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विदरोह के सुर_Vidroh Ke Sur


रामू ह रिक्सा चलावय। वोकर एकलौता बेटा ह तीर के सरकारी स्कूल म पढ़य। रामू सोचय के वोकर लइका पढ़-लिख के कुछ बन जाय। इसी सोच के मास्टर के लइकामन ल कभु-कभु अपन रिक्सा म बइठा के फोकट म किंजार देवय।

सांझकुर जब रामू घर लहुटिस त देखिस के वोकर बेटा रोवत रिहिस। पूछिस त बताइस के मास्टरजी ह आज वोला छड़ी से अब्बड़ पीटे हावय। रामू ह पूछिस - तेहां कांही गलती करे होबे? 
ल्इका ह सिसकत बोलिस - कोनो लइका ह मास्टरजी के टेबल म मेचका ल रख दे रिहिस अउ वोकर नांव ले दीस। तहां ले मास्टरजी ह मारिस।
श्रामू ह लइका ल पोटार लीस अउ कहिस - मार के डर ले पढ़ई-लिखई ल छोड़ देबे का रे? तुहूं ल मोर जइसे रिक्सा चलाय बर हे का? हमर समे म तो हमनल मास्टर ह अब्बड़ मारंय। मार के डर ले पढ़ई-लिखई छोड़ देंव, स्कूल ल तियाग देंव, तेकर सेती आज रिक्सा खिंचत हंव। बिहनिया वोहा रिक्सा निकालिस अउ जइसे सड़क म आइस त देखिस के मास्टर के लइका ह हुत करावत रिहिस। ये रिक्सा, चल मोला स्कूल पहुंचा दे। राहू ह मास्टर के लइका राजू डाहर देखिस, फेर रिक्सा ल नइ रोकिस। वोहा आज सुरूआत कोनो गरीब से करे बर चाहत रिहिस। वोला इहु सुरता आगिस के मास्टरजी ह वोकर लइका ल बिना कोनो गलती के पीटे रिहिस। वोहा तेज चलावत रिक्सा ल आगू बढ़ादीस। राजू ह रिक्सा वाले ल भद्दा-गंदा गारी दीस। फेर रामू के पांव रिक्सा के पैडल उप्पर जल्दी-जल्दी चलत गीस, चलत गीस। 

महेश राजा

दुख के दधिजि _ Dukh ke Dadhiji


आजादी के दिन माने पदं्रह अगस्त। पंद्रह अगस्त के के तिहार ह घुटरू मंडल बर सबले बड़का तिहार होय। पंद्रह अगस्त के दिन वोकर मन के उत्छाह ह देखते बने। बड़े बिहनिया ले वोहा खादी के धोती-कुरता पहिर के तियार हो जाय अउ हाथ म तिरंगा झंड़ा धर के स्कूल पहुंच जाय। जब लइकामन परभात फेरी निकाले, तब उंकर आगू-आगू झंड़ा लेके चलय। वोइसने चलय जइसे सुतंत्रता संग्राम के सेनानी मन के मुखिया बन के अजादी के लड़ई के समे चलय। जब ले वोकर जांगर ह थके लागिस तब ले वोहा स्कूल नइ जाके अपन चांवरा म बइठ के लइकामन ल टुकुर-टुकुर देखत भर राहय। लकामन के चेहरा म खुसी के भाव ल देख के वोला अपन बचपना के दिन ल सुरता करके भीतरे-भीतर वो खुसी ल महसूस करय। वोहा मने-मन लइकामन के भाग ल ये पाय के सहराय कि ये मन सतंन्त्र देस म जनम धरे हे।
सुतंत्रता ह कोन ल पियारा नइ होय। मनखे का, चराचर के सबो जीव-जंतु, पसु-पक्छी मन घलो सुतंत्रता चाहथे। परबस जीना कोन ल बने लागही। परतंत्रता म जीना तो नरक बरोबर होथे।इही भाव म तो घुटरू मंडल ह अपन जिनगी ल होम दिस।
घुटरू मंडल ह आज हमर बीच म नइ रही गे हे। रहिगे हे त सिरिफ वोकर सुरता। जियत म कोनो काकरों सुरता नइ करय। मर जाय के बाद वोहा सबसे के सुरता म बस जाथे। इही ह संसार के नियम होगे हे। मनखे मन जियत म बाप ल पसिया बर नइ पूछे अउ मरे के बाद दूसर ल पितर भात खवाथे अउ वोला पानी देथे।
हप्ता भर पहिल ले गांव म मुनादी होगे हे, येसो के पंद्रह अगस्त के दिन घुटरू मंडल ल गजब सुरता करे जाही। सरकार डहर ले फरमान आय हे, इहां के हाईस्कूल के नांव ह अब घुटरू मंडल माने ‘पोसन साव’ के नांव म करे जाही। अब येहा सरकारीहाईस्कूल नइ कहा के -सुवरगी पोसन साव’ हाई स्कूल कहाही अउ गौरव पाही। काबर कि पोसन साव ह ये गांव के गौरव रहिस। सुतंत्रता संग्राम के सेनानी रहिस। इही पाय के ये अतराब के बिधायक ह सरकार के प्रतिनिधि बन के गांव म आही अउ घुटरू मंडल के मुरति के इस्थापना करही। वोकर सुरता म गजब अकन घोसना तको करही, येमा गांव के इस्कूल के नामकरन तको हे।
सुरता! टाज ले साल भर पहिली के बात आय। पंद्रह अगस्त के दिन झमाझम पानी बरसत रहिस। घुटरू मंडल अपन चांवरा म ढेरा आंटत बइठे राहय। जइसे-जइसे वोकर ढेरा घुमे, वोइसने-वोइसने वोकर अंतस म बिचार ह घलो घुमे। जब वोहा बिचार म जादा गहरी म चल दे, तब वोकर आंखी ले टप-टप आंसू टपकय। वोहा अपन आंखी म आय आंसू ल धोती के कोर म पोंछ लेवे अउ फेर ढेरा ल घुमाये। पर बस मनखे ह आंसू बोहाय ले जादा अउ का कर सकथे।
गांव के सियान मन कहिथे, घुटरू मंडल ह आजादी के लड़ई लड़े हे। अजादी के लड़ई म वोहा अपन सरबस लगा दिस। एक जमाना म घुटरू मंडल ह गांव के संबो ले बड़हर किसान रहिस। वोकर तीर बीस-पचीस एकड़ धनहा अउ पचास ठन गाया-गरूवा के एक पाहट रहिस। वोहा अपने सबो संपति ल देस के अजादी खातिर उरका डारिस। आज उही घुटरू मंडल ह पर-भरासी होगे ये कहे जाय, वोहा अब बिन पूछन्ता के होगे हे। दूसर तो दूसर अपनो मन बर अनपूछन्ता होगे हे। वोहा अपन लइकामन बर तो बैरी बरोबर होगे हे। कहे गे हे, अपन बैरी, पुर हित। ये बात ह घुटरू मंडल के जिनगी म चरितार्थ दिखथे।
आज के लइकामन बर घुटरू मंडल के जिनगी ह कहिनी बरोबर लागथे। वोकर जीवन चरित ल सुन के अइसे लागथे, का ये दुनिया म अइसनो परमारथी मनखे होथे जउन परहित बर अपन सरबस लुटा देथे? मन म अइसने अउ गजब अकन सुवाल उपजथे, त कभु मन म एक पीरा, संवेदना अउ खुसी के भाग घलो बनथे।
संसार म कई किसम के मनखे हाथे। कोनो अपन बर जिथे, तब कोनो परमारथ बर। अपन बर तो सबसे जिथे फरे परमारथ बर जियइया मनखे तो लाखों म एक होथे। घुटरू मंडल परमारथ बर जियइया मनखे रहिस। वोहा अपन जिनगी म पर पीरा ल अपन पीरा के रूप् म जानिस दूसर के दुख में दुखी होना अउ दुसर के सुख में सुखी होना वोकर जीवन के ध्येय हो गे रहिस।
गांव के जुन्ना सियान मन जब घुटरू मंडल के बारे म बताथें, तब आंखी ले आंसू निथर जाथे। वोहा सही अरथ म ये जुग के दधिचि आय, जउन अपन रीड़ के हाड़ा ल दान कर दिस। सियान मन कहिथे, जब देस हर सुतंत्र होइस, तब छोटे-बड़े गजब अकर मनखे मन पदवी पाय बर भागा-दउड़ा करिन। अपन आप ल नेता कहाये बर चुनाव लड़ीन। सुतंत्रता संग्राम सेनानी कहाये बर अपन नाम लिखाइन, कागद-पत्तर सकेलिन, फेर घुटरू मंडल ह ये उदीम ले अपन ल अगल राखिस। वोकर कहना राहय, हम देस के सेवा बर जउन करने वोकर का हम मेहनताना लेबोन? एक जनम का दस जनम लेबोन, तभो ले माटी के करजा ल नइ उतार सकन। अपन सुअभिमान के खातिर बर वोहा सुतंत्रता संग्राम सेनानी मन ल मिलइया पेंसन ल घलो ठोकर मार दिस अउ अपन आखिर समे तक काकरो आगू हाथ फैलाइस।
अजादी के दिन स्कूल गराउंड म पंडाल तना गे। बिहनिया आठ बजत ले गांव भर के लइका-सियान सबो जुरियागे। गांव बर तो आज बड़का तिहार हो गे रहिस। लइका-सियान सब के मन म एक नवा उत्साह रहिस कि घूटरू मंडल के जिनगी भर के तपस्य ह आज मान पाही।
अतराब के बिधायक ह जब आइस, तब सबले वोहा पहिली झंड़ा फहराइस। पोसन साव के मुरति के अनावरन करिस। अब सरकारी स्कूल होगे। सरकारी फरमान आगे जउन घर म स्व. पोसन साव ह अपन जिनगी के आखिरी सांस गिनिस, वो घर ल इस्मारक बनाय जाही अउ उहां घुटरू मंडल के जिनगी के कहिनी ल दरसाय जाही। ये बात ल सुन के गांव के मनखे मन के छाती है दू गज हो गे। घुटरू मंडल के मुरति ल देखके अइसे लागथे मानो सुतंत्र देस के पहली मनखे उही ह आय।

