू पछताय बर लागथे।


तुकाराम असफल

छत्तीसगढ़ी उपन्यास आवा के प्रेरणा स्त्रोत गांधीवादी प. गंगाप्रसाद द्विवेदी तथा आवा से जुड़ा यह अंश




‘‘गांधी उद्गरे हे। ओकर लाम-लाम हाथ झूलत हे, माड़ी-माड़ी ले। कनिहा म पटकू उघरा बदन, चेंदुवा मूंड, नानचुन घड़ी के झूलेना। हाथ म धरे हे लउठी। रेंगथे त रेंगते जाथे। जेती ओ रेंगथे जम्मो मनखे उही कोती रेंग देथें। ललमुंहा अंगरेज बक्क खा जथे। धरे सकय न टोके सकय। अंधौर अस उठे हे, गांधी उद्गरे हे।’’

बिसाहू के बात ल सुनके लीमतुलसी गांव के बड़े मिलय। गांव म बइठे बइठे गांधी बबा के परछो नई पाय सकव। हम देख के आवथन। गे रेहेन वर्धा। उहा धनीराम दाऊ पढ़ाथे। बरबंदा वाला धनीराम। ओकर परसादे गे रेहेन उहां। गांधी बबा काहत लागय। बोकरी के दूध पीथे। पेनखजूर हा ओकर खाजी ये। अपन काम ल खुदे करथे। पैखाना तक ल खुदे उठाथे। दाऊ धन्न हे गांधी महातमा। अपन तो उठाबे करथे हमर कस्तूरबा दाई सो घलो बुता कराथे गा। इहां दतवन मुखारी तक ल हम दूरा के दाई सो मांगथन। अढ़ो-अढ़ो के हलाकान कर देथन। उहां गांधी बबा के देखौ कारबार त तरूआ सुखा जथे। इहां हमन ‘‘अपन ल तोपै दूसर ल उघारै’’ वाला हिसाब जमाथन, फेर वाह रे गांधी महातमा। हमर तुंहार अंग ल कपड़ा म ढांके बर खुदे उघरा होगे जी। कहिस मोर ददा भइया मन उघरा हें। गरीब हें। त मै जादा पहिर के का करहूं। चरखा म सूत बनाथे अऊ उही सूत के बने मोटहा झोटहा कपड़ा के बने पटकू म बपुरा ह इज्जत ल ढांकेथे।

दाऊ सन्ना गे। यह का बात सब सुनाब म आवथे भाई। दाऊ पूछिस - ‘‘का बिसाहू, अंगरेज कांही नई करय गा?’’ दाऊ के बात ल बिसाहू लमइस। बात अइसन ये दाऊ-आगी खाही ते ह अंगरा हागबे करही। अंगरेज तो मटिया मेट करना चाहते हें, खन के गड़िया देतिस गांधी ल। फेर जनता जनार्दन के गांधी ल कोन हाथ लगाय सकही दाऊ। जब तक ये देस ल आजादी नई मिलही, गांधी ल काल घलो नई छुवे सकय। उद्गरे हे गांधी हमला अजाद करे बर। भागवन ताय। अजादी के लीला देखाही अउ अपन लोक जाही।

मंडल के बात ल सुनके कन्नेखी देखिस दाऊ का अउ किहिस तोरे अस गुन्निक बर केहे गे हे मंडल आजे मूड मुड़इस, अउ आजे महंत बनगे।
कइसे दाऊ? मंडल तिखारिस

बात अइसे ये बिसाहू - दाऊ लमइस अपन बात - किथे नहीं कहां गे कहूं नही, का लाने कुछू नहीं ताऊन हाल तोर हे। अरे भई जब तैं वर्धा गेस अऊ गांधी जी से मिलेस त कुछू सीखे के नहीं?

का सिखतेंव दाऊ। मैं तो धनीराम जी के परेम म जा परेंव। वे किहिस, आजा रे भाई, महातमा जी के आसरम देखाहूं। त जा परेंव। सीखेंव कुछू नहीं दाऊ।

दाऊ थपड़ी पीट के हांसिस अउ किहिस - ‘‘मंडल, चल अब सीख ले गांधी जी नारा दे हे - ‘‘करव या मरव’’ जाने नहीं। मतलब ये करना हे या मरना हे। माने के करके मरना हे। देखे जाही हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा हा..हा...हा...हा

