गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

देवी गीत

मां आदि शक्ति के नवरात पर्व के अवसर मा रमेशकुमार सिंह चौहान दुवारा रचित देवी गीत मन ला भाई प्रेम पटेल, बिलासपुर हा अपन स्वर मा ढाले हे, छत्तीसगढी के छंद के रचना ला शास्त्रीय गायन के प्रयास ला नेट मा परचारित करके सहयोग करहु




...

गांव अभी दुरिया हे_Gao Abhi Dhuriya he_Hamar Angana

तिपे चाहे भोंभरा,
झन बिलमव छांव मा
जाना हे हमला ते गांव
अभी दुरिया हे।
कतको तुम रेंगाव गा
रद्दा हा नइ सिराय
कतको आवय पड़ाव
पावन जस नइ थिराय
तइसे तुम जिनगी मा,
मेहनत सन मीत बदव
सुपना झन देखव गा
छांव अभी दुरिहा हे।
धरती हा माता ए
धरती ला सिंगारो
नइये चिटको मुसकिल
हिम्मत  ला झन हारो
ऊंच-नीच झन करिहव
धरती के बेटा तुम
मइनखे ले मइनखे के
नांव अभी दुरिहा हे।
गांव अभी दुरिया हे
- गीतकार :
स्व. नारायणलाल परमार

भांवर (Bhawar CG - Hamar Angana)

भांवर 
Image result for wedding indian
.............
कामा उल्होथे कारी बदरिया
कामा ले बरसे बूंद
सरग उलहाथे कारी बदरिया
धरती मा बरसे बूंद
काखर भीजे नवरंग चुनारिया
काखर भीजे उस्माल
सीता भीजे नवरंग चुनारिया
राम के भीजे उस्माल
आगू आगू राम चलत हे
पीछू मां लक्षिमन भाई
मांझ मंझोलन सीता-जानकी
चित्रकुट बर जाई।

दहेज (Dahej CG -Hamar Angana)

दहेज
Image result for wedding gift indian
................
हलर-हलर मे मड़वा हाले,
खलर-खलर दाइज पर
सुरहित गइया के गोबर मंगई ले
खुट धरि अंगना लिपई ले
गल मोतियन के चौक पुरई ले
सोने कलस धरई ले।
कोन देवो मोर अवहर पवहर
कोन देवे धेनू गाय
ददा मोर टिकथे हंसा घोड़ा
दाई मोर टिकथे अवहर पवहर
भइया मोर टिकथे कनक के थार
भऊजी कहे सियाराम।

भड़ौनी (Bhadoni CG - Hamar Angana)

भड़ौनी 


................
दर बर दर आये समधी,
कोठा मां हमाय हो।
सूपा सूपा किरनी चाबिस,
भितिया मां खजवाये हो।
आनी बानी के आये बरतिया,
मड़वा मां डारे बांस हो।
सोहाग देखे बर निकरे सुबासा
जर जाय तोरे नाक हो।
बने-बने तोला जानेंव समधी,
मड़वा मां डारेंव बांस रे।
झाला पाला लुगरा लाने,
जरे तुंहर नाक रे।
दार करे चांउर करे,
लगिन ला धराये रे।
बेटा के बिहाव करे,
बाजा ला डर्राये रे।
मेछा हावे लाम-लाम,
मुंहू हावे करिया रे।
समधी बिचारा का करे,
पहिरे हावे फरिया रे।
मेछा हावे कर्रा-कर्रा,
गाल हे तुंहर खोधरा रे।
ज्यादा झिन अटियाव समधी,
होगे हावे डोकरा रे।

हास परिहास (hash parihash -Hamar Angana)

हास परिहास 


..................
बरा खाहूं कहिथे समधिन,
बरा कहां पाबे रे।
हाथ गोड़ के बरा बना ले,
टोर-टोर के खाबे रे।
सुघ्घर मखना खाय बर,
अउ पिराये पेट रे।
का लइका बियाये समधिन,
जस हंसिया के बैंठ रे।
खीरा फरिस, जोंधरा फरिस,
फरिस हावय कुंवरू रे।
एक समधिन ला चलो नचाबोन,
गोड़ मा बांध के घुंघरू रे।