बलदाऊ राम साहू

अब काकर अड़ंगा हे - Ab Kaker Adanga he

जादू के छड़ी न जुन्ना कना रहिस हे अउ न नवां के तीर हावय। तभो ले जनता ल वोकर बने दिन लाय के सपना दिखातेच हे। गरीब जनता ल न पहिली महंगाई ले छूटकारा मिले रिहिस न अभु मिलत हे अउ लागथे कभु नई मिलय। वोकर भागेच म दुःख-पीरा, तकलीफ लिखाय हे।
मेहा पूछथंव के अब कोन बात के अड़ंगा हे। सरकार ह महंगई ल काब नइ कमनियात हे? वोकर हाथ-पांव ल कोर धरे हे? वोला नियम-कानून बनाय बर कोन रोकत हे? जमाखोर-मुनाफाखोर मन ल जेल म काबर नइ डारत हे? अइसन पारटी के सरकार के का फाइदा जउन ह बिपक्छ म रहिके ‘अब्बड़ गरजथे’ फेर सत्ता म आथे तहां ले ‘एकोकनी नइ बरसय।’ अइसन सरकार चलइ ह कोनो सरकार चलइ ए, संगी।
सिरतोन! महंगई कम होही त कइसेच होही? जुन्ना बेपारी मन के राहत ले दूसर कोनो बेपार करय तो काकर बल म। बेपारी मन के सहयोग ले तो पारटी ह जीते हावय। काबर के पारटी ल बेपारी मन से ‘चंदा’ मिले रिहिस। तभे तो पारटी ल बेपारी मन के पारटी कहे जाथे। अब तो वोकरे सरकार हे। बेपारी मन ल सरकार अउ पारटी के आसीरवाद मिले हे। ‘सैंया भये कोतवाल त डर काहे का।’ गरीब मन के विकास भले झन होवय फेर बेपारी, पूंजीपति मन के विकास होबेच करही। देस के बिकास करे के सपना देखातेच रहिहीं।
सिरतोन! देश म अब सबसे तेज चलइया, ‘बुलेअ रेलगाड़ी’ चलही, जउन ह बिकास के चिन्हा बनही। फेर, धिरलहा अउ बिलंब से चलइया पेसेंजर अउ लोकर रेलगांड़ी के हालात ह बद से बदतर होवत हे। बिलंब होवइ म ऐकर बड़का-बड़का रिकाड हे। अब बुलेट रेलगाड़ी अपन तेज गति के रिकाड बनाही?
सरितोन! फेर, लाखों-करोड़ो आम जनता ह ये बुलेट रेलगाड़ी ले दूरिहा रहिही। सिरिफ दरसन करके अपन आप ल भागमानी समझहीं।
वोला देखे के खुसी म अपन गरीबी, दुःख-पीरा ल कुछ समे बर भुला जहीं। हो सकते के आगू अवइया चुनई म जम्मो लोकर अउ पेसेंजर रेलगाड़ी मन ल बुलेट म बदले के ‘वादा’ करंय। जइसे, ये पइत‘बे दिन लाय, भस्टाचार मिटाय, महंगई कमतियाय के वादा करे रिहिन। 
सिरथोन! ग्रीब के छोड़ अमीर घलो होथे, जउन मन रेलगाड़ी म आथें-जाथें। नींद म घलो जागत रहिथें। रेगलगाड़ी के बिलंब होय के पीरा ल सहत सरकार ल कोसत रहिथें। दफ्तर म बिलंब से पहुंचथे त रोज नवां-नवां ओढ़कर बनाथें। अइसन मन के खिंसा बर बुलेट रेलगाड़ी बिलंब हाये के सेती समे बर भारी पड़ही। रेलगाड़ी के बिलंब होय 
के कोनो सीमा नइये। जिहां मरजी, तिहां रोक देथें, पड़े रहव घंटों। 
सिरतोन! चाय बेचइया ह सपना बेच दीच। अइसने परचार करसि के लोगन मन भासन सुनके अपन ‘बने दिन आय’ के सपना देखे लगिन। बतरकिरी कस कीरा झपा गें। सच-झूठ ल घलों परखना जरूर ीनइ समझिन। गरीबी अउ महंगई के बोझ म दबे जनता ल कांही नइ्र सुझिस अउ आंख मंद के वोट डार के जीतवादीन।
जादू के छड़ी न जुन्ना कना रहिस हे अउ न नवां के तीर हावय। तभो ले जनता ल वोकर बने दिन लाय के सपना दिखातेच हे। गरीब जनता ल न पहिली महंगाई ले छूटकारा मिले रिहिस न अभु मिलत हे अउ लागथे कभु नइ्र मिलय। वोकर भागेंच म दुःख-पीरा, तकलीफ लिखाय हे। सत्ता म चाहे कोनो बइठे होवय, महंगई तो बाढ़ने चहे, त अउ का-कहिबे।
गुलाल वर्मा