बिसाहू संग अउ दू चार झन सकलाय मनखे मन हांसिन। हांसे के कारन ये रिहिस के दाऊ बिसनू लीमतुलसी वाला बनय साल साल दसहरा के दिन रावन। अउ बोलय डेलाग - हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा। गांधी महातमा के बात म घलो कूद परिस रावन बन के बिसनू दाऊ। रघौत्तम महाराज किहिस - वाह दाऊ, रहि गेसन रावन के रावन। गांधी जी काहत हे एक गाल ल कोनो मारय त दुसर गाल ल दे दव। अउ तैं कहत हस-हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा।

सदा दिन बंधवाय मरवाय ल तो जानेव। अऊ का करहू। अंगरेज घलो गत मारत हें तुहूं उही काम करत हव। वे हा गोरिया अंगरेज ये तुम करिया अंगरेज। 

दाऊ पंडित रघोत्तम के बात ल सुनके किहिस - पालागी ग महराज। बने आसिरवाद देथव पंडित जी। अरे हमूं गांधी बबा के पाल्टी म मेम्बर बनगेहन महराज। करबो अऊ मरबो। बिसाहू मंडल हा सुनइस किस्सा लंबा चौड़ा त महूं कहि परेंव भई। लेकिन काली बिहनिया हम सबला गांव के पीपर चौरा म सकलाना हे। अऊ बिदेसी कपड़ा के होली जलाना है।

महराज रघोत्तम किहिस - काल करंते आज कर आज करंते अब। पल में परलय होयगा, तब होली जलेगा कब। कबित्त ल सुनके सब हांसत - गोठियावत निकलिन कपड़ा मांगे बर।

घर-घर दल बनाके सब जांय अऊ काहंय - छेरिक छेरा, घर के बिदेसी कपड़ा ल हेरी क हेरा। घर के अंगना बटोरत रहय बिंदाबाई। हाथ के काम ल छोर के आगे दम्म ले। किहिस - अई, छेरछेरा पुन्नी तो कब के नाहक गे बाबू हो, ये का नवा उदिम करत हव? ठट्ठा करथव का?

रघोत्तम महराज सब बात ल बतइस। तव बिंदा बाई लानिस एक लुगरा अऊ एक ठन अंगरखा। मांगत जांचत गांव भर म किंजर के सब झन जुरियाइन अउ पीपर के पेड़ के तरी म सकलाके किहिन - बोले, महातमा गांधी के जय। बोलो भारत माता के जय। जय-जयकार थमिस त बिसाहू मंडल रोसियागे। लगाय लगिस नारा -

बोलव वीर नारायण सिंग के जय
बोलो सुन्दर लाल महराज के जय
बोलो ठाकुर प्यारेलाल के जय
बोलो रविसंकर सुकुल के जय
बैरिस्टर छेदीलाल के जय
बोलो डॉक्टर खूबचंद बघेल के जय
जयकारा सुनके बड़े दाऊ बिसनू किहिस - वाह मंडल कतेकझन सियानमन के नांव तंय जानत हस। धन्न हे हमर गांव लीमतुलसी जिहां बिसाहू मंडल हे। गांधी बबा के चेला।

बिसाहू मंडल किहिस- अइसन नोहय दाऊ, मैं आंव गाड़ी वान, असल गांधीवादी हमर मितान मंडल कहाथे भई। सिरतोन आय। सदा दिन गांधी बबा के सब कारबार म जात-आवत रथे। बिसाहू बतइस के मंडल ह रइपुर निकलगे। उहां नेता मन अवइया हें। ओकर संग महूं आत जात रथंव। जादा तो नहीं रे भाई हो, जा परेंव महूं दू चार जगा। तब परछो पायेंव। कंडेल गांव गेन। आवत जात सबो किस्सा ल सुनेंव। बैला गाड़ी में हांकथंव, घनाराम मंडल किस्सा फअकारथे। मोर सांही मुरूख मन्से घलो गंगा नहा लेथे संगी संगवारी के परताप ले सुन्दरलाल महराज, छेदीलाल जी बैरिस्टर, ठाकुर प्यारेलाल सिंग, डॉ. खुबचंद बघेल,रविसंकर महराज सब के नांव सुनेंव त जय बोला पारेंव भई। सब झन बिसाहू के बात सुनके संहरइन। बिसाहू हे तो कुन किसान फेर सपना गजब बड़ देखथे। देस के अजादी के सपना। वो हा सोचथे, देस अजाद होही त गरीब किसान के बेटा साहेब सुभा बनहीं। राज चलांही अपन देस म अपन राज रिही। गांव के भाग जागही। छाती तान के चलबो।

