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बाढ़त महंगाई म पढई घलो ह जी के जंजाल हो गे

बाढ़त महंगाई म पढई घलो ह जी के जंजाल हो गे हावय। एकझन टूरा अउ एकेचझन टुरी ल पढ़ावत ले लगथे जम्मों खेती-खार ह बेचा जही। अइसे तो जम्मो जिनीस के भाव ह आगी लगे हे। आतको म मरइया ल अउ मारे बर ये स्कूल-कालेज म थोकेच कन पइसा म पढ़ई-लिखई हो जवत रिहिस हे। जेन ल पढ़ना रहाय तेमन पढ़न, अउ जेन नइ पढ़य-लिखय तेमन खेती-बारी अउ आने काम करय। अब तो सरकार ह सब्बे लइका-सियान ल पढे बर जोर देवत हे। डोकरा-डोकरी मन घलो पढ़े-लिखे ल सिखत हे। येमा हमनला कोनो आपत्ति नइ हे, फेर हम गरीबमन अपन लइकामन ल बने कस स्कुल-कालेज म कइसे पढ़ा सकथन, जब साल के साल मनमाने फीस ल बढ़ावत जात हावय। अब ले ना ये रविशंकर यूनीवरसीटी वाला मन घलो हर साल परीक्षा फीस ल बढ़ाय के फइसला ले हे। मोर टुरा अउ टुरी दुनोझन कालेज म पढ़त हावय। यइसे म मोर मुंड़ा नइ पूर गे, तुहीमन बताओ रे भई। टूरा ल नइ पढाहूं त ओहा कोनो काम के नइ रिही। काबर के स्कूल तक पढ़े-लिखे कतको लइका मन ठलहा घुमत हे। पढ़-लिख ले हन कइके ओमन खेत-खार म कमावय नइ, अउ अतका नइ पढे़ हे के ओमन ल सरकारी नउकरी मिलय। गंवई के इही लइकामन के हाल ल देखके मेहा सोचे रहेंव अपन टूरा-टूरी मन ल काॅलेज पढ़ाहू अउ बड़ेकजान साहब बनाहूं। फेर रोजेच-रोजेच के महंगाई बढ़ई म मोर तो हाथ-गोड़ फूलत हावय। टूरी के जादा चिंता होवत हावय। काबर के काॅलेज पढ़ लेतीच तक ओकर बिहाव ह बने घर म हो जतीस अउ दमाद घलो ह सरकारी नउकरी वाले मिलतीस। इही बात ल गुनत-गुनत घर के चउरा म बइठे रहेंव की जोर के आवाज आइस। मेहा मुड़ी उठा के देखेंव त मोर पड़ोसी के बड़का टूरा रिहिस।
कका, पांव परत हव गा। ईश्वर ह सहर ले कब आही। होली तिहार बर घलो नइ आय रिहिस हे। अपन फटफटिया म जिसं पेठ अउ टिसरट पहिने, आंखी म चसमा चढ़ाये रिहिस बुजा ह। ओहा आठवीं कलास ले आघू नइ पढ़े रिहिस। फेर आजकल अइसन पइसा कमात हे के झन पूछव। दारू भट्ठी म काम करथे। ओकर छोटे भई हर तो पांचवी फेल हे। फेर उहू हर बिकट पैसा कमाथे। काबर की ओहा फेकटरी म कमाय बर जाथे। ओकर बहनी के विहाव ह इसी साल सरकारी स्कूल के चपरासी संग होइस हे। ओहा दूसरी भर पढ़े हे।
कका, कइसे कलेचुप हस गा, कुछू बोलत-बतियात नइ अस। ओकर बात ल सुन के मोर मुहुं ले बस अतके निकलिस ईश्वर ह परिक्षा के बाद म आही घासी। महंगी पढ़ई ल देखके सोचतथव कि पढ़ाय के जिद ल छोड़के लइकामन ल खेलत देतेव त हो सकथे टुरा ह सचिन, धोनी कस ब जथीस अउ टूरी ह सनिया। काबर ‘खेलवे-कूदिबे त होबे खराब, अउ पढ़बे-लिखबे त होवे नवाब’ हाना ह तो उल्टा हो गे हे। अब तो खेलइया-कुदइया मन ह ‘नवाब’ बनत हे। देखत हव न, विश्वकम जिते के के बाद म किरकेट खिलाड़ी मन करा कइसे छानी फाड़ के रूपिया बरसत हे।

गुलाल वर्मा

झुका कन्धा

बेटे ने उसे काफी कीमती सूट दिया था। वह सूट मे अच्छा लग रहा था। एकदम किसी बड़े अधिकारी के बाप जैसा। पत्नी की बेची इच्छा थी,इसलिए थोड़ी ना-नुकर के बाद सूट पहनने के लिए तैयार हो गया था। बेटे ने पुराना सूट देते हुए बताया था, 'मेरे पास पुरे दस सूट हो गए हैं । वैसे यह ज्यादा पुराना नहीं है। आखिर, अफसर के बाप के पास कोई तरीके की ड्रेस तो नहीं होने चाहिए ।' सूट पहनने के बाद बुजुर्ग ने पत्नी से कहा,  'बाकी सब तो ठीक है, बस, कंधा कुछ झुक गया है।' इतना कहकर अपने कमरे मे चला गया। पत्नी फोन पर ऊंची बेटे को बता रही थी। या शायद पति को सुना रही थी-'पहली बार सूट पहना है, इसलिए कुछ हिचक रहे थे। कीमती सूट है न, इसलिए बेचे अच्छे लग रहे थे।

छत्तीसगढ़ी उपन्यास आवा के प्रेरणा स्त्रोत गांधीवादी प. गंगाप्रसाद द्विवेदी तथा आवा से जुड़ा यह अंश




‘‘गांधी उद्गरे हे। ओकर लाम-लाम हाथ झूलत हे, माड़ी-माड़ी ले। कनिहा म पटकू उघरा बदन, चेंदुवा मूंड, नानचुन घड़ी के झूलेना। हाथ म धरे हे लउठी। रेंगथे त रेंगते जाथे। जेती ओ रेंगथे जम्मो मनखे उही कोती रेंग देथें। ललमुंहा अंगरेज बक्क खा जथे। धरे सकय न टोके सकय। अंधौर अस उठे हे, गांधी उद्गरे हे।’’

बिसाहू के बात ल सुनके लीमतुलसी गांव के बड़े मिलय। गांव म बइठे बइठे गांधी बबा के परछो नई पाय सकव। हम देख के आवथन। गे रेहेन वर्धा। उहा धनीराम दाऊ पढ़ाथे। बरबंदा वाला धनीराम। ओकर परसादे गे रेहेन उहां। गांधी बबा काहत लागय। बोकरी के दूध पीथे। पेनखजूर हा ओकर खाजी ये। अपन काम ल खुदे करथे। पैखाना तक ल खुदे उठाथे। दाऊ धन्न हे गांधी महातमा। अपन तो उठाबे करथे हमर कस्तूरबा दाई सो घलो बुता कराथे गा। इहां दतवन मुखारी तक ल हम दूरा के दाई सो मांगथन। अढ़ो-अढ़ो के हलाकान कर देथन। उहां गांधी बबा के देखौ कारबार त तरूआ सुखा जथे। इहां हमन ‘‘अपन ल तोपै दूसर ल उघारै’’ वाला हिसाब जमाथन, फेर वाह रे गांधी महातमा। हमर तुंहार अंग ल कपड़ा म ढांके बर खुदे उघरा होगे जी। कहिस मोर ददा भइया मन उघरा हें। गरीब हें। त मै जादा पहिर के का करहूं। चरखा म सूत बनाथे अऊ उही सूत के बने मोटहा झोटहा कपड़ा के बने पटकू म बपुरा ह इज्जत ल ढांकेथे।

दाऊ सन्ना गे। यह का बात सब सुनाब म आवथे भाई। दाऊ पूछिस - ‘‘का बिसाहू, अंगरेज कांही नई करय गा?’’ दाऊ के बात ल बिसाहू लमइस। बात अइसन ये दाऊ-आगी खाही ते ह अंगरा हागबे करही। अंगरेज तो मटिया मेट करना चाहते हें, खन के गड़िया देतिस गांधी ल। फेर जनता जनार्दन के गांधी ल कोन हाथ लगाय सकही दाऊ। जब तक ये देस ल आजादी नई मिलही, गांधी ल काल घलो नई छुवे सकय। उद्गरे हे गांधी हमला अजाद करे बर। भागवन ताय। अजादी के लीला देखाही अउ अपन लोक जाही।

मंडल के बात ल सुनके कन्नेखी देखिस दाऊ का अउ किहिस तोरे अस गुन्निक बर केहे गे हे मंडल आजे मूड मुड़इस, अउ आजे महंत बनगे।
कइसे दाऊ? मंडल तिखारिस

बात अइसे ये बिसाहू - दाऊ लमइस अपन बात - किथे नहीं कहां गे कहूं नही, का लाने कुछू नहीं ताऊन हाल तोर हे। अरे भई जब तैं वर्धा गेस अऊ गांधी जी से मिलेस त कुछू सीखे के नहीं?