अपन हाथ म नागर धरे, वो हर जग म खेती करें (Apan Hath m nagar Dhare - Chhattisgarhi CG)

छत्तीसगढ़िया मन बर भात-बासी हा जरूरी जिनिस आय, काबर के हमर छत्तीसगढ़ ह ‘धान के कटोरा’ कहिलाथे। भात-बासी बर चांउर जरूरी होथे। चांउर पिसान के चीला, चौसेला अउ फरा हा सब्बो छत्तीसगढ़िया मन के मन ला अड़बडे़च भाथे। चांउर हा छत्तीसगढ़ के संग म बंगाल, बिहार, उड़ीसा, आन्ध्रप्रदेश, जइसे राज मन के घलो मुख्य भोजन आय। पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र राज में में मुख्य भोजन गहूं हर आय, फेर थोकिन चांउर खाय बिना वोखरो मन के मन ह नइ माड़य। चाउंर ला जम्मो भारत में पसन्द करे जाथय तेखरे सेती भारत कोनो भी सहर में सादा राइस, मसाला राइस, राइस पुलाव, राइस बिरयानी आसानी के साथ मिल जाथे। एसिया के कतकोन देस अइसे हे जिहां के मनखे मन हा दिन म दू से तीन बार तक चांउर खाथें। म्यांमार के एकझन मनखे हा औसतन 195 किलो अउ कम्बोडिया में 160 किलो चांउर एक साल मे जाथे। यूरोप के देस मन म चांउर कम खाए जाथे, अमरीका में एकझन मनखे हा औसतन 7 किलो अउ 3 किलो चांउर खाथे। मनखे हा सबसे पहिली चांउरेज के खेती करना सुरू करे रहिस हे। हड़प्पा सभ्यता म, जउन हा आज ले करीब पांच हजार साल पुराना सभ्यता ए, चांउर के खेती के परमान मिले हे। जादातर देस में जतका चांउर उगथे, करीब-करीब ओतकेच चांउर खा लिए जाथे। तेखरे कारन संसार के देस मन में उगाए जाने वाला चाउर के सिरिफ पांच फीसदी चांउर भर के ही निरयात होथे। सबसे ज्यादा चांउर के निर्यात करने वाला देश थाईलैंण्ड ए जिहां ले हर साल पचास लाख टन चॉउर दूसर देस मन में जाथे। वोखर बाद अमरिका के नम्बर आथे जउन हा हर साल तीस लाख टन चांउर के निरयात करथे। अमरिका के बाद विएतनाम हा हर साल बीस टन चांउर निरयात करथे। कहे जाथे संसार भर में 1, 40, 000 किसम के धान उगाए जाथे, फेर सोधकरता मन बर बनाए गए अर्न्तराष्ट्रीय जीन बैंक में धान के करीब 90000 किसम मन ला ही जमा करे जा सके है। हमर देस में जादातर पसन्द करे जाने वाला चांउर के किसम हे - बासमती, गोविंद भोग, तुलसी अमृत, बादशाह भोग, विष्णु भोग, जवाफूल, एच.एम.टी. आदि। फेर धान के खेती हा अड़बडे़च महनत के काम ए। किसान ला चिखला-माटी म सने भुइयॉ में हल अउ बइला के संग में करीब बत्तीस किमी रेंगे बर परथे। धान के पौधा मन ला झुके-झुके रोपना हर कमर ला तोड़ के रख देथे। तेखरे सेती कथव के ‘‘अपन हाथ म नागर धरे, वो हर जग म खेती करें।


जीके अवधिया

मोर कहां गंवागे गांव (Mor kaha gwage gaw)

मोर कहां गंवागे गांव’’ छत्तीसगढ़ी गीत के संस्कार म पले, मनमोहनी परकीरीति के सुसमा म बाढ़े कवि डाॅ. रमाकांत सोनी के गुरतुर किरतिय आय। जेन अदारस, सरलता, अंतस के परेम, मरजाद, मितानी अउ मिहनत के मोंगरा ले गांव महमहावय तेन महमही ह कहां गंवागे के कहके कवि पुछत हे। फेर कहिथे के मोर वोइ गंवाए गांव ल पा जाहा, तब अमरा दिहा। ए पोथी के सिरसक ह आदमी मन ल चेत करवइया हे। ए संगरह मं तीन कोरी केरा मां सक्कर पागे कस कविता हावय। जेन भाव पक्छ ले कवि के काव्य-साधना के देन आय। डाॅ0 सोनी ह ए संगरह के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी ल भासायी उरजा परदान करे हे। रचना मन म छंद, अलंकार के सुघ्घर तालमेल हावय। अलंकार ह कविता के सिंगार आय, फेर कविता के आत्मा तो वोकर रस हे। भाखा वोकर वानी अउ छंद वोकर अनुशासन ए। कवि ह एमन ल अपन रचना म बने धियान दे हे। संगरह के सीरसक गीत म कवि अपन सरल अउ भावपूरन्न भासा म संस्कीरीति अउ परम्परा ले हटत अउ जरी ले कटत मनखे मन सो पूछत हे - 
मोर कहां गंवागे गांव रे, 
मैं खोजत हाववं, मोर पीपर पेड़ के छाव रे,
मैं खोजत हाववं। 
संगरह के गीत ल पढ़े के बाद म गीत मन अंतस मं गुंजे लागथे। कई ठन गीत ते मन ल झकझारे देथे। हमर आजादी ल तीन कोरी बच्छर पूरगे हे तब ले रइ-रइ के ये परस्सन उठथे के - 
ये देस हमर अय का, 
मै खोजत रथवं बइहा।
ये राज हमर अय का
मै गुनत रथवं बइहा।
परदूसन ह खाली पानी-माटी अउ हवा भर म नइये। ऐहा हमर संस्कार अउ मनखे मन के चेतना घलो ल बाइ कस मार दे हे। थोकन ये लाइन ल देखव-
सब सहर के जहर ह, एही डहर मं आवत हावय।
अब गावं के गंगा के पानी, घलो सुखावत हावय।
कोन भागीरथी ला पांव रे, मैं खोजत हाववं।