सब झन अपन घर जाय ल धरिन। महराजी पटेल किहिस - एक ठन गीत महूं सुना पारतेंव ग।

बिसाहू किहिस - सुना न जी रट्ठा के सुना
महराजी खंजेरी बजा बजा के गइस -
जय हो गांधी जय हो तोर,
जग म होवय तोरे सोर। जय गंगान।
धन्न धन्न भारत के भाग
अवतारे गांधी भगवान। जय गंगान।
गीत सुन के सब झन किहिन तथे बिसाहू मंडल किहिस जी गांधी उद्गरे हे। मनुख तन लेके भगवान आय हे। रघोत्तम महराज घर डाहर जात जात किहिस - बाबू रे, गीता म भगवान दे हे बचन-यदा यदा ही धर्मस्य.......माने के जब जब धरम उपर अपजस आय उस करही, गरीब गुरबा, गौ अउ बाम्हन के ऊपर आही संकट तब मै आहूं धरती म। परगट होहूं। गांधी के रूप म आये हे भगवान हा।

अंकलहा ल महराज के सबो बात हा नीक लागिस फेर बाम्हन उपर संकट बाला बात नई सुहइस। किहिस के बाम्हने मन मनखे ये, हमन नोहन? भगवान हमरो बर मया करत होही महराज?

रघोत्तम महराज बताइस - बात अइसे ये अंकलहा, गरंथ लिखइया कोन? बाम्हन। त अंधरा बांटे रेवड़ी, आप आप ल देय ताय जी। गरंथ म हे तेला केहेंव। पुरान उपनिसद हमर पुरख मन लिखिन जी हम तो भइया - मनखे मनखे ला मान, सगा भाई के समान, गुरू बाबा घासीदास के ये दे बात ल गुनथन। जात पात सब बेकार। इही सब जात-पात के बिसकुटक के मारे तो हमर ताकत कम होवत गीस। बात तंय बने करथस अंकलहा। रात होगे हे। घर जा बाबू। बिहनिया झटकुन उठहु। जागत जागत सुतहू।

भरूआ काट के बसे रिहिन हमर पुरखा मन लीमतुलसी गांव म अंकलहा किहिस बिसाहू ल। भला बिसाहू काबर चुप रितिस। उहू फटकारिस, बात अइसन ये अंकलहा, ये हमर छत्तीसगढ़ महतारी के महत्तम गजब हे। किथे नहीं, बइठन दे त पिसन दे तौन हाल ताय। बैइठे पइन तौन पिसे ल धर लिन। कोनो आगू अइन कोनो पीछू। हमरो पुरखा मन अइसने होहीं अंकलहा। भरूआ काट के सबो बसे हे। अंकलहा असकटागे। बिसाहू संग बात म भला अंकलहा कइसे जीतय। बात ल बिगड़त देख के अंकलहा किहिस , - ‘‘बिसाहू मंडल, काली जऊन चेंदरी मन के होली जलायेव तेकर का मतलब हे, गम नई पायेंव।’’

बिसाहू किहिस - घनाराम मंडल आगे हे रइपुर ले। ले चल फेर उन्हें चलीं उही बताही भई।
दूनों झन ल आवत देखिस त घनाराम मंडल अपन बहू ल हूंत करा के किहिस - ‘‘बहू, चाहा मड़ा दे। तीन गिलास उतारबे।’’

घनाराम मंडल किहिस - ‘‘बइठव जी। तुंहला बताई चाह के किस्सा। बात अइसन के बिसाहू , चाहा ल हम नई धरेन। हमला चाहा ल धर लिस। दुकान वाला मन आवंय गांव म कटेली केटली बनावंय चाह अऊ फोकट म पियावंय। हफता पन्दरही फोकट में पी पारेन। तहां का पूछना हे। चस्का लग गे।’’
कबी चाहा बर कबित्त बनायहे जी, सुनव, 

डुबु डुबु डबकत हे, चाहा के पानी।
गजब बाटुर हें, धोरूक अऊ डार दे पानी, 
सक्कर न दूध दिखय लाल लाल पानी।
होठ हर भसकत हे फूट कस चानी।
कविताला सुनके अंकलहा किहिस - नाचा म जोक्कड़ मन नवा बात किथें -
चाह भवानी दाहिनी, सम्मुख माड़े पलेट
तीन देव रच्छा करंव, पान बिड़ी सिगरेट।