का सिखतेंव दाऊ। मैं तो धनीराम जी के परेम म जा परेंव। वे किहिस, आजा रे भाई, महातमा जी के आसरम देखाहूं। त जा परेंव। सीखेंव कुछू नहीं दाऊ।

दाऊ थपड़ी पीट के हांसिस अउ किहिस - ‘‘मंडल, चल अब सीख ले गांधी जी नारा दे हे - ‘‘करव या मरव’’ जाने नहीं। मतलब ये करना हे या मरना हे। माने के करके मरना हे। देखे जाही हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा हा..हा...हा...हा

बिसाहू संग अउ दू चार झन सकलाय मनखे मन हांसिन। हांसे के कारन ये रिहिस के दाऊ बिसनू लीमतुलसी वाला बनय साल साल दसहरा के दिन रावन। अउ बोलय डेलाग - हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा। गांधी महातमा के बात म घलो कूद परिस रावन बन के बिसनू दाऊ। रघौत्तम महाराज किहिस - वाह दाऊ, रहि गेसन रावन के रावन। गांधी जी काहत हे एक गाल ल कोनो मारय त दुसर गाल ल दे दव। अउ तैं कहत हस-हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा।

सदा दिन बंधवाय मरवाय ल तो जानेव। अऊ का करहू। अंगरेज घलो गत मारत हें तुहूं उही काम करत हव। वे हा गोरिया अंगरेज ये तुम करिया अंगरेज। 

दाऊ पंडित रघोत्तम के बात ल सुनके किहिस - पालागी ग महराज। बने आसिरवाद देथव पंडित जी। अरे हमूं गांधी बबा के पाल्टी म मेम्बर बनगेहन महराज। करबो अऊ मरबो। बिसाहू मंडल हा सुनइस किस्सा लंबा चौड़ा त महूं कहि परेंव भई। लेकिन काली बिहनिया हम सबला गांव के पीपर चौरा म सकलाना हे। अऊ बिदेसी कपड़ा के होली जलाना है।

महराज रघोत्तम किहिस - काल करंते आज कर आज करंते अब। पल में परलय होयगा, तब होली जलेगा कब। कबित्त ल सुनके सब हांसत - गोठियावत निकलिन कपड़ा मांगे बर।

घर-घर दल बनाके सब जांय अऊ काहंय - छेरिक छेरा, घर के बिदेसी कपड़ा ल हेरी क हेरा। घर के अंगना बटोरत रहय बिंदाबाई। हाथ के काम ल छोर के आगे दम्म ले। किहिस - अई, छेरछेरा पुन्नी तो कब के नाहक गे बाबू हो, ये का नवा उदिम करत हव? ठट्ठा करथव का?

रघोत्तम महराज सब बात ल बतइस। तव बिंदा बाई लानिस एक लुगरा अऊ एक ठन अंगरखा। मांगत जांचत गांव भर म किंजर के सब झन जुरियाइन अउ पीपर के पेड़ के तरी म सकलाके किहिन - बोले, महातमा गांधी के जय। बोलो भारत माता के जय। जय-जयकार थमिस त बिसाहू मंडल रोसियागे। लगाय लगिस नारा -

बोलव वीर नारायण सिंग के जय
बोलो सुन्दर लाल महराज के जय
बोलो ठाकुर प्यारेलाल के जय
बोलो रविसंकर सुकुल के जय
बैरिस्टर छेदीलाल के जय
बोलो डॉक्टर खूबचंद बघेल के जय
जयकारा सुनके बड़े दाऊ बिसनू किहिस - वाह मंडल कतेकझन सियानमन के नांव तंय जानत हस। धन्न हे हमर गांव लीमतुलसी जिहां बिसाहू मंडल हे। गांधी बबा के चेला।

बिसाहू मंडल किहिस- अइसन नोहय दाऊ, मैं आंव गाड़ी वान, असल गांधीवादी हमर मितान मंडल कहाथे भई। सिरतोन आय। सदा दिन गांधी बबा के सब कारबार म जात-आवत रथे। बिसाहू बतइस के मंडल ह रइपुर निकलगे। उहां नेता मन अवइया हें। ओकर संग महूं आत जात रथंव। जादा तो नहीं रे भाई हो, जा परेंव महूं दू चार जगा। तब परछो पायेंव। कंडेल गांव गेन। आवत जात सबो किस्सा ल सुनेंव। बैला गाड़ी में हांकथंव, घनाराम मंडल किस्सा फअकारथे। मोर सांही मुरूख मन्से घलो गंगा नहा लेथे संगी संगवारी के परताप ले सुन्दरलाल महराज, छेदीलाल जी बैरिस्टर, ठाकुर प्यारेलाल सिंग, डॉ. खुबचंद बघेल,रविसंकर महराज सब के नांव सुनेंव त जय बोला पारेंव भई। सब झन बिसाहू के बात सुनके संहरइन। बिसाहू हे तो कुन किसान फेर सपना गजब बड़ देखथे। देस के अजादी के सपना। वो हा सोचथे, देस अजाद होही त गरीब किसान के बेटा साहेब सुभा बनहीं। राज चलांही अपन देस म अपन राज रिही। गांव के भाग जागही। छाती तान के चलबो।

सब झन अपन घर जाय ल धरिन। महराजी पटेल किहिस - एक ठन गीत महूं सुना पारतेंव ग।

बिसाहू किहिस - सुना न जी रट्ठा के सुना
महराजी खंजेरी बजा बजा के गइस -
जय हो गांधी जय हो तोर,
जग म होवय तोरे सोर। जय गंगान।
धन्न धन्न भारत के भाग
अवतारे गांधी भगवान। जय गंगान।
गीत सुन के सब झन किहिन तथे बिसाहू मंडल किहिस जी गांधी उद्गरे हे। मनुख तन लेके भगवान आय हे। रघोत्तम महराज घर डाहर जात जात किहिस - बाबू रे, गीता म भगवान दे हे बचन-यदा यदा ही धर्मस्य.......माने के जब जब धरम उपर अपजस आय उस करही, गरीब गुरबा, गौ अउ बाम्हन के ऊपर आही संकट तब मै आहूं धरती म। परगट होहूं। गांधी के रूप म आये हे भगवान हा।

अंकलहा ल महराज के सबो बात हा नीक लागिस फेर बाम्हन उपर संकट बाला बात नई सुहइस। किहिस के बाम्हने मन मनखे ये, हमन नोहन? भगवान हमरो बर मया करत होही महराज?

रघोत्तम महराज बताइस - बात अइसे ये अंकलहा, गरंथ लिखइया कोन? बाम्हन। त अंधरा बांटे रेवड़ी, आप आप ल देय ताय जी। गरंथ म हे तेला केहेंव। पुरान उपनिसद हमर पुरख मन लिखिन जी हम तो भइया - मनखे मनखे ला मान, सगा भाई के समान, गुरू बाबा घासीदास के ये दे बात ल गुनथन। जात पात सब बेकार। इही सब जात-पात के बिसकुटक के मारे तो हमर ताकत कम होवत गीस। बात तंय बने करथस अंकलहा। रात होगे हे। घर जा बाबू। बिहनिया झटकुन उठहु। जागत जागत सुतहू।

भरूआ काट के बसे रिहिन हमर पुरखा मन लीमतुलसी गांव म अंकलहा किहिस बिसाहू ल। भला बिसाहू काबर चुप रितिस। उहू फटकारिस, बात अइसन ये अंकलहा, ये हमर छत्तीसगढ़ महतारी के महत्तम गजब हे। किथे नहीं, बइठन दे त पिसन दे तौन हाल ताय। बैइठे पइन तौन पिसे ल धर लिन। कोनो आगू अइन कोनो पीछू। हमरो पुरखा मन अइसने होहीं अंकलहा। भरूआ काट के सबो बसे हे। अंकलहा असकटागे। बिसाहू संग बात म भला अंकलहा कइसे जीतय। बात ल बिगड़त देख के अंकलहा किहिस , - ‘‘बिसाहू मंडल, काली जऊन चेंदरी मन के होली जलायेव तेकर का मतलब हे, गम नई पायेंव।’’

बिसाहू किहिस - घनाराम मंडल आगे हे रइपुर ले। ले चल फेर उन्हें चलीं उही बताही भई।
दूनों झन ल आवत देखिस त घनाराम मंडल अपन बहू ल हूंत करा के किहिस - ‘‘बहू, चाहा मड़ा दे। तीन गिलास उतारबे।’’

घनाराम मंडल किहिस - ‘‘बइठव जी। तुंहला बताई चाह के किस्सा। बात अइसन के बिसाहू , चाहा ल हम नई धरेन। हमला चाहा ल धर लिस। दुकान वाला मन आवंय गांव म कटेली केटली बनावंय चाह अऊ फोकट म पियावंय। हफता पन्दरही फोकट में पी पारेन। तहां का पूछना हे। चस्का लग गे।’’
कबी चाहा बर कबित्त बनायहे जी, सुनव, 

डुबु डुबु डबकत हे, चाहा के पानी।
गजब बाटुर हें, धोरूक अऊ डार दे पानी, 
सक्कर न दूध दिखय लाल लाल पानी।
होठ हर भसकत हे फूट कस चानी।
कविताला सुनके अंकलहा किहिस - नाचा म जोक्कड़ मन नवा बात किथें -
चाह भवानी दाहिनी, सम्मुख माड़े पलेट
तीन देव रच्छा करंव, पान बिड़ी सिगरेट।

दोहा सुन के घराराम मंडल गजब हांसिस। किहिस - का करबे बिन चाहा के रहे न जाय। मूड़ पिराथे। हाथ गोड़ अल्लर पर जथे। घर भर के पहली उठते साठ चहा पीथन त काम बूता धरथन। मंडलिन हा चाहा पिये बिना नाती ल सेंकय नहीं। चाहा बिना परेम धलो नई होवय। ठठ्ठा बात ल सुनके मंडलिन देखऊटी घुस्सा करके किहिस - ‘‘एकाध झन मनखे मन बुढ़ा जथें फेर गोठियाय के ढंग नई राहय।’’

मंडल मंडलिन के बात ल सुनके अऊ मंगन होगे। किहिस। देखना हे सवाद चाहा के चस्का ताय। बात में चस्का ते चाह के चस्का। चाह पीना माने अब सान के बात बनगे जी। घर में मनखे आही अऊ चाह नई पियाबो त किही दिली-ओहा चाहो बर नई पूछिस जी। याहा तरा दिन आय हे।

मंडल के बात, - बिसाहू किहिस - ‘‘तंय तो मातबर मंडल अस, चार नागर के जोतनदार। फेर जिकर इहां मुसुवा डंड पेलत हे उहू मन झपागे चाहा म। पोट-पोट भूख मरही फेर चाहा झड़काही। खसू बर तेल नहीं, घोड़सार बर दिया। यहा तरा होवत हे हाल हा। मंडल किहिस - सिरतोन ताय जी। ले चाहा पुरान छोड़व। बतावव कइसे पधारेव दूनो देवता।’’
अंकलहा किहिस - मंडल, तै गांधी बबा के चेला। काली हमन मिलके चेंदरी, पोलखा, लुगरा, अंगरखा, जऊन मिल ग तेला फूंक देन। गांधी बबा के हुकूम हावय। फेर कोनो बतइन नहीं के भभकत आगी म पानी डरइया गांधी बबा के यहा हुकूम काय ये भई। एक गाल ल कोनो मारही त दूसर ल दे दव, कहइया ह आगी काबर लगाय बर किथे। 
बिसाहू मंडल अंकलहा के बात सुनके थपड़ीपीट के हांसिस। अंकलहा किहिस - मंडल का बात ये भई, कांही अनीत कर पारेंव का?