विद्याभूषण मिश्र
जांजगीर, छत्तीसगढ़

बाढ़त महंगाई म पढई घलो ह जी के जंजाल हो गे

बाढ़त महंगाई म पढई घलो ह जी के जंजाल हो गे हावय। एकझन टूरा अउ एकेचझन टुरी ल पढ़ावत ले लगथे जम्मों खेती-खार ह बेचा जही। अइसे तो जम्मो जिनीस के भाव ह आगी लगे हे। आतको म मरइया ल अउ मारे बर ये स्कूल-कालेज म थोकेच कन पइसा म पढ़ई-लिखई हो जवत रिहिस हे। जेन ल पढ़ना रहाय तेमन पढ़न, अउ जेन नइ पढ़य-लिखय तेमन खेती-बारी अउ आने काम करय। अब तो सरकार ह सब्बे लइका-सियान ल पढे बर जोर देवत हे। डोकरा-डोकरी मन घलो पढ़े-लिखे ल सिखत हे। येमा हमनला कोनो आपत्ति नइ हे, फेर हम गरीबमन अपन लइकामन ल बने कस स्कुल-कालेज म कइसे पढ़ा सकथन, जब साल के साल मनमाने फीस ल बढ़ावत जात हावय। अब ले ना ये रविशंकर यूनीवरसीटी वाला मन घलो हर साल परीक्षा फीस ल बढ़ाय के फइसला ले हे। मोर टुरा अउ टुरी दुनोझन कालेज म पढ़त हावय। यइसे म मोर मुंड़ा नइ पूर गे, तुहीमन बताओ रे भई। टूरा ल नइ पढाहूं त ओहा कोनो काम के नइ रिही। काबर के स्कूल तक पढ़े-लिखे कतको लइका मन ठलहा घुमत हे। पढ़-लिख ले हन कइके ओमन खेत-खार म कमावय नइ, अउ अतका नइ पढे़ हे के ओमन ल सरकारी नउकरी मिलय। गंवई के इही लइकामन के हाल ल देखके मेहा सोचे रहेंव अपन टूरा-टूरी मन ल काॅलेज पढ़ाहू अउ बड़ेकजान साहब बनाहूं। फेर रोजेच-रोजेच के महंगाई बढ़ई म मोर तो हाथ-गोड़ फूलत हावय। टूरी के जादा चिंता होवत हावय। काबर के काॅलेज पढ़ लेतीच तक ओकर बिहाव ह बने घर म हो जतीस अउ दमाद घलो ह सरकारी नउकरी वाले मिलतीस। इही बात ल गुनत-गुनत घर के चउरा म बइठे रहेंव की जोर के आवाज आइस। मेहा मुड़ी उठा के देखेंव त मोर पड़ोसी के बड़का टूरा रिहिस।
कका, पांव परत हव गा। ईश्वर ह सहर ले कब आही। होली तिहार बर घलो नइ आय रिहिस हे। अपन फटफटिया म जिसं पेठ अउ टिसरट पहिने, आंखी म चसमा चढ़ाये रिहिस बुजा ह। ओहा आठवीं कलास ले आघू नइ पढ़े रिहिस। फेर आजकल अइसन पइसा कमात हे के झन पूछव। दारू भट्ठी म काम करथे। ओकर छोटे भई हर तो पांचवी फेल हे। फेर उहू हर बिकट पैसा कमाथे। काबर की ओहा फेकटरी म कमाय बर जाथे। ओकर बहनी के विहाव ह इसी साल सरकारी स्कूल के चपरासी संग होइस हे। ओहा दूसरी भर पढ़े हे।
कका, कइसे कलेचुप हस गा, कुछू बोलत-बतियात नइ अस। ओकर बात ल सुन के मोर मुहुं ले बस अतके निकलिस ईश्वर ह परिक्षा के बाद म आही घासी। महंगी पढ़ई ल देखके सोचतथव कि पढ़ाय के जिद ल छोड़के लइकामन ल खेलत देतेव त हो सकथे टुरा ह सचिन, धोनी कस ब जथीस अउ टूरी ह सनिया। काबर ‘खेलवे-कूदिबे त होबे खराब, अउ पढ़बे-लिखबे त होवे नवाब’ हाना ह तो उल्टा हो गे हे। अब तो खेलइया-कुदइया मन ह ‘नवाब’ बनत हे। देखत हव न, विश्वकम जिते के के बाद म किरकेट खिलाड़ी मन करा कइसे छानी फाड़ के रूपिया बरसत हे।

गुलाल वर्मा

का भासा के विकास बर लिपि जरूरी हे?

भासा के नवा-बिहान के दिन ल सोरियवन त 27 नवंबर 2007 के दिन ह परब कस लागथे। काबर कि इही दिन छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा मिलिस। छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा ह असल म छत्तीसगढीया मन के सम्मान आय। छत्तीसगढ़ी बर छत्तीसगढ़ीया मन आंदोलन करिन तब जाके छत्तीसगढ़ राज्य ह बनिस। त भला छत्तीसगढ़ी भासा संग कइसे अनियाव होतिस। बोलचाल म प्रचलित बोली ल महतारी भाखा के पदवी देना बड़ अभिमान के बात आय।

छत्तीसगढ़ी ल तो उही दिन राजभासा घोसित करना रिहिस जेन दिन राज ह बनिस। फेर करबे दू चार झन पेटकापट्टी मन के सोती सात साल अगोरे ल परिस। अब ले देके राजभासा बनगे त ओमन फेर एमा लिपि के अडंगा डार के विकास के गाड़ा रोकथे। दूये चार झन अडं़गा डारे ले कांहि नई होवय। करबो। अपन के मतलब ओ मनखे मन ले हे जेमन छत्तीसगढ़ के धरती म जनम धरे हे। इहा के माटी ले उपजे अन्न खावत हे। इहे के पावन ले जीवन जियत हे। ओमन कहू आज ले छत्तीसगढ़ी भासा ल नइ जान पाइस त समझ ओकर इमान सुतेच हे। अउ जेमन छत्तीसगढ़ी म लिखे-पढे के सुरू कर डरे हे तिखर इमान जागे हे।

कुछ लोगन मन के तो इमाने नइये। ओमन कहू आज ले छत्तीसगढ़ी भासा ल नइ जान पइस त समझ ओकर इमान सुतेच हे। अउ जेमन छत्तीसगढ़ी म लिखे-पढ़े के सुरू कर डरे हे तिखर इमान जागे हे।

कुछ लोगन मन के तो इमाने नइये। ओमन आजो छत्तीसगढ़ी के खोदी ऊंकेरथे। कभु व्याकरण के गोठ करथे, कभु छत्तीसगढ़ी के अभ्यंस निकाले। कभु किथे छत्तीसगढ़ी के लिपिच नइये। अइसन विचारधारा के मनखे मन किरिया खाके अवतरे हे तइसे लागथे कि बोलबो अउ लिखबो त सिरिफ लिपि वाला भासा ल कहिके। अइसने एक झन मइनखे ल मेहर पुछेव कि केठन लिपि वाला भासा के जानकार हस कहिके। त ओकर मुंह ले अक्का-बक्का नई फुटिस।

का भासा के विकास बर लिपि जरूरी हे?