मोर कहां गंवागे गांव (Mor kaha gwage gaw)

मोर कहां गंवागे गांव’’ छत्तीसगढ़ी गीत के संस्कार म पले, मनमोहनी परकीरीति के सुसमा म बाढ़े कवि डाॅ. रमाकांत सोनी के गुरतुर किरतिय आय। जेन अदारस, सरलता, अंतस के परेम, मरजाद, मितानी अउ मिहनत के मोंगरा ले गांव महमहावय तेन महमही ह कहां गंवागे के कहके कवि पुछत हे। फेर कहिथे के मोर वोइ गंवाए गांव ल पा जाहा, तब अमरा दिहा। ए पोथी के सिरसक ह आदमी मन ल चेत करवइया हे। ए संगरह मं तीन कोरी केरा मां सक्कर पागे कस कविता हावय। जेन भाव पक्छ ले कवि के काव्य-साधना के देन आय। डाॅ0 सोनी ह ए संगरह के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी ल भासायी उरजा परदान करे हे। रचना मन म छंद, अलंकार के सुघ्घर तालमेल हावय। अलंकार ह कविता के सिंगार आय, फेर कविता के आत्मा तो वोकर रस हे। भाखा वोकर वानी अउ छंद वोकर अनुशासन ए। कवि ह एमन ल अपन रचना म बने धियान दे हे। संगरह के सीरसक गीत म कवि अपन सरल अउ भावपूरन्न भासा म संस्कीरीति अउ परम्परा ले हटत अउ जरी ले कटत मनखे मन सो पूछत हे - 
मोर कहां गंवागे गांव रे, 
मैं खोजत हाववं, मोर पीपर पेड़ के छाव रे,
मैं खोजत हाववं। 
संगरह के गीत ल पढ़े के बाद म गीत मन अंतस मं गुंजे लागथे। कई ठन गीत ते मन ल झकझारे देथे। हमर आजादी ल तीन कोरी बच्छर पूरगे हे तब ले रइ-रइ के ये परस्सन उठथे के - 
ये देस हमर अय का, 
मै खोजत रथवं बइहा।
ये राज हमर अय का
मै गुनत रथवं बइहा।
परदूसन ह खाली पानी-माटी अउ हवा भर म नइये। ऐहा हमर संस्कार अउ मनखे मन के चेतना घलो ल बाइ कस मार दे हे। थोकन ये लाइन ल देखव-
सब सहर के जहर ह, एही डहर मं आवत हावय।
अब गावं के गंगा के पानी, घलो सुखावत हावय।
कोन भागीरथी ला पांव रे, मैं खोजत हाववं।

विद्याभूषण मिश्र
जांजगीर, छत्तीसगढ़

भोभरा जरत हे (Bhombhra Jarat he)

भोंभरा जरत हे राम
लकलक ले जरत हे भुइयां
नइ दिखय कोनो जगा छाइहा
सुहात नइए कुछू बूता काम
भोंभरा जरत हे राम।
चिरई लकाहे भोंगरा में
जपय कृष्ण हरे राम
भोंभरा जरत हे राम।
सुरूज करे अलकरहा अंजोर 
सुन्ना दिखे गांव, गली, खोर
घर कुरिया म सब करे अराम
भोंभरा जरत हे राम।
घरों-घर करसी के पानी
सुनावत हे सबके कहानी 
भजले-भइया सीता राम-राम
भोभरा जरत हे राम

जितेंद्र ‘सुकुमार’


मोर मयारू छत्तीसगढ़ गजब हे महान गा (mor Mayaru Chhattisgarh Gajab he Mahan ga)