हांस पारेंव, अंकलहा मंडल किहिस। बात अइसन ये के पहली तंय गांधी बबा के नाव नई जानत रेहे। फेर ओकर जय बोलाय बर सीखेस, अब गांधी महातमा के सिद्धांत, बिचार, पुरूगिराम, सब ल जाने के उदिम करत हस। तोर अस बर कहे गेहे पहिली जोंधरी चोर फेर सेंधफोर। फेर सुने जाने बर चाही सब बात ल। गांधी बबा बतइस जी हमन ल। आज के बात चाही सब बात ल। गांधी बबा बतइस जी हमन ल। आज के बात नोहय। अब तो देस सुतंत्र होय चाहत हे। करो या मरो, ओकर आगू कंडेल नहर के कांड, सब कथा लम्बा हे। गांधी बबा के किसिम किसिम के हुकू होइस।

छत्तीसगढ़ मा गांधी बबा पहली अइस त कंडेल कांड म। धमतरी तीर हे गांव कंडेल। उहां पंडित सुन्दर लाल अऊ ऊंकर संगवारी मन नहर पानी बर अंडियागें। राख पत त रखा पत। किसान के लाल ऑखी देख के देवता थर्रा जथे। अंगरेज मूत मारिन। गांधी बबा के आय के पहली होगे राजीनामा। फेर गांधी बबा अऊ दीन आसीरबाद। हमर छत्तीसगढ़ म पंड़ित सुन्दरलाल ल घलो गांधी केहे जाथे। काबर? के वो हा गांधी जी के रद्दा म चले के रंग ढंग ल सिखाईस रे भई। सतनामी भाई मन ल जनेऊ दीस। मंदिर म उनला परवेस करवाइस।
अभी बात ह चलते रिहिस, ओती ले आगे जेठू अउ महराजी। दूनोंझन घनाराम मंडल ला पांय, पैलगी करिन अउ कलेचुप बइठगें।

अंकलहा किहिस - मंडल का बोलन। का बतावन एक मनखे तुंहला देखथन। एक बोलिया। सच के मनइया। सब झन के देखइया। एक झन बिसून दाऊ हे। बिहनिया गांधी जी के जय बोलाथे, सांझ कन पुलुस सिपाही मन संग बइठके डल्ला उड़ाथे। अउ एक बात जरूरी हे मंडल ददा। तुंहर ले जादा बिसुन दाऊ के कदर हे गांव म। किये नहीं, सती बिचारी भूख मरे, लड़वा खाय छिनार
धन्न रे दुनिया।

मंडल किहिस - का बात ये अंकलहा? गजब जोर के धक्का खाय हस तईसे लागत हे।
‘‘खाय हंव मंडल। मै घासीदास बबा के जस गवइया अंकलहा। पंथी दल बना पारेव मंडल। मंदरहा मिलगे, टूरा मन ल सिखोवत हंव। तुंहला नाच के देखाहूं। अभी जादा नई सिखे पायन। बिसनू दाऊ के सौंजिया के मदहरा टूरा बुधारू हे। दाऊ भड़कावत हे वोला। काहत हे अंकलहा के चक्कर म झन पड़ रे बाबू। मादरे के पुरती हो जाबे। अंगरेज मन सब देखते हें। घासीदास के वचन ल झन गावव। अंगरेज धर लीही। तुमन गाहू ...
मनखे मनखे ल जान,
सगा भाई के समान।

त अंगरेज ह छोड़य नहीं। अरे मुरूख हो, गोरिया - करिया, नीच -ऊंच, धनी गरीब सब भगवान बनाये हे। तोला तुम मेट दुहू। मनखे मनखे कइसे एक हो जाही। फेर गाथव तुम ‘‘मंदिरवा म का करे जइबो, अपन घट ही के देव ल मनइबो।’’ इही सब गाना ये। मंदिर म नई जाये सकेव त घर के देव ल मनइबो।’’ इही सब गाना ये। मंदिर म नई जाये सकेव त घर के देव ल मनाथव। सुन्दरलाल महराज ह दू चार झन सतनामी ल एक दिन मंदिर में खुसेर दिस त का होगे। बाम्हन चलाकी चल दिस। न एती के होयेव न ओती के। बाबू रे, पंथी गाना बंद करो। यहा तरा हमला डेरवावत हे मंडल। अंकलहा के बात ल सुन के मंडल ल गजब रीस लागिस। मंडल किहिस - ‘‘दू ठन डोंगा म पांव धरही, तौन बोहाबे करही अंकलहा। दाऊ बिसनू के चाल हम जानत हन। तंय झन कर फिकीर। नाच अउ नचवा। गीत ल सब गा। अउ एक ठन गीत अऊ गा।’’
का गीत मंडल?

अंकलहा पूछिस। मंडल किहिस - --ये दे गीत ल सुन जी।’’
भैया पांचो पाण्डव कहिए जिनको नाम सुनाऊं
लाखे वामन राव हमारे धर्मराज को है अवतार
भीमसेन अवतारी जानो, लक्ष्मीरनारायन जिनका नाम 
डागा सह देव नाम से जाहिर,
रऊफ नकुल को है अवतार
ठाकुर अर्जुन के अवतारी योद्धो प्यारेलाल सरदार।

ये सब हम रइपुर जाथन आथन त सुनथन जी। छत्तीसगढ़ महतारी के पांडव ये येमन। गीत गावव। बाजा बजावव। बिसने सही बेईमान मन के बात ल कान झन दव। समझाय बुझाय के बाद घनाराम मंडल अपने बेटा ल हुंत करइस। सोरा बछर के सामलाल आके खड़ा होगे। मंडल किहिस सामनलाल अंकलहा कका, महराजी कका मन पांव छू के आसिर बाद ले बाबू।

समलाल दूनो झन के पांव परिस। अंकलहा किहिस - मंडल, हमर पांव परवाके तै अनीत करथस गा। हमला कोनो पांव नई परंय। जात-पात माड़े हे मंडल।
मंडल किहिस - ‘‘अंकलहा, तंय मोर भाई अस के नहीं? 
भाई आस त समेलाल के का, लाग होय?
कका तान भई अंकलहा किहिस

‘‘त कका के पांव भतीज नई परही जी। अच्छा बताय तहूं ह।’’
अभी मंडल कुछू अउ कहे पातिस तैइसने चाहा आगे।
सबो मन चाहा भड़किन। कप सासर ल अभी भुइयां म मड़ाय नई पाय रिहिन तइसने पहंचगे बिसनू दाऊ। घनाराम किहिस - ‘‘ले, कथे नहीं, नाचत रिहिन जोगी तेमा कूद परिन सन्यासी। अरे भाई, बिसनू दाऊ घलो आगे। लानव रे चाहा।’’

बिसनू दाऊ नता म मंडल ल मानय भांटो। किहिस - ‘‘भांटो, बुढ़ा गेस फेर ठठाय बर नई छोड़े।’’
घनाराम भला कहां चुप रहइया ये, उहूं तगड़ा जवाब दिस - ‘‘अइसे ये बाबू रे, ठठाही किके तो बहिनी देहच। अब काबर करलाथे।’’
अपन अस मुंह लेके रहिगे बिसनू दाऊ। सामलाल फेर चाह लेके अइस। बिसनू दाऊ किहिस - पांय लागी भांचा। कब हबरे ग।

सामलाल लजागे। चाहा देत खानी बिसनू दाऊ के नजर परगे सामलाल के जेवनी हाथ म। चाहा देत खानी बिसनू दाऊ के नजर परगे सामलाल के जेवनी हाथ म। चाहा पिये बर छोड़ दिस बिसनू। किहिस 
‘‘भांचा, यहां का लोर उपटे हे हाथ म भाई, हाथ, करियागेहे।’’
समलाल कुछू नई किहिस। घर भीतर चल दिस। मंडल किहिस ‘‘तै तो आस कंस ममा। इहां दिन भर गांधी बबा के गुन गाथस अउ रात कुन डल्ला उड़ाथस। जिंकर संग डल्ला उड़ाथस बाबू रे उही सिपाही मन मारे हे सामलाल ल।’’