छत्तीसगढ़ राज बने कई बच्छर होगे। ये कई बच्छर म छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी भासा के घलो गजब विकास होइस। छत्तीसगढ़ी म लिखईया मन बाड़हिस। संगे-संग छत्तीसगढ़ी के पढ़ईया मन म घलो बड़ावार देखे ल मिलिस। सांझर-मिंझर रूप काहन त अब छत्तीसगढ़ी भासा ह सबो डहर ले सरपोट्टा दंदारे के सुरू कर देते। रेडियो, दुरदर्शन, समाचार-पत्र पत्रिका मन म अपन ठऊर पोगरा डरे हावे। ये ठऊर ह नोहर कस नहीं बल्कि माई कुरिया कस हे।



हे भासा विद्वान हो लिपि नइये, छत्तीसगढ़ी के लिपि नइये कहिके फुसुर-फुसर करे ले नई होवय। हिम्मती हव ते गोहार पार के आगु म काहव। तूहर जिब ल नइ सुरर सकबोन त कम से कम तर्क तो देसकथन। अगर भासा के विकास बर लिपि होना जरूरी हे त हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी मन कइसे पोकखागे यहू ल तो गुनव। हिन्दी का लिपि हे, संस्कृत के का लिपि हे अउ अंग्रेजी कोन से लिपि म लिखे जाथे। येला पहिली जानव तेखर पाछु छत्तीसगढ़ी के रद्दा म जोझा परहू।
चारों खुट छत्तीसगढ़ी के सोर बगरावत आकाशवाणी ह अंचलिक प्रसारण छत्तीसगढ़ी के कार्यक्रम परोसथे। दुरदर्शन ह छत्तीसगढ़ी भासा के गजब अकन कार्यक्रम देखावथे। बाचे खोचे ल छत्तीसगढ़ी फिलिम ह पुरा करथे। अब रही बात लेखन अउ पाठन त ओकर बर किताब, समाचार पत्र, पत्रिका हाबे। अबतो दैनिक समाचार पत्र मन घलो सरलग छत्तीसगढ़ी अंक निकाल के लोक साहित्य अउ संस्कृति के सरेखा करत भासा के विकास म पंदउली देवथे। छत्तीसगढ़ी भाखा के अतेक महिमा बचाने के बाद भी हमर कहई म ओमन ह अदरा बइला कस हो जथे। कोन जनी कति मेड़वार के केहे बोल म लिपि के किरिया ल थूकही अउ छत्तीसगढ़ी कोति लोरहकहि तेला उही मन जानय।

जयंत साहू

छत्तीसगढ़ी उपन्यास आवा के प्रेरणा स्त्रोत गांधीवादी प. गंगाप्रसाद द्विवेदी तथा आवा से जुड़ा यह अंश




‘‘गांधी उद्गरे हे। ओकर लाम-लाम हाथ झूलत हे, माड़ी-माड़ी ले। कनिहा म पटकू उघरा बदन, चेंदुवा मूंड, नानचुन घड़ी के झूलेना। हाथ म धरे हे लउठी। रेंगथे त रेंगते जाथे। जेती ओ रेंगथे जम्मो मनखे उही कोती रेंग देथें। ललमुंहा अंगरेज बक्क खा जथे। धरे सकय न टोके सकय। अंधौर अस उठे हे, गांधी उद्गरे हे।’’

बिसाहू के बात ल सुनके लीमतुलसी गांव के बड़े मिलय। गांव म बइठे बइठे गांधी बबा के परछो नई पाय सकव। हम देख के आवथन। गे रेहेन वर्धा। उहा धनीराम दाऊ पढ़ाथे। बरबंदा वाला धनीराम। ओकर परसादे गे रेहेन उहां। गांधी बबा काहत लागय। बोकरी के दूध पीथे। पेनखजूर हा ओकर खाजी ये। अपन काम ल खुदे करथे। पैखाना तक ल खुदे उठाथे। दाऊ धन्न हे गांधी महातमा। अपन तो उठाबे करथे हमर कस्तूरबा दाई सो घलो बुता कराथे गा। इहां दतवन मुखारी तक ल हम दूरा के दाई सो मांगथन। अढ़ो-अढ़ो के हलाकान कर देथन। उहां गांधी बबा के देखौ कारबार त तरूआ सुखा जथे। इहां हमन ‘‘अपन ल तोपै दूसर ल उघारै’’ वाला हिसाब जमाथन, फेर वाह रे गांधी महातमा। हमर तुंहार अंग ल कपड़ा म ढांके बर खुदे उघरा होगे जी। कहिस मोर ददा भइया मन उघरा हें। गरीब हें। त मै जादा पहिर के का करहूं। चरखा म सूत बनाथे अऊ उही सूत के बने मोटहा झोटहा कपड़ा के बने पटकू म बपुरा ह इज्जत ल ढांकेथे।

दाऊ सन्ना गे। यह का बात सब सुनाब म आवथे भाई। दाऊ पूछिस - ‘‘का बिसाहू, अंगरेज कांही नई करय गा?’’ दाऊ के बात ल बिसाहू लमइस। बात अइसन ये दाऊ-आगी खाही ते ह अंगरा हागबे करही। अंगरेज तो मटिया मेट करना चाहते हें, खन के गड़िया देतिस गांधी ल। फेर जनता जनार्दन के गांधी ल कोन हाथ लगाय सकही दाऊ। जब तक ये देस ल आजादी नई मिलही, गांधी ल काल घलो नई छुवे सकय। उद्गरे हे गांधी हमला अजाद करे बर। भागवन ताय। अजादी के लीला देखाही अउ अपन लोक जाही।

मंडल के बात ल सुनके कन्नेखी देखिस दाऊ का अउ किहिस तोरे अस गुन्निक बर केहे गे हे मंडल आजे मूड मुड़इस, अउ आजे महंत बनगे।
कइसे दाऊ? मंडल तिखारिस

बात अइसे ये बिसाहू - दाऊ लमइस अपन बात - किथे नहीं कहां गे कहूं नही, का लाने कुछू नहीं ताऊन हाल तोर हे। अरे भई जब तैं वर्धा गेस अऊ गांधी जी से मिलेस त कुछू सीखे के नहीं?

का सिखतेंव दाऊ। मैं तो धनीराम जी के परेम म जा परेंव। वे किहिस, आजा रे भाई, महातमा जी के आसरम देखाहूं। त जा परेंव। सीखेंव कुछू नहीं दाऊ।

दाऊ थपड़ी पीट के हांसिस अउ किहिस - ‘‘मंडल, चल अब सीख ले गांधी जी नारा दे हे - ‘‘करव या मरव’’ जाने नहीं। मतलब ये करना हे या मरना हे। माने के करके मरना हे। देखे जाही हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा हा..हा...हा...हा

बिसाहू संग अउ दू चार झन सकलाय मनखे मन हांसिन। हांसे के कारन ये रिहिस के दाऊ बिसनू लीमतुलसी वाला बनय साल साल दसहरा के दिन रावन। अउ बोलय डेलाग - हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा। गांधी महातमा के बात म घलो कूद परिस रावन बन के बिसनू दाऊ। रघौत्तम महाराज किहिस - वाह दाऊ, रहि गेसन रावन के रावन। गांधी जी काहत हे एक गाल ल कोनो मारय त दुसर गाल ल दे दव। अउ तैं कहत हस-हवा अगर टेढ़ी चले तो रस्सी से बंधवा दूंगा।