दोहा सुन के घराराम मंडल गजब हांसिस। किहिस - का करबे बिन चाहा के रहे न जाय। मूड़ पिराथे। हाथ गोड़ अल्लर पर जथे। घर भर के पहली उठते साठ चहा पीथन त काम बूता धरथन। मंडलिन हा चाहा पिये बिना नाती ल सेंकय नहीं। चाहा बिना परेम धलो नई होवय। ठठ्ठा बात ल सुनके मंडलिन देखऊटी घुस्सा करके किहिस - ‘‘एकाध झन मनखे मन बुढ़ा जथें फेर गोठियाय के ढंग नई राहय।’’

मंडल मंडलिन के बात ल सुनके अऊ मंगन होगे। किहिस। देखना हे सवाद चाहा के चस्का ताय। बात में चस्का ते चाह के चस्का। चाह पीना माने अब सान के बात बनगे जी। घर में मनखे आही अऊ चाह नई पियाबो त किही दिली-ओहा चाहो बर नई पूछिस जी। याहा तरा दिन आय हे।

मंडल के बात, - बिसाहू किहिस - ‘‘तंय तो मातबर मंडल अस, चार नागर के जोतनदार। फेर जिकर इहां मुसुवा डंड पेलत हे उहू मन झपागे चाहा म। पोट-पोट भूख मरही फेर चाहा झड़काही। खसू बर तेल नहीं, घोड़सार बर दिया। यहा तरा होवत हे हाल हा। मंडल किहिस - सिरतोन ताय जी। ले चाहा पुरान छोड़व। बतावव कइसे पधारेव दूनो देवता।’’
अंकलहा किहिस - मंडल, तै गांधी बबा के चेला। काली हमन मिलके चेंदरी, पोलखा, लुगरा, अंगरखा, जऊन मिल ग तेला फूंक देन। गांधी बबा के हुकूम हावय। फेर कोनो बतइन नहीं के भभकत आगी म पानी डरइया गांधी बबा के यहा हुकूम काय ये भई। एक गाल ल कोनो मारही त दूसर ल दे दव, कहइया ह आगी काबर लगाय बर किथे। 
बिसाहू मंडल अंकलहा के बात सुनके थपड़ीपीट के हांसिस। अंकलहा किहिस - मंडल का बात ये भई, कांही अनीत कर पारेंव का?

हांस पारेंव, अंकलहा मंडल किहिस। बात अइसन ये के पहली तंय गांधी बबा के नाव नई जानत रेहे। फेर ओकर जय बोलाय बर सीखेस, अब गांधी महातमा के सिद्धांत, बिचार, पुरूगिराम, सब ल जाने के उदिम करत हस। तोर अस बर कहे गेहे पहिली जोंधरी चोर फेर सेंधफोर। फेर सुने जाने बर चाही सब बात ल। गांधी बबा बतइस जी हमन ल। आज के बात चाही सब बात ल। गांधी बबा बतइस जी हमन ल। आज के बात नोहय। अब तो देस सुतंत्र होय चाहत हे। करो या मरो, ओकर आगू कंडेल नहर के कांड, सब कथा लम्बा हे। गांधी बबा के किसिम किसिम के हुकू होइस।

छत्तीसगढ़ मा गांधी बबा पहली अइस त कंडेल कांड म। धमतरी तीर हे गांव कंडेल। उहां पंडित सुन्दर लाल अऊ ऊंकर संगवारी मन नहर पानी बर अंडियागें। राख पत त रखा पत। किसान के लाल ऑखी देख के देवता थर्रा जथे। अंगरेज मूत मारिन। गांधी बबा के आय के पहली होगे राजीनामा। फेर गांधी बबा अऊ दीन आसीरबाद। हमर छत्तीसगढ़ म पंड़ित सुन्दरलाल ल घलो गांधी केहे जाथे। काबर? के वो हा गांधी जी के रद्दा म चले के रंग ढंग ल सिखाईस रे भई। सतनामी भाई मन ल जनेऊ दीस। मंदिर म उनला परवेस करवाइस।
अभी बात ह चलते रिहिस, ओती ले आगे जेठू अउ महराजी। दूनोंझन घनाराम मंडल ला पांय, पैलगी करिन अउ कलेचुप बइठगें।

अंकलहा किहिस - मंडल का बोलन। का बतावन एक मनखे तुंहला देखथन। एक बोलिया। सच के मनइया। सब झन के देखइया। एक झन बिसून दाऊ हे। बिहनिया गांधी जी के जय बोलाथे, सांझ कन पुलुस सिपाही मन संग बइठके डल्ला उड़ाथे। अउ एक बात जरूरी हे मंडल ददा। तुंहर ले जादा बिसुन दाऊ के कदर हे गांव म। किये नहीं, सती बिचारी भूख मरे, लड़वा खाय छिनार
धन्न रे दुनिया।