मोर मयारू छत्तीसगढ़ गजब हे महान गा,
धरती दाई के सेवा करे लइका अउ सियान गा।
तन म पसीना ओगार के,
चेला रूकोवत हे।
खेत-खार मं मोर बोवत हे।
ये अड़हा किसान ल नइये गरब-गुमान गा,
धरती दाई के सेवा करे लइका अउ सियान गा।
कोलकी, कोलकी बइला रेंगय,
बइला के सींग मं माटी गा।
नवा बहुरिया लाये हाबे,
चटनी संग मं बासी गा।
रापा, कुदारी, नागर, बइला मीत-मितान गा,
धरती दाई के सेवा करे, लइका अउ सियान गा।
बलावय चिरई-चुरगुन,
अउ मेड़ पार गा।
किसान सबके हरे पोसइया,
क्रोध म हाबे जग के भार गा।
नवा हे सुराज नावा हे बिहान गा,
धरती दाई के सेवा करे, लइका अउ सियान गा।


जितेंद्र ‘सुकुमार’


अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपारइँदिरावती हा पखारय तोर पईयांमहूं पांवे परंव तोर भुँइया(Arpa pairy ke dhar . Maha nadi)

अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार
इँदिरावती हा पखारय तोर पईयां
महूं पांवे परंव तोर भुँइया
जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया
(जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया)
हो हो हो आ~~~अ
सोहय बिंदिया सहीं, घाट डोंगरी पहार
(सोहय बिंदिया सहीं, घाट डोंगरी पहार)
चंदा सुरूज बनय तोर नैना
(चंदा सुरूज बनय तोर नैना)
सोनहा धाने के अंग, लुगरा हरियर हे रंग
(सोनहा धाने के अंग, लुगरा हरियर हे रंग)
तोर बोली हावय सुग्घर मैना
अंचरा तोर डोलावय पुरवईया
महूं पांवे परंव तोर भुँइया
जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया
(जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया)
हो हो हो आ~~अ
रयगढ़ हावय सुग्घर, तोरे मउरे मुकुट
(रयगढ़ हावय सुग्घर, तोरे मउरे मुकुट)
सरगुजा अउ बिलासपुर हे बइहां
(सरगुजा अउ बिलासपुर हे बइहां)
रयपुर कनिहा सही घाते सुग्घर फबय
(रयपुर कनिहा सही घाते सुग्घर फबय)
दुरूग बस्तर सोहय पैजनियाँ
नांदगांव नवा करधनिया
महूं पांवे परंव तोर भुँइया
जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया
(जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया
जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया
जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया)
डॉ नरेन्द्र देव वर्मा
गायन शैली : ?
गीतकार : डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा
रचना के वर्ष : ?
संगीतकार : ?
गायन : ममता चन्द्राकर

02) सुवा गीत (Suwa Geet)