सदा दिन बंधवाय मरवाय ल तो जानेव। अऊ का करहू। अंगरेज घलो गत मारत हें तुहूं उही काम करत हव। वे हा गोरिया अंगरेज ये तुम करिया अंगरेज। 

दाऊ पंडित रघोत्तम के बात ल सुनके किहिस - पालागी ग महराज। बने आसिरवाद देथव पंडित जी। अरे हमूं गांधी बबा के पाल्टी म मेम्बर बनगेहन महराज। करबो अऊ मरबो। बिसाहू मंडल हा सुनइस किस्सा लंबा चौड़ा त महूं कहि परेंव भई। लेकिन काली बिहनिया हम सबला गांव के पीपर चौरा म सकलाना हे। अऊ बिदेसी कपड़ा के होली जलाना है।

महराज रघोत्तम किहिस - काल करंते आज कर आज करंते अब। पल में परलय होयगा, तब होली जलेगा कब। कबित्त ल सुनके सब हांसत - गोठियावत निकलिन कपड़ा मांगे बर।

घर-घर दल बनाके सब जांय अऊ काहंय - छेरिक छेरा, घर के बिदेसी कपड़ा ल हेरी क हेरा। घर के अंगना बटोरत रहय बिंदाबाई। हाथ के काम ल छोर के आगे दम्म ले। किहिस - अई, छेरछेरा पुन्नी तो कब के नाहक गे बाबू हो, ये का नवा उदिम करत हव? ठट्ठा करथव का?

रघोत्तम महराज सब बात ल बतइस। तव बिंदा बाई लानिस एक लुगरा अऊ एक ठन अंगरखा। मांगत जांचत गांव भर म किंजर के सब झन जुरियाइन अउ पीपर के पेड़ के तरी म सकलाके किहिन - बोले, महातमा गांधी के जय। बोलो भारत माता के जय। जय-जयकार थमिस त बिसाहू मंडल रोसियागे। लगाय लगिस नारा -

बोलव वीर नारायण सिंग के जय
बोलो सुन्दर लाल महराज के जय
बोलो ठाकुर प्यारेलाल के जय
बोलो रविसंकर सुकुल के जय
बैरिस्टर छेदीलाल के जय
बोलो डॉक्टर खूबचंद बघेल के जय
जयकारा सुनके बड़े दाऊ बिसनू किहिस - वाह मंडल कतेकझन सियानमन के नांव तंय जानत हस। धन्न हे हमर गांव लीमतुलसी जिहां बिसाहू मंडल हे। गांधी बबा के चेला।

बिसाहू मंडल किहिस- अइसन नोहय दाऊ, मैं आंव गाड़ी वान, असल गांधीवादी हमर मितान मंडल कहाथे भई। सिरतोन आय। सदा दिन गांधी बबा के सब कारबार म जात-आवत रथे। बिसाहू बतइस के मंडल ह रइपुर निकलगे। उहां नेता मन अवइया हें। ओकर संग महूं आत जात रथंव। जादा तो नहीं रे भाई हो, जा परेंव महूं दू चार जगा। तब परछो पायेंव। कंडेल गांव गेन। आवत जात सबो किस्सा ल सुनेंव। बैला गाड़ी में हांकथंव, घनाराम मंडल किस्सा फअकारथे। मोर सांही मुरूख मन्से घलो गंगा नहा लेथे संगी संगवारी के परताप ले सुन्दरलाल महराज, छेदीलाल जी बैरिस्टर, ठाकुर प्यारेलाल सिंग, डॉ. खुबचंद बघेल,रविसंकर महराज सब के नांव सुनेंव त जय बोला पारेंव भई। सब झन बिसाहू के बात सुनके संहरइन। बिसाहू हे तो कुन किसान फेर सपना गजब बड़ देखथे। देस के अजादी के सपना। वो हा सोचथे, देस अजाद होही त गरीब किसान के बेटा साहेब सुभा बनहीं। राज चलांही अपन देस म अपन राज रिही। गांव के भाग जागही। छाती तान के चलबो।

सब झन अपन घर जाय ल धरिन। महराजी पटेल किहिस - एक ठन गीत महूं सुना पारतेंव ग।

बिसाहू किहिस - सुना न जी रट्ठा के सुना
महराजी खंजेरी बजा बजा के गइस -
जय हो गांधी जय हो तोर,
जग म होवय तोरे सोर। जय गंगान।
धन्न धन्न भारत के भाग
अवतारे गांधी भगवान। जय गंगान।
गीत सुन के सब झन किहिन तथे बिसाहू मंडल किहिस जी गांधी उद्गरे हे। मनुख तन लेके भगवान आय हे। रघोत्तम महराज घर डाहर जात जात किहिस - बाबू रे, गीता म भगवान दे हे बचन-यदा यदा ही धर्मस्य.......माने के जब जब धरम उपर अपजस आय उस करही, गरीब गुरबा, गौ अउ बाम्हन के ऊपर आही संकट तब मै आहूं धरती म। परगट होहूं। गांधी के रूप म आये हे भगवान हा।

अंकलहा ल महराज के सबो बात हा नीक लागिस फेर बाम्हन उपर संकट बाला बात नई सुहइस। किहिस के बाम्हने मन मनखे ये, हमन नोहन? भगवान हमरो बर मया करत होही महराज?

रघोत्तम महराज बताइस - बात अइसे ये अंकलहा, गरंथ लिखइया कोन? बाम्हन। त अंधरा बांटे रेवड़ी, आप आप ल देय ताय जी। गरंथ म हे तेला केहेंव। पुरान उपनिसद हमर पुरख मन लिखिन जी हम तो भइया - मनखे मनखे ला मान, सगा भाई के समान, गुरू बाबा घासीदास के ये दे बात ल गुनथन। जात पात सब बेकार। इही सब जात-पात के बिसकुटक के मारे तो हमर ताकत कम होवत गीस। बात तंय बने करथस अंकलहा। रात होगे हे। घर जा बाबू। बिहनिया झटकुन उठहु। जागत जागत सुतहू।

भरूआ काट के बसे रिहिन हमर पुरखा मन लीमतुलसी गांव म अंकलहा किहिस बिसाहू ल। भला बिसाहू काबर चुप रितिस। उहू फटकारिस, बात अइसन ये अंकलहा, ये हमर छत्तीसगढ़ महतारी के महत्तम गजब हे। किथे नहीं, बइठन दे त पिसन दे तौन हाल ताय। बैइठे पइन तौन पिसे ल धर लिन। कोनो आगू अइन कोनो पीछू। हमरो पुरखा मन अइसने होहीं अंकलहा। भरूआ काट के सबो बसे हे। अंकलहा असकटागे। बिसाहू संग बात म भला अंकलहा कइसे जीतय। बात ल बिगड़त देख के अंकलहा किहिस , - ‘‘बिसाहू मंडल, काली जऊन चेंदरी मन के होली जलायेव तेकर का मतलब हे, गम नई पायेंव।’’

बिसाहू किहिस - घनाराम मंडल आगे हे रइपुर ले। ले चल फेर उन्हें चलीं उही बताही भई।
दूनों झन ल आवत देखिस त घनाराम मंडल अपन बहू ल हूंत करा के किहिस - ‘‘बहू, चाहा मड़ा दे। तीन गिलास उतारबे।’’