का किथस भांटो? बिसकुटक झन सुनाय कर। फरी फरा बता। बिसनु किहिस।
सब्बो बइठया तन अकबकागें। घनाराम मंडल तब बतइस - ‘‘सामलाल के ममा रिथे दुरूग में। उहां वे गुरूजी हे। सामलाल ओकरे हाई स्कूल म पढ़ेबर दुरूग गे हे। नवमीं पढत हे ग। का करबे, हमर तीर तखार म तो हाई स्कूल नइये। भेजेंव रे भाई। बड़े बेटा चुन्नीलाल ह तो चौथी पढ़के घर के खेतीबारी देखत हे। तिपोय बर बहू आगे। ये दे छोटू ल पढ़ा परतेंव कहिके भेज देंव दुरूग। उहां लइका ह सुराजी मन के संगत म देस के काम करे धर लिस। पर्चा बांटय, पोस्ट आफिस के लाल डब्बा म तेजाब डारय। लइका दल के दू टूरा पकड़ा गे। सामलाल ल पकड़ के लेगिन अउ किहिन - हाथ ल खोल बेटा पा ईनाम गांधी के सिपाही बने के। सुराजी बनत हे साला ह। लइका ल तीन बेंत के सजा दे गीस। पहली एक सिपाही हाथ ल कोहनी मेर ले धरिस, दूसर ह सिलकन के कपड़ा ल पानी म बोर के हाथ में मड़इस, तीसर ह, कांख के मारिस सट ले। मोर बेटा, फूल के झेला एके बेंत म बिहूस होगे। अऊ मारिन। सजा ताय। ओकरे सेती करिया गे बिसनू।’’

बतावत बतावत आंखी म आंसू आगे मंडल के। अंकलहा किहिस - ‘‘फेर का करबे, हमी मन गद्दार हन?
बिसनूदाऊ ला लागिस जइसे अंकलहा हा ओकर मुंह म खखार के सब के आगू म थूक दिस।
घनाराम अंखियाइस अंकलहा ल।

टंकलहा चुप होगे। महराजी किहिस - ‘‘मंडल, तोर बेटा ये। सुराजी तो बनगे करही। करेजा चाही सुराजी बने बर। घर म बला के हइतारा मन संग डल्ला उड़ाना सरल हे अउ बेंत खाके गांधी बबा के काम करना अऊ जहल जाना गजब कठिन।’’
‘‘जेखर राहय लोहा के दांत, तऊन खाय ससुरार के भात’’....
फोकट नई केहे गेहे। तैं तो जस के तस हस मंडल, फेर सामलाल निकलही सुराजी। हमन तो मर-खप जाबो। सामलाल देखही देस के आजादी अऊ चमक ल।

घनाराम मंडल महराजी के बात सुनके उठ बइठिस। किहिस - ‘‘महराजी, राज करंते राजा नई रहि जाय, रूप करंते रानी। रहि जइहंय ग नाव निसानी। ले चलव भइया, हो। उठव रेंगव गजब दुरिहा जाना हे।’’ 


गीता अउ माला

एक गांव मां एक झन बांभन रहिस। वोखर बेटा-बेटी नइ रहिस। रात-दिन ओ हर गीता पढ़ै अउ माला जपै। एक दिन रात कन सपना देखिस के गीता अउ माला हर ओखर बेटा आय। ओहर इही ला बेटा मान के ओखर बिहाव एक सुंदर कन्या संग कर के बहू अपन घर ले आनिस। सपना के ये बात ला ओहर अपन घर वाली ल बताइस। बांभन-बांभनी सुंता हो के सपना ला सिरतोन मान लीन। बांभन हर एक हांत मां पनही अउ दूसर हात मां छाता अउ गीता-माला ल झोरा मां धर के बहू खोजे बर निकल गिस।

रेंगत-रेंगत जब थक जाए, तब कोनों झाड़ के तरी बैठ के सुरता लय अउ ओतका बेरा छाता ओढ़ लय। जब कभू नदिया - नरवा नांहके ला होय त पनही ला पहिर लय, नइ तो ओला हांत मां रे-धरे रेंगय। बांभन के संग मा रेंगइया मन बांभन के अइसन उलटा चरितर ला देख के कउवा गे अउ कांहय के ये कइसना मुरुख आय, जउन भूंया मां रेंगथे त पनही ला पाहिर लेथे। घाम मा रेंगथे त छाता ला धरे रइथे अउ छैइहां मा बइठथे त छाता ओढ़ थे। तब दूसर संगवारी कइथे, हिं ग भाई ये बांभन ह मुरुख नद्द आय ये ह चतुरा है काबर के जब पानी मां रेंगथे तब पनही ला येखर सेती पहिरथे के पानी के रहवइया सांप मंगरा मन तो दिखै नाहिं, कहूं चाब चूबू झन दंय, कइ के पहिर लेथे अउ भूंया ल देख-देख रेंग जथे। ओइसन हे जब कोनो झाड़ तरी बइठथे त छाता ला येखर सेती ओढ़ लेथे कि कहूं चिरइ चिरगुन मन ओखर ऊपर हगै-मूतैं झन। जउन ओला मूरुख काहत रहिस हावय तउन कहिस हां ग त तो बांभन ह चतुरा हे।


रस्ता मां एक ठन गांव अइस, तिहां अमा के बांभन कुंवारी क.या बिहाव लइक पूछिस। ओ गांव के एक झन बांभन ह ओला अपन घर लेगे। सगा ल बने सुग्घर चतुरा नोनी अपन बाबू बर खोजत हौं। गांव के बांभन कहिस फेर ये तो बता ग के लइका ह कइसनहा हे अउ का बूता करथे। त ओला बता देइस के मोर लइका ह पढ़े बर आन देस गे हे। टूरी ला देख के पसंद करके
ओखर बिहाव अपन गीता-माला संग कर देए बर गोठियाइस। बांभन ह अपन बेटी के भांवर गीता-माला संग कर देए बर राजी होगे त उपरोहित ला बलवा क सुग्घर लगिन निकलवा के गीता-माला संग नोनी के बिहाव पर दिस।
बहू बिदा कर के बांभन अपन घर लहुट अइस। बांभनी हर गोरी नारी गुनवंती बहु पा के बड़ खुस होगे। बने हंसी खुसी मां कुछ दिन बीत गिस। बांभनी हर अपन बहू ला घर के सब काम-बुता बता-चेता के सिखा दिस अउ बता दिस के उपर पटऊंहा के कुरिया ला झन खोलबें। एक दिन के
बात ए, घर मां सिपचाय बर आगी नइ रहिस, त परोसी घर आगी मांगे बर बहू ह चल दिस। उहां ओला बता देइन के ये बांभन के तो कोनो बेटा-बेटी नइ आय, तोला ठग के बिहाव कराके ले आने हाबय। ये मन ला बूढ़त काल मां तोर असन नौकरानी मिल गे हे। ऐसनहा बात ला सुन के बिचारी ला बड़ दुख होइस अउ रोए लगिस। रोत-रोत उपर चढ़ गे अउ जउन कुरिया ला खोले
बर सास ह बरजे रहिस, तउन ला खोल डारिस। दुवारी ला खोल थे त का देखथे के भगवान सत्य नारायण स्वामी ह साक्षात बइठे हे। भगवान के पांव मां गिर के ओ हा रोए लागिस। भगवान ह खुस होगे कहिस रो झन, जा मैं ह तोर आदमी बन के तोला मिलहूं। आज जब पूरा के बेरा होही त मोर पहिरे बर एक ठन धोतियां मांगवे। जब हार थक के बांभन ह मोला सुमरही त मैंह आ जाहूं।

जब पूजा के बेरा होइस, तब बहू ह अपन ससुर ल कइथे, उनखर पहिरे बर नवा धोती लावौ अउ उन ला बलावौ, संगे पूजा करबो। ससुर ह नवा धोती त ला देइस, फेर बेटा कहां ले लानय। ओ हर संसो मा पर गे। हार के रो-रो के भगवान ला कइथे, मोर लाज तहीं हा बचा भगवान। बांभन के पुकार ला सुन के भगवान ह बांभन के बेटा बन के आ जथे। उपर के कुरिया के दुवारी ह अपने अपन खुल जथे, भगवान ह उतर के आ जथे, अउ कइथे मैं ह तोर बेटा बन के आ गेयेंव, मैं हर तोर पूजा पाठ ले खुस हो के तोला सपना देय रहेंव। जम्मों झन बड़ खुस होगे भगवान के पूजा करथे अउ हंसी-खुसी म रेहे लगथे। 

चित्रगुप्त के इस्तीफा

यमराज – मिरतू के देवता
चित्रगुप्त – यमराज के मुकरदम, जीव मन के पाप-पुण्य के हिसाब रखईया
यमदूत – यमराज के दूत
एक आत्मा – टेस्ट-ट्यूब बेबी के आत्मा
दूसरा आत्मा – कोख किराया लेके पैदा होये मनखे के आत्मा
तीसर आत्मा – क्लोन के आत्मा
ब्रम्हा, विष्नु, महेष -  त्रिदेव
( यमलोक म यमराज के राज-दरबार म यमराज अउ चित्रगुप्त गोठियात हें )