सुआ नृत्य :- छत्तीसगढ़ के स्त्रियों का यह समूह नृत्य है। नारी मन की भावना, सुख-दुख की अभिव्यक्ति और उनके अंगों का लावण्य ”सुवा नृत्य” या ”सुवना” में देखने को मिलता है। इस नृत्य का आरंभ दीपावली से होता है जो अगहन मास तक चलता है। इस वृत्ताकार नृत्य में एक लड़की जो ”सुग्गी” कहलाती है, धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुग्गा रखती है-कहीं एक तो कहीं दो। ये शिव और पार्वती के प्रतीक होते हैं। टोकरी में रखे सुवे को हर रंग के नए कपड़े और धान के नव मंजरियो से सजाया जाता है। सुग्गी को घेरकर स्त्रियाँ ताली बजाकर नाचती और गाती हैं। इनके दो दल होते हैं। पहला दल जब खड़े होकर ताली बजाते गीत गाता है तो दूसरा दल अर्द्ध वृत्त में झूककर ऐड़ी और अंगूठे की पारी पारी उठाती और अगल बगल तालियाँ बजाकर नाचतीं और गाती हैं /
* छत्तीसगढ़ का नृत्यगीत है।
* कार्तिक माह के कृष्णपक्ष से प्रारंभ होते इस गीत-नृत्य में छत्तीसगढ़ी नारी और कन्याएं अपने जूड़े में धान की बालियॉ खेंचकर एक टोकरे में मिट्टी की बनी सुवा की एक या दो प्रतिमा रखकर घर-घर में जाकर, वृत्ताकार होकर, झुक-झुक कर नृत्य करती है और समवेत स्वरों में सुवागीत गाती है।
* सुवागीत नृत्य को श्री मृकुटधर पांडेय ने ‘छत्तीसगढ़ का गरबा नृत्य कहा है‘
* सुआ नृत्य के उपलक्ष्य में मालकिन रूपया-पैसा अथवा धन-चावल देकर विदा करती है, तब सुआ नृत्य की टोली विदाई गीत गाती है।
कुछ पंक्तिया आप के सामने :
”पइयाँ मै लागौं चंदा सुरज के रे सुअनां
तिरिया जनम झन देय
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर
जहाँ पठवय तहं जाये।
अंगठित मोरि मोरि घर लिपवायं रे सुअना।
फेर ननद के मन नहि आय
बांह पकड़ के सइयाँ घर लानय रे सुअना।
फेर ससुर हर सटका बताय।
भाई है देहे रंगमहल दुमंजला रे सुअना।
हमला तै दिये रे विदेस
पहली गवन करै डेहरी बइठाय रे सुअना।
छोड़ि के चलय बनिजार
तुहूं धनी जावत हा, अनिज बनिज बर रे सुअना।
कइसे के रइहौं ससुरार
सारे संग खइबे, ननद संग सोइबे रे सुअना।
के लहुंरा देवर मोर बेटवा बरोबर
कइसे रहहौं मन बाँध।”

सखी (गुइंया) (Sakhi)



1. सखी या गुइंया मैत्री, बिलासपुर एवं उसके आसपास की महिलाओं के द्वारा आपस में विचार मिलने पर, स्थापित की जाती है।


2. इस मैत्री की किसी पर्व के अवसर पर या रामायण, कथा आयोजित कर स्थापित करते है।
3. इस मैत्री को स्थापित करने वाले दोनों परिवार के बीच सुख-दूख में तथा खान-पान में भी एक रहते है।
4. गुइंया शब्द को जांजगीर, बाराद्वारा क्षेत्र में गियां उल्लेख करते है। छत्तीसगढ़ की ये उन्नत परंपराएं छत्तीसगढ़ी अस्मिता की पोषक है।

अब मान जा ना रे जोही (Ab maan ja n re Johi)

रतिहा के गुसीआएं, अब ले बोलत नई अस ।
अब मान जा ना रे जोही, मोर जीयरा जरय। अब मान जा...

कोयली कस बोली, तोर हसी अऊ ठिठोली,
सुने बर रे पिरोहील, मोर मनुवा तरसय । अब मान जा...

चंदा बरन तोर रूप, राहू कस गुस्सा घूप,
लगाय हे रे ग्रहण, अंधियार अस लागय । अब मान जा...

तोर गोरी गोरी गाल, गुस्सा म होगे ह लाल,
तोर गुस्सा  ह रे बैरी, आगी कस बरय । अब मान जा...

होही गलती मोर, मै कान धरव
तोर मया बर रे संगी, मै घेरी घेरी मरव । अब मान जा...


प्रस्तुतकर्ता:
रमेशकुमार सिंह चौहान
नवागढ जिला-बेमेतरा (छ.ग.)

पंथी गीत (Guru Ghashidas)

गुरु घासी दास बाबा,  सत के  अलख जगायें ये धाम म  ।

jaitkhamसत के अलख जगायें ये धाम म ...2

सादा तोर खम्भा बाबा, सादा तोर धजा ,
सादा तोर धजा बाबा, सादा तोर धजा,
सत के धजा फहरायें ये धाम म ।

मनखे मनखे एक होथे, मनखे ल बतायें
मनखे ल बतायें बाबा, मनखे ल बतायें
मनखे  मन के छुवाछूत ल मिटायें ये धाम म ।

प्रस्तुतकर्ता:
रमेशकुमार सिंह चौहान
नवागढ जिला-बेमेतरा (छ.ग.)