घनाराम मंडल किहिस - ‘‘बइठव जी। तुंहला बताई चाह के किस्सा। बात अइसन के बिसाहू , चाहा ल हम नई धरेन। हमला चाहा ल धर लिस। दुकान वाला मन आवंय गांव म कटेली केटली बनावंय चाह अऊ फोकट म पियावंय। हफता पन्दरही फोकट में पी पारेन। तहां का पूछना हे। चस्का लग गे।’’
कबी चाहा बर कबित्त बनायहे जी, सुनव, 

डुबु डुबु डबकत हे, चाहा के पानी।
गजब बाटुर हें, धोरूक अऊ डार दे पानी, 
सक्कर न दूध दिखय लाल लाल पानी।
होठ हर भसकत हे फूट कस चानी।
कविताला सुनके अंकलहा किहिस - नाचा म जोक्कड़ मन नवा बात किथें -
चाह भवानी दाहिनी, सम्मुख माड़े पलेट
तीन देव रच्छा करंव, पान बिड़ी सिगरेट।

दोहा सुन के घराराम मंडल गजब हांसिस। किहिस - का करबे बिन चाहा के रहे न जाय। मूड़ पिराथे। हाथ गोड़ अल्लर पर जथे। घर भर के पहली उठते साठ चहा पीथन त काम बूता धरथन। मंडलिन हा चाहा पिये बिना नाती ल सेंकय नहीं। चाहा बिना परेम धलो नई होवय। ठठ्ठा बात ल सुनके मंडलिन देखऊटी घुस्सा करके किहिस - ‘‘एकाध झन मनखे मन बुढ़ा जथें फेर गोठियाय के ढंग नई राहय।’’

मंडल मंडलिन के बात ल सुनके अऊ मंगन होगे। किहिस। देखना हे सवाद चाहा के चस्का ताय। बात में चस्का ते चाह के चस्का। चाह पीना माने अब सान के बात बनगे जी। घर में मनखे आही अऊ चाह नई पियाबो त किही दिली-ओहा चाहो बर नई पूछिस जी। याहा तरा दिन आय हे।

मंडल के बात, - बिसाहू किहिस - ‘‘तंय तो मातबर मंडल अस, चार नागर के जोतनदार। फेर जिकर इहां मुसुवा डंड पेलत हे उहू मन झपागे चाहा म। पोट-पोट भूख मरही फेर चाहा झड़काही। खसू बर तेल नहीं, घोड़सार बर दिया। यहा तरा होवत हे हाल हा। मंडल किहिस - सिरतोन ताय जी। ले चाहा पुरान छोड़व। बतावव कइसे पधारेव दूनो देवता।’’
अंकलहा किहिस - मंडल, तै गांधी बबा के चेला। काली हमन मिलके चेंदरी, पोलखा, लुगरा, अंगरखा, जऊन मिल ग तेला फूंक देन। गांधी बबा के हुकूम हावय। फेर कोनो बतइन नहीं के भभकत आगी म पानी डरइया गांधी बबा के यहा हुकूम काय ये भई। एक गाल ल कोनो मारही त दूसर ल दे दव, कहइया ह आगी काबर लगाय बर किथे। 
बिसाहू मंडल अंकलहा के बात सुनके थपड़ीपीट के हांसिस। अंकलहा किहिस - मंडल का बात ये भई, कांही अनीत कर पारेंव का?

हांस पारेंव, अंकलहा मंडल किहिस। बात अइसन ये के पहली तंय गांधी बबा के नाव नई जानत रेहे। फेर ओकर जय बोलाय बर सीखेस, अब गांधी महातमा के सिद्धांत, बिचार, पुरूगिराम, सब ल जाने के उदिम करत हस। तोर अस बर कहे गेहे पहिली जोंधरी चोर फेर सेंधफोर। फेर सुने जाने बर चाही सब बात ल। गांधी बबा बतइस जी हमन ल। आज के बात चाही सब बात ल। गांधी बबा बतइस जी हमन ल। आज के बात नोहय। अब तो देस सुतंत्र होय चाहत हे। करो या मरो, ओकर आगू कंडेल नहर के कांड, सब कथा लम्बा हे। गांधी बबा के किसिम किसिम के हुकू होइस।

छत्तीसगढ़ मा गांधी बबा पहली अइस त कंडेल कांड म। धमतरी तीर हे गांव कंडेल। उहां पंडित सुन्दर लाल अऊ ऊंकर संगवारी मन नहर पानी बर अंडियागें। राख पत त रखा पत। किसान के लाल ऑखी देख के देवता थर्रा जथे। अंगरेज मूत मारिन। गांधी बबा के आय के पहली होगे राजीनामा। फेर गांधी बबा अऊ दीन आसीरबाद। हमर छत्तीसगढ़ म पंड़ित सुन्दरलाल ल घलो गांधी केहे जाथे। काबर? के वो हा गांधी जी के रद्दा म चले के रंग ढंग ल सिखाईस रे भई। सतनामी भाई मन ल जनेऊ दीस। मंदिर म उनला परवेस करवाइस।
अभी बात ह चलते रिहिस, ओती ले आगे जेठू अउ महराजी। दूनोंझन घनाराम मंडल ला पांय, पैलगी करिन अउ कलेचुप बइठगें।

अंकलहा किहिस - मंडल का बोलन। का बतावन एक मनखे तुंहला देखथन। एक बोलिया। सच के मनइया। सब झन के देखइया। एक झन बिसून दाऊ हे। बिहनिया गांधी जी के जय बोलाथे, सांझ कन पुलुस सिपाही मन संग बइठके डल्ला उड़ाथे। अउ एक बात जरूरी हे मंडल ददा। तुंहर ले जादा बिसुन दाऊ के कदर हे गांव म। किये नहीं, सती बिचारी भूख मरे, लड़वा खाय छिनार
धन्न रे दुनिया।

मंडल किहिस - का बात ये अंकलहा? गजब जोर के धक्का खाय हस तईसे लागत हे।
‘‘खाय हंव मंडल। मै घासीदास बबा के जस गवइया अंकलहा। पंथी दल बना पारेव मंडल। मंदरहा मिलगे, टूरा मन ल सिखोवत हंव। तुंहला नाच के देखाहूं। अभी जादा नई सिखे पायन। बिसनू दाऊ के सौंजिया के मदहरा टूरा बुधारू हे। दाऊ भड़कावत हे वोला। काहत हे अंकलहा के चक्कर म झन पड़ रे बाबू। मादरे के पुरती हो जाबे। अंगरेज मन सब देखते हें। घासीदास के वचन ल झन गावव। अंगरेज धर लीही। तुमन गाहू ...
मनखे मनखे ल जान,
सगा भाई के समान।

त अंगरेज ह छोड़य नहीं। अरे मुरूख हो, गोरिया - करिया, नीच -ऊंच, धनी गरीब सब भगवान बनाये हे। तोला तुम मेट दुहू। मनखे मनखे कइसे एक हो जाही। फेर गाथव तुम ‘‘मंदिरवा म का करे जइबो, अपन घट ही के देव ल मनइबो।’’ इही सब गाना ये। मंदिर म नई जाये सकेव त घर के देव ल मनइबो।’’ इही सब गाना ये। मंदिर म नई जाये सकेव त घर के देव ल मनाथव। सुन्दरलाल महराज ह दू चार झन सतनामी ल एक दिन मंदिर में खुसेर दिस त का होगे। बाम्हन चलाकी चल दिस। न एती के होयेव न ओती के। बाबू रे, पंथी गाना बंद करो। यहा तरा हमला डेरवावत हे मंडल। अंकलहा के बात ल सुन के मंडल ल गजब रीस लागिस। मंडल किहिस - ‘‘दू ठन डोंगा म पांव धरही, तौन बोहाबे करही अंकलहा। दाऊ बिसनू के चाल हम जानत हन। तंय झन कर फिकीर। नाच अउ नचवा। गीत ल सब गा। अउ एक ठन गीत अऊ गा।’’
का गीत मंडल?