यमराज – इस्तीफा ?
चित्रगुप्त - हाँ महराज मोर इस्तीफा।
यमराज - इस्तीफा ! ये इस्तीफा काये चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त - इस्तीफा, इस्तीफा होथे महराज।
यमराज - फेर येला तो मैं पहली घंव सुनत हँव चित्रगुप्त। येला तैं कहाँ ले पागेच अउ येकर का अरथ होथे, तेनो ल तो बता ?
चित्रगुप्त – महराज जब कोनो ल ककरो इहाँ नौकरी नइ करना रहय त अइसने लिख के दे जाथे, तेन ल इस्तीफा कहिथे, ये हर मिरतू लोक के शब्द ये महराज।
यमराज - हमर इहाँ ये इस्तीफा-फिस्तीफा ह नइ चलय चित्रगुप्त तोला बुता तो करेच ल परही नइते मैं तोर बुता बना देहूँ।
चित्रगुप्त - मैं ह आप मन संग अतेक दिन ले अड़बड़ मिहनत अउ ईमानदारी ले बुता करत आत हँव फेर अब मोला अइसे लागत हे, के मोर हिसाब-किताब ल ये मनखे मन गलत करवाके मोर फजीहत करवा दिही।
यमराज – का होगे तेमा ?
चित्रगुप्त – काय नइ होये महराज ?
यमराज – काय नइ होये ये ?
चित्रगुप्त- बहुत कुछ होगे महराज।
यमराज - देख चित्रगुप्त तैं ह तो जानत हस तोर बिन मोर काम नइ चलय। मोला अइसे लागत हे सरलग अतेक दिन ले अतेक जादा बुता करत-करत बुता के बोझा म चपका के तोर चेत-बुध हरागे, बइहा-बरन कस तोर हाल होगे हे। तिही पाय के आँय-बाँय गोठियावत हस। थोकन अपन दिमाग ल ठंडा रख अउ सोझ-सोझ गोठिया नइते कहूँ मोर सुर बदल जाही त एकाद गदा ठठा देहूँ।
चित्रगुप्त – ठठाबे ते ठठा ले महराज फेर मैं अब ये बुता ले हक खा गे हँव।
यमराज - ये चित्रगुप्त तैं ह एक ठन नवा चरित्तर ल नइ देखत अस का ?
चित्रगुप्त – मैं ह कई ठन चरित्तर ल देखत हँव तेकरे सेती तो इस्तीफा देत हौं। फेर आप-मन कोन चरित्तर के गोठ करत हव ?
यमराज - ये जमदूत मन कइसे बाबू-पिला के आत्मा ल जादा धर के लानत हें अउ माइलोगिन मन के आत्मा ल कमती लानत हें ?
चित्रगुप्त – आजकल पिरथी म माइलोगिन मन के संख्या कमती होवत जात हे तेकर सेती कमती लानत हे।
यमराज – कमती काबर होवत हें ?
चित्रगुप्त – वो का हे महराज मनखे मन अइसना मषीन बना डारे हें के पेटे भीतरी ले जान डारथें लइका ह नोनी ये धन बाबू। नोनी होइस तहान ले अब्बड़ झन मन वोला पेटे भीतरी मरवा देथें।
यमराज - ओ हो ! ये तो बिलकुल गलत होत हे। अइसना करइया ल तो कड़ा से कड़ा सजा मिलना चाही। हमर कानून म येकर बर का सजा हे ?
चित्रगुप्त – अइसना कानून तो नइये महराज पहली अइसना नइ होवत रहिस, होय घलो हे त वो केस ल भगवान खुदे देखे हे। परीक्षित ल मारे बर अष्वत्थामा ह कोषिष करे रहिस तेकर सजा भगवान श्रीकृष्ण जी ह खुदे दे रहिस। वोकर माथा के सार चीज बुद्धिरूपी मणि ल सइघो बाहिर निकाल ले रहिस अउ तउने बेरा ले वोकर तन म कुछ नइ रहिगे, जीव भर के छोड़े।
यमराज - येकर बर नवा कानून बनवाये ल परही।
चित्रगुप्त - सही बात ये महराज।
यमराज – अवइया आत्मा मन म एक ठन बात अउ देखे म आवत हावय के आजकल छोकरी मन के आत्मा जादा आवत हे, डोकरी-ढाकरी मन के आत्मा ह कमती आवत हे अइसना काबर होवत हे चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – दाईज महराज दाईज।
यमराज - दाईज के मरई ले का लेना-देना हे ?
चित्रगुप्त - दाईज के तो लेना-देना हे महराज। कमती दाइज लाथे त ससुरार के मन बहू ल कइसनो करके मरे बर मजबूर कर देथें। अपन होके नइ मरय त बरपेली माटी तेल डार के जला के, नइते फाँसी म अरो के मार देथें महराज। तइहा घलो तो कहयँ भागमानी के पत्तो मरथे, तेने ल करत हें।
यमराज - पहली तो अइसना नइ होवत रहिस चित्रगुप्त, ये मनखे मन का-का करे बर धर ले हें ?
चित्रगुप्त - कलजुग नोहय महराज, मनखे जेन कर दय कमतीच हे।
यमराज – सिरतोन ए।
चित्रगुप्त - महराज एक ठन अउ गड़बड़ी होवत हे।
यमराज – तैं आज गड़बड़ी के छोड़ अउ काँही नइ सुना सकस चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – अइसे हे न महराज गड़बड़ी ल तो बतायेच ल परही। नइते पाछू आपे मन काबर नइ बताये कहिके बद्दी देहू।
यमराज - ले भई बता डार।
चित्रगुप्त – यमदूत मन जेन आत्मा मन ल धरके लानत हे उँकर मिलान करे म कई झन तो उँकर लेखा-जोखा ल सुनाबे त सोझ कहि देथे ये सब गलत-सलत हे न तो हमर ये नाव रहिस जेन कहत हव न वइसना करम तो हम कभू करेन। नाव पता बताबे त कहिथें हम तो उहँा कभू रहिबे नइ करेंन जेन बतात हव सब गलत हे। यमलोक म तको भारी भ्रष्टाचार फैलगे हे तइसे लागथे कहिथें महराज। पता करे बर यमदूत मन मिरतू लोक जाथे त उँकर कहना सिरतोन म सही निकलत हे उहां उँकरे मुंहरन के वोकरेच हिस्सा के मनखे मिलत हें। यमदूत मन चक्कर म पर जाथे महराज येला धरवँ ते वोला धरवँ येला लेगवँ ते वोला कहिके। ये का होवत हे कँाही समझ म नइ आवत हे ? पहली तो कभू-कभू धोखा हो जात रहिस अब तो अति होगे हे।
यमराज – ये का कहत हस चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – सिरतोन काहत हव महराज।
(बाहिर हल्ला-गुल्ला, नारा बाजी के आवाज होथे)
यमराज – ये बाहिर म कोन मन चिचियावत हें ?
चित्रगुप्त – बाहिर म आत्मा मन नारेबाजी करत हें महराज।
यमराज - वोमन ल बाहिर म कोन छोड़ के आये हे ?
चित्रगुप्त – वोमन ल कोनो नइ छोड़े ये महराज।
यमराज – कोनो नइ छोड़े ए ?
चित्रगुप्त - हाँ महराज।
यमराज - वोमन ल कोन ले के आये हे ?
चित्रगुप्त - वोमन ल कोनो नइ लाये हे, महराज।
यमराज - (चमक के) का कहे वोमन ल कोनो नइ लाये हे, त फेर वोमन इहाँ कइसे आगे ? का तमाषा ए रे।
चित्रगुप्त – वोमन अपने-अपन आगे हें महराज।
यमराज - बिन यमदूत के लाने ये मन अपने-अपन कइसे आ सकथें ?
चित्रगुप्त - कइसे आ सकथें नहीं महराज आ गे हें।
(बाहिर म फेर हल्ला-गुल्ला होथे)
यमराज – वोमन ला भीतरी म लानव अउ उँकर पुण्य-पाप के लेखा-जोखा पढ़के सुनाव।
चित्रगुप्त - इही ह तो हलाकानी के कारण ये महराज येकरे सेती तो मैं ह इस्तीफा देहूँ काहत हँव।
यमराज - फेर तोर इस्तीफा के गोठ आगे न, छोड़ येला अउ बता इंकर लेखा-जोखा ल काबर नइ सुना सकस ?
चित्रगुप्त - हमर सो इंकर लेखा-जोखा ह नइये महराज।