तुलसी के चौंरा दियना जंजाल होगे रे,

काला बतांव कइसे जियके काल होगे रे,
येद मया के चक्कर म बाराहाल होगे रे।

जनम झन गंवाए कहिेके,
धरम म धियान लगाएंव।
घन मोटियारी आसा मन म,
अटल सोहागिन पाएंव।
मड़वा के पिंयर हरदी पानी लाल होेगे रे,
येद मया के चक्कर म बाराहाल होगे रे।

अंतस म पीरा समागे,
हीरा बासत बासत।
अबिरथा जिनगी बिरथा होगे,
येद रोवत गावत हांसत।
मिठ बोली सतवंतिन के सवाल होगे रे,
येद मया के चक्कर म बारहाल होगे रे।

घर कुरिया परवा छानी,
का धरती आकाशा।
का बहिरासू म हारेंव,
जाने कोन जनम के पासा।
बिच्छल जवानी केे बिच्छल चाल होगे रे,
येद मया के चक्कर म बाराहाल होगे रे।

आंधी बड़ोरा मन ह होगे,
उड़ उड़ ठगे दिन राती।
चंदा सुरूज के हाही समागे,
सुरता जरय बिन तेल बाती।
तुलसी के चौंरा दियना जंजाल होगे रे,
येद मया के चक्कर म बाराहाल होगे रे।


गीतकार
एमन दास मानिकपुरी 'अंजोर'
औंरी, भिलाई 3, जिला दुरूग।
मो.7828953811
Post By : अंजोर

काकर बर मय गाना गावंव, काकर बर अब लिखंव गीत


जेती देखौं तेती भईगे,
दिखथे भाईगे लाल सलाम। 
मरके घलो सरग नई दिखे,
दिखथे भईगे लाल सलाम।

काकर बर मय गाना गावंव,
काकर बर अब लिखंव गीत।
राजनीत के चौपट पासा म,
काकर हार अउ काकर जीत।

कलम कभू कलंक होथे?
लिखथे भईगे लाल सलाम।

तय जा मय आथंव जा जा,
संगे मरबोन ओसरी पारी।
बीता भर पेट के खातिर,
लइकुसहा होगे बन्दूक धारी।

हक बिरता के नारा धरके,
छाती चढ़गे लाल सलाम।

कोलिहा मन सब बघवा होगे,
जब नेता बनगे बेपारी।
थुंक चटैया पिछलग्गू चम्मच,
डंकरत भुंकरत हे अधिकारी।

किसानी बर लहू बोहागे,
धरती भईगे लाल सलाम।


गोड़तरिया इज्जत रौंदागे,
मुड़सरिया चपकागे नोट।
बयान बाजी म बेरा पहागे।
खपगे जिनगी बीतगे गोठ।

तइहा बर बइहा बानी हम,
लइहा भईगे लाल सलाम।

मुंह चपकागे खा पी खाके,
चापलुस के वकालत म।
प्रजातंंत्र सूली चढगिन जब,
यहा दरबारी हालत म।

सुरता भईगे सुख सुमत के,
बिरता भईगे लाल सलाम।

सरग सपना समोखे ठाढ़े,
कमिया नरक ल भोगत हे।
कपटी बैठे मुढ़ी म हमरे,
को जनी का का जोंगत हे?

पुरखा पुरबल के आजादी,
आबादी भईगे लाल सलाम।

बइठे बइठे पांगुर भांजत,
लबरा चांदी काटत हे।
महल अटारी चढ़के दोगला,
भाई भाई ल बांटत हे।

भुंईया के भगवान ठठागे,
ठउका भईगे लाल सलाम।

महतारी बर कोख कपूत के,
पीरा घलोक भारी होगे।
स्वारथ के खातिर दुनिया म,
आंखी देखे लबारी होगे।

चिरहा लंगोटी तक लुलवागे,
आंखी गढ़गे लाल सलाम।

जोग भोग ल छोड़के कवि रे,
लिखो अब ये बानी ल।
रत्नगर्भ म बारूद बिछगे,
गढ़ छत्तीस के जवानी ल।