अंकलहा पूछिस। मंडल किहिस - --ये दे गीत ल सुन जी।’’
भैया पांचो पाण्डव कहिए जिनको नाम सुनाऊं
लाखे वामन राव हमारे धर्मराज को है अवतार
भीमसेन अवतारी जानो, लक्ष्मीरनारायन जिनका नाम 
डागा सह देव नाम से जाहिर,
रऊफ नकुल को है अवतार
ठाकुर अर्जुन के अवतारी योद्धो प्यारेलाल सरदार।

ये सब हम रइपुर जाथन आथन त सुनथन जी। छत्तीसगढ़ महतारी के पांडव ये येमन। गीत गावव। बाजा बजावव। बिसने सही बेईमान मन के बात ल कान झन दव। समझाय बुझाय के बाद घनाराम मंडल अपने बेटा ल हुंत करइस। सोरा बछर के सामलाल आके खड़ा होगे। मंडल किहिस सामनलाल अंकलहा कका, महराजी कका मन पांव छू के आसिर बाद ले बाबू।

समलाल दूनो झन के पांव परिस। अंकलहा किहिस - मंडल, हमर पांव परवाके तै अनीत करथस गा। हमला कोनो पांव नई परंय। जात-पात माड़े हे मंडल।
मंडल किहिस - ‘‘अंकलहा, तंय मोर भाई अस के नहीं? 
भाई आस त समेलाल के का, लाग होय?
कका तान भई अंकलहा किहिस

‘‘त कका के पांव भतीज नई परही जी। अच्छा बताय तहूं ह।’’
अभी मंडल कुछू अउ कहे पातिस तैइसने चाहा आगे।
सबो मन चाहा भड़किन। कप सासर ल अभी भुइयां म मड़ाय नई पाय रिहिन तइसने पहंचगे बिसनू दाऊ। घनाराम किहिस - ‘‘ले, कथे नहीं, नाचत रिहिन जोगी तेमा कूद परिन सन्यासी। अरे भाई, बिसनू दाऊ घलो आगे। लानव रे चाहा।’’

बिसनू दाऊ नता म मंडल ल मानय भांटो। किहिस - ‘‘भांटो, बुढ़ा गेस फेर ठठाय बर नई छोड़े।’’
घनाराम भला कहां चुप रहइया ये, उहूं तगड़ा जवाब दिस - ‘‘अइसे ये बाबू रे, ठठाही किके तो बहिनी देहच। अब काबर करलाथे।’’
अपन अस मुंह लेके रहिगे बिसनू दाऊ। सामलाल फेर चाह लेके अइस। बिसनू दाऊ किहिस - पांय लागी भांचा। कब हबरे ग।

सामलाल लजागे। चाहा देत खानी बिसनू दाऊ के नजर परगे सामलाल के जेवनी हाथ म। चाहा देत खानी बिसनू दाऊ के नजर परगे सामलाल के जेवनी हाथ म। चाहा पिये बर छोड़ दिस बिसनू। किहिस 
‘‘भांचा, यहां का लोर उपटे हे हाथ म भाई, हाथ, करियागेहे।’’
समलाल कुछू नई किहिस। घर भीतर चल दिस। मंडल किहिस ‘‘तै तो आस कंस ममा। इहां दिन भर गांधी बबा के गुन गाथस अउ रात कुन डल्ला उड़ाथस। जिंकर संग डल्ला उड़ाथस बाबू रे उही सिपाही मन मारे हे सामलाल ल।’’

का किथस भांटो? बिसकुटक झन सुनाय कर। फरी फरा बता। बिसनु किहिस।
सब्बो बइठया तन अकबकागें। घनाराम मंडल तब बतइस - ‘‘सामलाल के ममा रिथे दुरूग में। उहां वे गुरूजी हे। सामलाल ओकरे हाई स्कूल म पढ़ेबर दुरूग गे हे। नवमीं पढत हे ग। का करबे, हमर तीर तखार म तो हाई स्कूल नइये। भेजेंव रे भाई। बड़े बेटा चुन्नीलाल ह तो चौथी पढ़के घर के खेतीबारी देखत हे। तिपोय बर बहू आगे। ये दे छोटू ल पढ़ा परतेंव कहिके भेज देंव दुरूग। उहां लइका ह सुराजी मन के संगत म देस के काम करे धर लिस। पर्चा बांटय, पोस्ट आफिस के लाल डब्बा म तेजाब डारय। लइका दल के दू टूरा पकड़ा गे। सामलाल ल पकड़ के लेगिन अउ किहिन - हाथ ल खोल बेटा पा ईनाम गांधी के सिपाही बने के। सुराजी बनत हे साला ह। लइका ल तीन बेंत के सजा दे गीस। पहली एक सिपाही हाथ ल कोहनी मेर ले धरिस, दूसर ह सिलकन के कपड़ा ल पानी म बोर के हाथ में मड़इस, तीसर ह, कांख के मारिस सट ले। मोर बेटा, फूल के झेला एके बेंत म बिहूस होगे। अऊ मारिन। सजा ताय। ओकरे सेती करिया गे बिसनू।’’

बतावत बतावत आंखी म आंसू आगे मंडल के। अंकलहा किहिस - ‘‘फेर का करबे, हमी मन गद्दार हन?
बिसनूदाऊ ला लागिस जइसे अंकलहा हा ओकर मुंह म खखार के सब के आगू म थूक दिस।
घनाराम अंखियाइस अंकलहा ल।

टंकलहा चुप होगे। महराजी किहिस - ‘‘मंडल, तोर बेटा ये। सुराजी तो बनगे करही। करेजा चाही सुराजी बने बर। घर म बला के हइतारा मन संग डल्ला उड़ाना सरल हे अउ बेंत खाके गांधी बबा के काम करना अऊ जहल जाना गजब कठिन।’’
‘‘जेखर राहय लोहा के दांत, तऊन खाय ससुरार के भात’’....
फोकट नई केहे गेहे। तैं तो जस के तस हस मंडल, फेर सामलाल निकलही सुराजी। हमन तो मर-खप जाबो। सामलाल देखही देस के आजादी अऊ चमक ल।

घनाराम मंडल महराजी के बात सुनके उठ बइठिस। किहिस - ‘‘महराजी, राज करंते राजा नई रहि जाय, रूप करंते रानी। रहि जइहंय ग नाव निसानी। ले चलव भइया, हो। उठव रेंगव गजब दुरिहा जाना हे।’’