मंडल किहिस - का बात ये अंकलहा? गजब जोर के धक्का खाय हस तईसे लागत हे।
‘‘खाय हंव मंडल। मै घासीदास बबा के जस गवइया अंकलहा। पंथी दल बना पारेव मंडल। मंदरहा मिलगे, टूरा मन ल सिखोवत हंव। तुंहला नाच के देखाहूं। अभी जादा नई सिखे पायन। बिसनू दाऊ के सौंजिया के मदहरा टूरा बुधारू हे। दाऊ भड़कावत हे वोला। काहत हे अंकलहा के चक्कर म झन पड़ रे बाबू। मादरे के पुरती हो जाबे। अंगरेज मन सब देखते हें। घासीदास के वचन ल झन गावव। अंगरेज धर लीही। तुमन गाहू ...
मनखे मनखे ल जान,
सगा भाई के समान।

त अंगरेज ह छोड़य नहीं। अरे मुरूख हो, गोरिया - करिया, नीच -ऊंच, धनी गरीब सब भगवान बनाये हे। तोला तुम मेट दुहू। मनखे मनखे कइसे एक हो जाही। फेर गाथव तुम ‘‘मंदिरवा म का करे जइबो, अपन घट ही के देव ल मनइबो।’’ इही सब गाना ये। मंदिर म नई जाये सकेव त घर के देव ल मनइबो।’’ इही सब गाना ये। मंदिर म नई जाये सकेव त घर के देव ल मनाथव। सुन्दरलाल महराज ह दू चार झन सतनामी ल एक दिन मंदिर में खुसेर दिस त का होगे। बाम्हन चलाकी चल दिस। न एती के होयेव न ओती के। बाबू रे, पंथी गाना बंद करो। यहा तरा हमला डेरवावत हे मंडल। अंकलहा के बात ल सुन के मंडल ल गजब रीस लागिस। मंडल किहिस - ‘‘दू ठन डोंगा म पांव धरही, तौन बोहाबे करही अंकलहा। दाऊ बिसनू के चाल हम जानत हन। तंय झन कर फिकीर। नाच अउ नचवा। गीत ल सब गा। अउ एक ठन गीत अऊ गा।’’
का गीत मंडल?

अंकलहा पूछिस। मंडल किहिस - --ये दे गीत ल सुन जी।’’
भैया पांचो पाण्डव कहिए जिनको नाम सुनाऊं
लाखे वामन राव हमारे धर्मराज को है अवतार
भीमसेन अवतारी जानो, लक्ष्मीरनारायन जिनका नाम 
डागा सह देव नाम से जाहिर,
रऊफ नकुल को है अवतार
ठाकुर अर्जुन के अवतारी योद्धो प्यारेलाल सरदार।

ये सब हम रइपुर जाथन आथन त सुनथन जी। छत्तीसगढ़ महतारी के पांडव ये येमन। गीत गावव। बाजा बजावव। बिसने सही बेईमान मन के बात ल कान झन दव। समझाय बुझाय के बाद घनाराम मंडल अपने बेटा ल हुंत करइस। सोरा बछर के सामलाल आके खड़ा होगे। मंडल किहिस सामनलाल अंकलहा कका, महराजी कका मन पांव छू के आसिर बाद ले बाबू।

समलाल दूनो झन के पांव परिस। अंकलहा किहिस - मंडल, हमर पांव परवाके तै अनीत करथस गा। हमला कोनो पांव नई परंय। जात-पात माड़े हे मंडल।
मंडल किहिस - ‘‘अंकलहा, तंय मोर भाई अस के नहीं? 
भाई आस त समेलाल के का, लाग होय?
कका तान भई अंकलहा किहिस

‘‘त कका के पांव भतीज नई परही जी। अच्छा बताय तहूं ह।’’
अभी मंडल कुछू अउ कहे पातिस तैइसने चाहा आगे।
सबो मन चाहा भड़किन। कप सासर ल अभी भुइयां म मड़ाय नई पाय रिहिन तइसने पहंचगे बिसनू दाऊ। घनाराम किहिस - ‘‘ले, कथे नहीं, नाचत रिहिन जोगी तेमा कूद परिन सन्यासी। अरे भाई, बिसनू दाऊ घलो आगे। लानव रे चाहा।’’