यमराज - अइसे कइसे हो सकत हे के कोनो परानी के पाप-पुण्य के लेखा-जोखा हमर सो नइ रहय ? ये मन पैदा कइसे होगे ? अतका बाढ़ के मर घलो गय अउ अपने-अपन इहाँ तक आ गे। तैं अपन बुता म ढेरियास ल धर ले हस तइसे लागथे चित्रगुप्त अइसना कइसे होगे ?
चित्रगुप्त – होगे भई होगे। कइसे होगे तेन ल मैं हर का जानव। मैं ह तो अतके ल जानत हँव ब्रम्हाजी के डिपार्टमेंट ले इंकर काँहीं विवरण नइ आये हे।
यमराज – ब्रम्हाजी ल चिट्ठी लिखके पूछ बिन बताय ये काय करे ल धर ले हें ? एक तो पहली ले आनी-बानी के, रंग-रंग के जीव-जन्तु बनाके सबके हिसाब-किताब रखे बर कहिके हमन ला वइसनेच्च हक्क खवा डारे हे, तेमा ये उपराहा ले अब नवा जीव मन के जानकारी घलो नइ भेजत हें।
(चित्रगुप्त ह चिट्ठी लिख के पठोथे थोकिन देरी वोकर जुवाब आ जाथे)
चित्रगुप्त – महराज ये दे चिट्टी के जुवाब आगे। उँकर कहना हे जेतका जीव बनाय जाथे एक-एक के हिसाब भेज दे गे हे हमन मिलान कर डारे हन।
यमराज - त ये बुजा मन कहाँ ले आ गे चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त - कभू-कभू भगवान बिस्नू अउ भोले बबा तको तो जीव रच देथें फेर वोकर जानकारी ल तो खच्चित पठो देथें। फेर ये बुजेरी मन बिना लेखा-जोखा के इहाँ कइसे आ गे समझे म नइ आवत हे ?
यमराज - जल्दी पता लगवा तो येमन कोन ये ? कहाँ ले आये हें ? कइसे आयें हें तेन ला ?
चित्रगुप्त – का पता लगवाना येला तो मही हर पता लगाये बर जात हँव। पायलागी महराज।
यमराज - जल्दी जाके पता कर भई।
(चित्रगुप्त के जाना। द्वारपाल ह यमलोक के छोटे कपाट ल खोलथे वोमा ले चित्रगुप्त ह बाहिर निकलथे। बाहिर म आत्मा मन धरना दे हें अउ नाराबाजी करत हें। चित्रगुप्त ल देख के चुप हो जाथें।)
आत्मामन – कपाट ल हेरवा अउ हमूमन ल जल्दी भीतरी म लेग। बाहिर म बइठे-बइठे हमन असकटा गेंन।
चित्रगुप्त – तुँहरेच चक्कर म तो परे हँव ददा हो। तुमन तो मोर दिमाग के बारा बजा डारे हव। कहाँ-कहाँ ले आगे हावव ? कोन तुमन ला इहाँ लाये हे ते ?
एक आत्मा – हमन मिरतू लोक ले आये हन महराज। अउ हमन ल कोनो नइ लाये हे हमन अपने-अपन आये हन।
चित्रगुप्त - अपने-अपन आयके शक्ति कइसे आगे ? अकाल मिरतू ये का ?
दूसर आत्मा - हौ महराज।
चित्रगुप्त – तुमन मे बतावत हमर यमदूत के बिन लाने काबर आगेव ?
तीसर आत्मा – हमन तो उहाँ मरगे रहेन फेर देखेन आपमन के यमदूत मन हमन ला नइ लेगत ये त का करतेन हमन जुरिया के उँकरे पाछू-पाछू आगेन। अब हमन ला भीतरी म नइ खुसरन देत रहिन त का करतेन। नारा लगा के जगावत रहेन।
चित्रगुप्त - कलेचुप भीतरी चलव अउ अपन नाव पता अउ जनम स्थान ल एक-एक करेक बताहव। द्वारपाल मन मोला तुँहर बारे म बताये रहिन फेर तुँहर काँहीं विवरण नइये ते पायके मे ह बने ढंग ले तुँहर मन के जाँच करके देख हँव। एक-एक करके ये मेर आहू अउ ढलंगत जाहू। बाँचे मन हल्ला झन करहू।
(सब झन ला एक-एक करके बताए जघा म सुताके अपन ह धियान लगाके आगू म बइठे राहय बीच-बीच म छू-टमड़ के देखत जाथे। फेर मुड़ी ह सब झन के दरी नहीच म हालत जाथे। आखरी म उठके बइठगे अउ अपने-अपन बड़बड़ाय बर धर लीस।)
चित्रगुप्त - (अपने-अपन) – अतेक झन ल जाँच कर डारेंव फेर ककरो काँहीं लेखा-जोखा नइ मिलीस। अउ ते अउ ब्रम्हाजी के टेªडमार्क घलो इंकर माथा म नइये। अउ न कोनो देवी-देवता के घलो टेªडमार्क दिखत हे। येकर मतलब हे के इनला न तो ब्रम्हाजी बनाय हे अउ न कोनो आन देवी-देवता मन बनाये हें। त येमन ला बनाय तो बनाये कोन होही ? इंकरे सो पूछ लँव कहूँ कोनो जानत होही ते।
चित्रगुप्त - तुमन के जाँच करके देख डारेंव फेर तुमन कहाँ के मेड इन अव तेन ल नइ जान पायेंव। तुमन कहाँ कइसे पैदा होय हव काँहीं पता हे त बतावव ?
एक आत्मा – इंकर ल तो मैं हर नइ जानव फेर मोर दाई ह बताये रहिस मैं हर परयोगषाला म पैदा होय रहेंव टेस्ट ट्यूब बेबी अव। मोर जनम ह भगवान के संजोग ले नहीं बिज्ञानिक मनके दिमाग ले होये रहिस।
दूसर आत्मा - ‘‘हमला तो हमर दाई-ददा मन कोख किराया लेके डाॅक्टर मनके दिमाग अउ मिहनत ले पैदा करवाय रहिस।’’
तीसर आत्मा – मैं हर तो अपन दाई के शरीर के कोषिका ले पैदा करे गे हँव। मैं हर अकेल्ला नहीं मोरेच कस दस झन बनाये गे हे, हमन सब्बो झन एक्केच बरन दिखथन हमन ला क्लोन कहिथें।
(चित्रगुप्त मुड़धर के भीतरी खुसरथे अउ राज-दरबार म जाके यमराज ल जाके बताथे)
चित्रगुप्त - ये मनखे मन भारी लाहो ले बर धर ले हें। येमन जम्मो नियम ल उलट-पलट करत हें महराज।
यमराज – का नियम ल उलट-पलट करत हें ?
चित्रगुप्त – ब्रम्हाजी जीव नइ बनाना चाहत हें उहाँ येमन जीव बनावत हें। ब्रम्हाजी ह एक ठन जीव बनाके मिरतू लोक म भेजत हें त ये मनखे मन तो वोकर ले पता नहीं के ठन बनात हें महराज। इही पायके मोर हिसाब-किताब ह मिले ल नइ धरत रहिस अब समझ म बात ह आइस।
यमराज – तइहा मनखे मन जादा गड़बड़ नइ करत रहिन। कोनो-कोनो रिसी-मुनि मन भर कभू-कभू अइसनहा करय उँकर सो अइसना करे के शक्ति रहिस। फेर आज तो मनखे जेन मन म आत हे करत हें।
चित्रगुप्त – सिरतोन कहेव महराज येकरे सेती तो मैं ह इस्तीफा देहूँ काहत हँव।
यमराज – तोर गोठ ल सुन-सुन के मोर दिमाग ह घूमे ल धर ले हे अउ तैं ह घूम-फिरके भइगे इस्तीफा के रटन धरे हस। ये मनखे मनला जेन करना चाही तेन ला करय नहीं अउ येती-तेती के जम्मो लंदर-फंदर म परे रहिथें।
चित्रगुप्त – बने काहत हव महराज।
यमराज – फेर मनखे के दिमाग ल माने बर परही चित्रगुप्त। काय-काय नइ गुनत रहय, काय-काय नइ करत रहय। वो तो बने होथे के बीच-बीच म परलय मचा के दुनिया के शुरूआत फेर से करे के रिवाज बनगे हे नइते येमन तो हमर संगे संग ब्रम्हाजी ल घलो सोज्झे रेंगा देतिन।
चित्रगुप्त – येकर काहीं उपाय खोजे बर परही महराज।
यमराज – उपाय तो खोजेच बर परही फेर ये हमर हाथ-बात थोरे ए। ब्रम्हाजी सो खबर पठो तो बड़ भारी समस्या आगे हे तुरतेताही सबो देवी-देवता के मिटिंग रखना हे।
(ब्रम्हा, बिस्नू, महादेव अउ जम्मो देवी-देवता मन जुरियाये हें। यमराज सबो झन ला अपन अभी के अउ अवइया नवा समस्या ल उँकर आगू रख डारे हें। उँकर बीच सोच-विचार चलत हे का फैसला ले जाही ये तो अवइया समय ह बताही।)