परन करैया पर के बुध म!
पर के भईगे लाल सलाम।


गीतकार 
एमन दास मानिकपुरी
औंरी, भिलाई3, ​जिला—दुरूग
मो.7828953811
Post By:  अँजोर

गोंदा फुलगे मोरे राजा …

हो गोंदा फुलगे मोरे राजा
गोंदा फुलगे मोर बैरी
छाती मं लागय बान
गोंदा फुलगे~~
हो गोंदा फुलगे मोरे राजा

गोंदा फुलगे मोर बैरी
छाती मं लागय बान
गोंदा फुलगे~~
गोंदा फुलगे मोरे राजा~~~

ठाढ़े हे बै~री टरत नई ये
हो~~~ ठाढ़े हे बैरी टरत नईये~
मोर आंखी के पिसना
मोर आंखी के पिसना मरत नईये~
गोंदा फुलगे~~
गोंदा फुलगे मोरे राजा
गोंदा फुलगे मोर बइरी
छाती मं लागय बान
गोंदा फुलगे~~
हो गोंदा फुलगे मोरे राजा~~ हा हा~~

पूनम के चंदा लजा के मर जाए~~
पूनम के चंदा लजा के मर जाए
तोर रूप आज रतिहा
तोर रूप आज रतिहा गजब गदराए
गोंदा फुलगे~~
गोंदा फुल गे मोरे राजा
गोंदा फुल गे मोर बैरी
छाती मं लागय बान
गोंदा फुलगे~~
हो गोंदा फुलगे मोरे राजा~~
होहो~ ओहो~ अहा~ अहा~ अहा~

सुआ नही बोले ना बोले मैना
हो~~ सुआ नही बोले ना बोले मैना
मैं तरसत हव सुनेबर तोरेच बैना
गोंदा फुलगे~~
गोंदा फुल गे मोरे राजा
गोंदा फुल गे मोर बैरी
छाती मं लागय बान
गोंदा फुलगे~~
हो गोंदा फुलगे मोरे राजा~~
हो~ हा हहा हा~~

फुलगे गोंदा
हा~ हा~ हा~


गीतकार : हरि ठाकुर
रचना के वर्ष : 1965-68
संगीतकार : जमाल सेन
गायन : मोहम्मद रफी
निर्माता : विजय कुमार पाण्डेय
फिल्म : घर द्वार
फिल्म रिलीज : 1971

चौरा मा गोंदा … Chaura Ma Gonda



चौरा मा गोंदा~~~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा
चौरा मा गोंदा~~~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा

लाली गुलाली रंग छिचत अईबे
राजा मोर छिचत अईबे
लाली गुलाली रंग छिचत अईबे
राजा मोर छिचत अईबे
छिचत अईबे रसिया
मै रैइथव छेव पारा म पूछत अईबे
पूछत अईबे रसिया
मै रैइथव छेव पारा म पूछत अईबे
चौरा मा गोंदा~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा

परछी दुवारी म ठारेच रइहव
जोड़ी मोर ठारेच रइहव
परछी दुवारी म ठारेच रइहव
जोड़ी मोर ठारेच रइहव
ठारेच रैइहव रसिया
मन मा घलो मा
दिया ल बरेच रइहव
बरेच रइहव रसिया
मन मा घलो मा
दिया ल बरेच रइहव
चौरा मा गोंदा~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा

गली मा आँखी ल बिछाए रइहव
धनी मोर बिछाए रइहव
गली मा आँखी ल बिछाए रइहव
धनी मोर बिछाए रइहव
बिछाए रइहव रसिया
आके म नई लेबे रे रिसाये रइहव
रिसाये रइहव रसिया
आके म नई लेबे रे रिसाये रइहव
चौरा मा गोंदा~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा
चौरा मा गोंदा
चौरा मा गोंदा


गीतकार : लक्ष्मण मस्तुरिया
रचना के वर्ष : 1982
संगीतकार : खुमान गिरजा
गायिका : कविता वासनिक (हिरकने)