बिसनू दाऊ नता म मंडल ल मानय भांटो। किहिस - ‘‘भांटो, बुढ़ा गेस फेर ठठाय बर नई छोड़े।’’
घनाराम भला कहां चुप रहइया ये, उहूं तगड़ा जवाब दिस - ‘‘अइसे ये बाबू रे, ठठाही किके तो बहिनी देहच। अब काबर करलाथे।’’
अपन अस मुंह लेके रहिगे बिसनू दाऊ। सामलाल फेर चाह लेके अइस। बिसनू दाऊ किहिस - पांय लागी भांचा। कब हबरे ग।

सामलाल लजागे। चाहा देत खानी बिसनू दाऊ के नजर परगे सामलाल के जेवनी हाथ म। चाहा देत खानी बिसनू दाऊ के नजर परगे सामलाल के जेवनी हाथ म। चाहा पिये बर छोड़ दिस बिसनू। किहिस 
‘‘भांचा, यहां का लोर उपटे हे हाथ म भाई, हाथ, करियागेहे।’’
समलाल कुछू नई किहिस। घर भीतर चल दिस। मंडल किहिस ‘‘तै तो आस कंस ममा। इहां दिन भर गांधी बबा के गुन गाथस अउ रात कुन डल्ला उड़ाथस। जिंकर संग डल्ला उड़ाथस बाबू रे उही सिपाही मन मारे हे सामलाल ल।’’

का किथस भांटो? बिसकुटक झन सुनाय कर। फरी फरा बता। बिसनु किहिस।
सब्बो बइठया तन अकबकागें। घनाराम मंडल तब बतइस - ‘‘सामलाल के ममा रिथे दुरूग में। उहां वे गुरूजी हे। सामलाल ओकरे हाई स्कूल म पढ़ेबर दुरूग गे हे। नवमीं पढत हे ग। का करबे, हमर तीर तखार म तो हाई स्कूल नइये। भेजेंव रे भाई। बड़े बेटा चुन्नीलाल ह तो चौथी पढ़के घर के खेतीबारी देखत हे। तिपोय बर बहू आगे। ये दे छोटू ल पढ़ा परतेंव कहिके भेज देंव दुरूग। उहां लइका ह सुराजी मन के संगत म देस के काम करे धर लिस। पर्चा बांटय, पोस्ट आफिस के लाल डब्बा म तेजाब डारय। लइका दल के दू टूरा पकड़ा गे। सामलाल ल पकड़ के लेगिन अउ किहिन - हाथ ल खोल बेटा पा ईनाम गांधी के सिपाही बने के। सुराजी बनत हे साला ह। लइका ल तीन बेंत के सजा दे गीस। पहली एक सिपाही हाथ ल कोहनी मेर ले धरिस, दूसर ह सिलकन के कपड़ा ल पानी म बोर के हाथ में मड़इस, तीसर ह, कांख के मारिस सट ले। मोर बेटा, फूल के झेला एके बेंत म बिहूस होगे। अऊ मारिन। सजा ताय। ओकरे सेती करिया गे बिसनू।’’

बतावत बतावत आंखी म आंसू आगे मंडल के। अंकलहा किहिस - ‘‘फेर का करबे, हमी मन गद्दार हन?
बिसनूदाऊ ला लागिस जइसे अंकलहा हा ओकर मुंह म खखार के सब के आगू म थूक दिस।
घनाराम अंखियाइस अंकलहा ल।

टंकलहा चुप होगे। महराजी किहिस - ‘‘मंडल, तोर बेटा ये। सुराजी तो बनगे करही। करेजा चाही सुराजी बने बर। घर म बला के हइतारा मन संग डल्ला उड़ाना सरल हे अउ बेंत खाके गांधी बबा के काम करना अऊ जहल जाना गजब कठिन।’’
‘‘जेखर राहय लोहा के दांत, तऊन खाय ससुरार के भात’’....
फोकट नई केहे गेहे। तैं तो जस के तस हस मंडल, फेर सामलाल निकलही सुराजी। हमन तो मर-खप जाबो। सामलाल देखही देस के आजादी अऊ चमक ल।

घनाराम मंडल महराजी के बात सुनके उठ बइठिस। किहिस - ‘‘महराजी, राज करंते राजा नई रहि जाय, रूप करंते रानी। रहि जइहंय ग नाव निसानी। ले चलव भइया, हो। उठव रेंगव गजब दुरिहा जाना हे।’’