नरेन्द्र वर्मा
सुभाष वार्ड, भाटापारा
जिला – रायपुर (छत्तीसगढ़)
पि. को. – 493118
मो. नं. 94255-18050
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बम-निकलगे दम

बम  ! जइसने बम के गोठ निकलिस रेल ह थरथरागे अउ वोकर पोटा कांपे ल धर लिस। वोला बम फूटे ले छर्री-दर्री होके छरियाय रेल अउ मनखे मन के सुरता आगे। मनखे मन के जी घलो धुकुर-पुकुर करे लगीस। 10 बज के 51 मिनट म जइसने रइपुर जवइया कोरबा-रइपुर लोकल टरेन ह हथबंद रेलवे टेसन के पलेटफारम नम्बर एक म रूकिस यात्री मन 5 नंबर के बोगी ले बतकिरी कस भरभरउहन निकले ल धरलिन। जंगल म लगे आगी कस बम के गोठ ह टेसन म बगरगे। डरपोकना मन टरेन ले उतरके दूरिहा होगे। फेर अब्बड़ मनखे वो बोगी के तीर म आके खड़े होगे। कभू बाप-पुरखा म बम नई देखे रहिन, देख लेतेन कहिके कइ झन आधा डर, आध बल करके खड़े रहिन। हिम्मत करके कई झन डब्बा म चढ़गे। वो मनखेच का जेन डर्रा जावय। मनखे आज अतका आगू बाढ़े हे येमा वोकर हिम्मत अउ बुध्दि के बड़ हाथ हे। कई झन अटेची ल दूरिहा ले देखिन अउ कइयो झन तो वोला उठा के, हला-डोला के घलो देख डारिन। वोमन आपस में गोठियाय लगीन, ‘टाइम बम तो नोहय वोमा ले टिक-टिक अवाज आथे, येमा ले कांही अवाज नइ आवत हे। ये दूसर किसम के बम होही। जेन अटेची खोले म फूटत होही।’
25 जुलाई 2008 दहला बेंगलूर 9 धमाके, सीरियल ब्लास्ट में 2 की मौत 12 घायल।
— 26 जुलाई 2008 अहमदाबाद में एक के बाद एक 17 धमाके अहमदाबाद थर्राया, साइकल पर रखे गए थे टिफिन बम। सिलसिलेवार हुए सीरियल ब्लास्ट से थर्रा उठा अहमदाबाद शहर भी, 18 की मौत 100 घायल धमाकों के बाद अफरा-तफरी। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर और भिलाई जैसे शहर में नक्सली दहशत। हिंसा सिरिफ छत्तीसगढ़ भर म नहीं, जम्मो भारत अउ दुनिया म चलत हे। समाचार मन अइसने खभर ले भरे परे रहिस। आन ल दु:ख देके भला मनखे कभू सुखी रहि सकथे?
— 27 तारीख दिन इतवार जुलाई महीना सन् 2008 के गोठ आय। रइपुर जवइया कोरबा-रइपुर लोकल टरेन ह भाटापारा टेसन म देरी ले आइस। काबर नइ आतिस, भारतीय टरेन नोहय ग। भाटापारा पलेटफारम म जतका सवारी उतरिन वोकर ले जादा वोमा खुसरगे। कइसे खुसरिन येला तो खुसरइयेच मन जान सकथें। जतका बइठे रहिन वोकर ले जादा खडे रहिन। बइठे रहिन तिंकर भाग ल सबो संहरावत रहिन, कोनो जनम के पुन परताप रहिस होही जेन टरेन म बइठे बर जघा मिलगे। रेलगाडी ह रेंगिस तहान सवारी मन ल थोकिन कल परिस। गरमी के मारे हक्क खा गे रहिन। बरसात के समे रहिस तभो ले पानी बरसात के पता नइ रहिस। कोनो कहय के भगवान रिसा गे हे, कोनो काहय के सब मनखे के करमदंड आय। 5 नवम्बर के डब्बा म एक झन कहिस- ‘ये काकर अटेची ये अतेक बड़ ल बीच में मढ़ा दे हे, बइठत नइ बनत हे।’
— दूसर ह कहिस- ‘सिरतोन गोठ ताय येला उप्पर म मढ़ा देतिस नइते सीट के नीचे राख देतिस।’ फेर कोनो कांही जुवाब नइ दीन। मनखे के साध घलो थोक-थोक म बदलत रहिथे। टेसन म खड़े यातरी मन बिनती करत रहिन रेलगाड़ी हब ले आ जातिस अउ बने फसकिरा के बइठे बर जघा मिल जातिस भगवान। जइसने मनखे के एक साध पूरा होथे दूसर आगू म आ के ठाढ़ हो जाथे, येकर कोनो सीमा नइये। अउ मिल जातिस अउ पा लेतेंव- इही सोच ह मनखे ल भटकाथे अउ दु:ख देथे। येकरे सेती कहे गे हे ‘संतोषी सदा सुखी।’
— काकर अटेची ये पूछे म कोनो नइ बताइन त वोमन गुनिन भइगे जेकर ये तेन पानी-किसाब गे होही। थोकिन म पूछ लेबो तब तक आ जाही। खिड़की तीर म बइठे एक झन कहिस- ‘में ह कोरबा ले आवत हौं फेर ये अटेची वाला ल नइ देखे अंव।’ अतका ल सुनिन तहान ले सबके मति छरियागे, चेत-बुध हरागे, उंकर मन म आनी-बानी के संखा होय लगीस। जतके मुंह वोतके गोठ। एक झन कहिस- ‘येला कोनो जान सुन के राखे हे मतलब खतरा।’ दूसर ह पूछिस- ‘का खतरा जी?’ पहलइया ह कहिस- ‘कुछु भी हो सकथे।’ दूसर ह कहिस- ‘का कुछु सोजबाय कह ना गोठ ल भंवा-भंवा के काहत हस।’ पहलइया कहिस- ‘लहास नइते बम।’ बम के नाव सुनिन त कइ झन के डिमाक भक्क ले उड़ागे। आनी-बानी के गोठ उसरे रहिस सबके बया भुलागे। एक झन कहिस- ‘सही बात ये यार, कोनो अइसने छोड़ के थोरे रेंग दिही। कुछु न कुछु गड़बड़ तो हे।’ गाड़ी ह जइसने टेसन म रूकिस, ये गोठ टेसन अउ रेलगाड़ी भर बगरगे। जेन ल अपन जीव के डर रहिस तेन मन तुरत-फुरत गाड़ी ले उतर के दूरिहागे। बोगी नम्बर 5 खाली होगे। जीव के डर सबला रहिथे कोनो ल कमती कोनो ल जादा। फेर हिम्मत बड़े चीज आय।
— अब्बड़ झन हिम्मत करके बोगी म चढ़के अटेची ल देखे लगीन। कोनो तीर ले कोनो दूरिहा ले। कइयोझन अइसनो रहिन जेन मन बल तो नई करत रहिन फेर अटेची देख के लहुटइया मन सो चेंध-चेंध के, तिखार-तिखार के पूछ के सब बात के पता करत रहिन। आगू जाना जरूरी हे तेन मन कोनो आगू अउ कोनो पाछू के डब्बा म जाके बइठे बर धर लीन। पाछू के बोगी म जाके बइठ गे राहय उनला तो इहू होस नहीं रहिस के कहूं 5 नम्बर के बोगी म बम ह फट जाही त पाछू के बोगी मन तो खपलाबे करहीं। काला समझाबे, अइसे लागथे भगवान ह आजकाल कमती डिमाकवाला मनखेच बनाना बंद कर देहे।
— एक झन सियनहिन अपन बेटी अउ नाती टूरा ल लेके 6 नम्बर के डब्बा म चढ़िस। सियनहिन एक जघा बइठ के चैन के सांस लेत कहिस- ‘परान बांचिस ददा रोगहा मन बइठे रहेन तिंहा बम रख दे हें।’ एक झन सवारी ह पूछिस- ‘कहां बम रख दे हावय दाई?’ सियनहिन दाई- ‘येकर पहिली वाले डब्बा म कोनो परलोखिया अटेची म बम डार के मढ़ा देहे।’ दूसर सवारी- ‘बम राख देहे त तैं ह ये डब्बा म काबर चढ़े दाई?’ सियनहिन- ‘जान बचाना रहिस ते पायके बइठ गेन। कांही गलती होगे का बाबू?’ दूसर सवारी- ‘जबड़-बड़ गलती होगे दाई। कहूं 5 नम्बर के डब्बा म बम फूट जाही त इहू डब्बा नई बाचय। कइसनहा अटेची रहीस?’ सियनहिन दाई- ‘अपन आगू म रखाय अटेची ल देखा के अतके बड़ बिलकुल अइसनहेच रहीस।’ ये हर काखर अटेची ये कहि के कइयो घांव पूछे म कोनो जुआब नइ मिलिस। दू चार झन मन जोर-जोर से हुत कराइन फेर कोनो कांहीं नई बोलिस त वोमेर बंइठे रहिन तिंकर जी सुखागे। वोमन ला भुसभुस गिस इहू मा बम थोरे रखाय हे? सियनहिन दाई कहिस- ‘चल बेटी अब ये डब्बा ले उतर के आन डब्बा म जाबोन हमला परान नइ गंवाना हे।’ अइसे कहिके वोमन तीनों झन हब ले उतरगे। उंकरे संगे-संग अउ बहुत झन उतरगें। एक झन लइका अपन दाई सो गोहनावत रहय- ‘दाई, बम देखबो।’ महतारी- ‘वोला का देखबे बेटा चल इहां ले, फूट फाट जाही त जंउहर हो जाही।’ लइका-’नहीं देखबोन कतका बड़ हे? बने बड़ेकजन होही ना दाई? लेगे के लइक होही त हमर वोला घर लेगबो। देवारी तिहार आही न उही म फोरबो।सारा मोटू ह बड़हर हे त बड़े-बड़े दनाका-बम फोरके हमन ला बिजराथे। वोला फोर के देखाहूं देख बेटा बम काला कहिथे।’ वो लइका बिचारा ह का जानय आतंकवादी मन कइसना बम फोरथे तेन ला। वो मन हा खुद तो फूटथे फेर संगे-संग फोरथे दाई के सपना, ददा के गरब, बाई के चूरी अउ लइकामन के भविस ला। लइका- ‘दाई हम बम ल देखबो।’ महतारी- ‘झन देख रे बेटा अइसना चीज ह देखे बर झन मिलय तेने बने हे।’ लइका- ‘नहीं ग हम देखबोन।’ अइसे काहत अटेची के बटन ल चपक दिस वो फट ले खुलगे। तीर वाला बटन ल चपके रहिस ते पाय के पूरा नइ खुलिस। टूरा के दाई ह झट ले बटन ल चपक के बंद करिस अउ टूरा ले जोर से एक थपरा मारिस। टूरा ह रोये बर धर लिस। वोकर दाई कहिस- ‘झन छू कहिथंव त नइ मानस रोगहा चुप बइठ नइते दूनों गाल ल अंगाकर रोटी कस पो देहूं।’
— वोतके जुआर एक झन नोनी ह अपन गियां संग आके खाली सीठ म धम्म ले बइठ गे। वो ह अपन संगवारी ल कहिस- ‘चल गोई ये मेर बइठे बर सीठ तो मिलिस खड़े-खड़े गोड़ पिराय ल धर लिस। भगवान भला करय रोगहा बम रखइया के।’ संगवारी हांस के पूछिस- ‘कइसे तेहां असीस देवत हस धन गारी?’ नोनी कहिस- ‘दूनों देवत हंव, उंकर सेती बइठे ल मिलिस तेकर सेती असीसी अउ बम राख दे हे तेकर सेती गारी देवतहंव।’ वो नोनी के हिम्मत देखे के लइक रहीस अटेची ल उठा के देखिस अउ कहे लगीस- ‘अब्बड़ गरू हे सिरतोन म बम हे तइसे लागथे।’ संगवारी कहिस- ‘कइसे करथस वो बम ह फूट जाही त?’ नोनी- ‘त का होही?’ संगवारी कहिस – ‘अरे बबा काल के मरइया आजेच मर जाबो।’ नोनी- ‘मरना तो हे न?’ संगवारी – ‘हौ।’ नोनी- ‘त का फरक परथे काली के मरइया आजे मर जाबो, एक दिन तो सबला मरनेच हे। कोनो अमरीत पी के तो नइ आय हे जेन सदा दिन जीयत रइही। हमर भाग म बम फूटे ले मरे के बदे होही त वोला कोन टार सकथे।’ वो कहिथे न- ‘राखही राम त लेगही कोन, लेगही राम त राखही कोन।’
— एक झन कहिस- ‘का बताबे सिरतोन म बहुत बुरा हाल हे। जुन्ना रेलवे पुलिया अउ करमचारी मन के लापरवाही ले वइसने जब नहीं तब जिहां नइ तिहां बम फोरत हे गोली चलावत हे। इंकर मारे तो कहूं आना-जाना घलो मुसकुल होगे हे। हिंसा ले सुख, खुशहाली अउ सांति लाए के उदिम अउ हिंसा ले ये नई लाय जा सकय। येला लाय बर दया-मया, भाईचारा अउ अहिंसा के रद्दा ल अपनाए ल परही।’
— कोनो जाके टेसन मास्टर ल बता दिस। रेल म बम हे कहिके सुनिस त वोकरो तरुआ सुखा गे। वो ह एक झिन पोटर ल कहिस- ‘जातो देख के आ लोगन का अटेची अउ बम कहिके आंय-बांय बकत हें।’ पोटर डब्बा मेर गिस दू-चार झन सो पोटर ह टेसन मास्टर तीर जा के कहिस- ‘कुछु समझ म नइ आवत ये दूनों डब्बा म अटेची हे फेर वोमा का हे ओला खोले म पता चलही।’ थोकिन देर म झंडी धरे एक झन मनखे आइस उहू डर्राय बानी देखिस अउ सूट ले चल दिस। ए दारी टेसन मास्टर जांच करे बर आइस। उहू ह थोकन ऐती-तेती देख के रेंग दिस। आफिस म जाके तिल्दा, भाटापारा, रइपुर, अउ बिलासपुर टेसन ल बम के खभर फोन ले दिस अउ आके 5-6 नम्बर के बोगी ल खाली करे बर कहिस। बांचे मन समान ल धर के उतरगे। आरपीएफ अउ जीआरपी वाले मन आइन अउ एक-एक करके बारों बोगी के जांच करिन। दू झन आइन अउ वो अटेची मन ल बांस म फंसा के डब्बा ले उतार के पलेटफारम म पटक के देखिन त पता चलिस वोमा तो सिरिफ कपड़ा लत्ता भराय हे। बम निरोधक दस्ता के अब तक कांही पता नइ रहिस।
— ये तरह सवा-डेढ़ घंटा सिरागे। फोकटे-फोकट एक ले इक्काइस करइया मन के सेती तो कभू-कभू दंगा-फसाद घलो हो जाथे। अइसना म हमला धीरज अउ सांति ले काम लेना चाही। कोनो कहूं कहि दिस के- कउंआ कान ल लेगे त वोकर पाछू नई भागना चाही। बम के नाव ले के तो कइझन के दम निकलत-निकल बांचगे। कइसनो करके ये नाटक ह सिराइस, सब झन ल हाय जी लागिस। टेसन मास्टर ह कहिस जेन ल जाना हे टरेन म बइठव, टरेन छुटइया हे। कइयो झन पलेटफारम म रहिगे, डर के मारे चढ़बे नइ करिन अउ कइयो झन देरी होय के सेती काम नइ हो पाही कहिके उहें ले लहुटे बर पलेटफारम म रहिगे। डराइभर ह हारन दिस अउ बारा बज के आठ मिनट म टरेन ह धीरे-धीरे रेंगे लगीस…


नरेन्द्र वर्मा
सुभाषवार्ड भाटापारा
Post By : संभव

पईसा म पहिचान हे

रामदास ह समय के संगे संग रेंगे के सलाह सब झन ल देवत रथे। ”जइसे के रंग, तइसे के संगत” अभी के समय मं पईसा के बोलबाला हावय। एक समय रिहिस जब लाखों के काम एक भाखा मं हो जावय। एक जमाना येहू रिहिस कि गांव के नेता हर गली खोर मं परे डरे कागज, सिगरेट के खोखा मं लिख के देवय कि अमुख के मास्टरी बर आर्डर कर दो, अमुख ल पटवारी के नौकरी मं भरती कर दो तहां तुरूते आर्डर मिल जावय। काबर कि ओ बखत के नेता मन अपन घर के धान बेच के नेतागिरी करंय। अपन के सपना बीरान के सुख बर जिनगी जियंय। फेर अब वइसन बात नई रहिगे। अब तो ”हाय पईसा, हाय पईसा तोर बिन करंव कईसा” के जमाना आगे हावय। 
रामदास हर ये समय ल ठऊका पढ़ डारे हावय। वो हर परछल गोठियाथे पईसा ले पहिचान हावय, पईसा के बल मं पहुंच हावय। अधिकारी-कर्मचारी अऊ नेता तोर कतको घसेलहा रइहीं। उंखर संग कतको तोर मितानी, अऊ नता-गोता रइहीं। उंखर तीर जुच्छा हाथ कांही काम लेके जाबे तब ओहू हर अपन हाथ ल हलावत कहि दिहि कि-ले आय हावस तब बने करे, चाहा-पानी पी मैं दौरा में जावत हां। एखर ठीक उल्टा कउनो नावा आदमी अटैयची मं नोट लेके जाही तब कब कस चिन्हार ओखर संग बइठ के ओखर बूता ल करही तभे चैन के बांसुरी बजाही। तेखरे सेती टैमदास हा कहिथे कि भईया तैं पईसा कमाय के उदीम कर। पांच परगट लोगन तीर गोठियाथे, मैं पईसा के बल मं मोर लइका ल बारवीं पास करवा डारेंव। शिक्षा करमी के नौकरी लगवा डारेंव। अस्पताल मे इलाज बर जाबे तब दवई ले जादा उहां के सब करमचारी मन के मुंह ले करू-करू गोठ निकलथे। मरीज के इलाज अब गा दवई मं नई होवय। डॉक्टर के मीठा बोली घला एक ठन इलाज बरोबर आय। फेर ये मीठा बोली फोकट मं नई मिलय। ओखर बर अलग फीस लागथे। टेबुल तरी ले पईसा दे तहां डाक्टर साहब मुच-मुच ले हांसत मीठ बोली ल बरसावत तोर नारी ल छुअत पूछही-कब ले गड़बड़ होइस जी तोर गाड़ी हर। नरस दीदी के मयारू भाखा के झड़ी, कम्पोडर के परेम गोठ के पुरवाही ये सब फीस के मुताबिक चले बर धर लेथे। ये सिरिफ एक ठन अस्पताले के बात नोहय, सरकारी महकमा ल कोन कहाय अब प्राइवेट आफिस मन मं घला पईसा ले पहिचान होय बर धर लीस।
काम होय बर धरलीस। पुलिस वाला तीर काम आगे तब मरती-जीती दुनो के खवा तब तोर पुरखा तरही। जइसे-जइसे दान-पुन्न, वइसे-वइसे, पाप-पुन लिखही। बिजली लगवाना हे, तब छोटे करमचारी सलाह देही साहब ले बात करे बर परही अऊ साहब ले बात के मतलब सफ्फा समझे जा सकथे। कउनो करा काम करवाय बर जाबे, पईसा हे तब तोर काम होही, नहि ते सौसांझे मर। पईसा पटा तहां तुरूत काम नहीं ते परे रहिबे घनचक्कर मं।
गांव के लोगन कथें, हमर सरपंच खऊवा हावय। सरपंच बिचारा का करय? बिना चढ़ौतरी चढ़ाय तो ओहू ल काम नई मिलय। कउनो ल खवाय रथे तब वोहू खाबे करही। ये तो दुनिया के रीत आय, खा अऊ खवा। ये रीत मं नई चलबे तब सरपंची के अवरदा ल अब पूरा नई करे सकस। टैमदास एखरे सेती जऊन उदीम ले पईसा मिलय ओ सब करथे। साइकिल के पंचर बनई, मइन्से अऊ गरवा बईला के सूजी लगई, तीरथ-बरत कराय के ठेका, बिहाव लगवाय के अउ टोरवाय के, पेसी लगवाय, घटवाय अउ बढ़वाय के ठेका। बुथ मं कब्जा करवाय के ठेका ये सब काम टैमदास हर करथे। चुनई के बखत तो ओखर पांचों अंगरी घीव मं अऊ मुड़ कराही मं बूडे रथे। जम्मो पार्टी के केनवासिन के ठेका, एजेंटी के ठेका ल उही पोगरियाथे। सरकारी अधिकारी करमचारी चाहे कउनो विभाग के होय, लेन-देन टैमदास के मारफत करथे। काबर कि गरी में फंसे के चांस बिलकुल नई रहाय। नई तो धक-पक लगे रथे, दू लम्बरी के कमई में।
कउनो महान मनखे केहे हावय के ये दुनिया मं कोई काम असंभव नईए। इही बात ला टैमदास हर कहिथे पईसा मं सब संभो हे। जइसे-जइसे पानी गिरथे वइसे-वइसे छाता ओढ़ना चाही कथें। जइसे हावा चलथे तइसे तैं चल नहीं ते मुसकुल मं फंस जाबे। जिहां के रासा, तिहां के भासा, जइसन देस वइसन भेस बना के रहिबे तब सुख पाबे नहि ते दु:ख पाबे। टैमदास के ये नीत मं जिनगी जियई आज जरूरी होगे हावय।


–बंधु राजेश्वर राव खरे
लक्ष्मण कुंज, शिव मंदिर के तीर
अयोध्या नगर महासमुंद
Post By : गुरतुरगोठ