मां आदि शक्ति के नवरात पर्व के अवसर मा रमेशकुमार सिंह चौहान दुवारा रचित देवी गीत मन ला भाई प्रेम पटेल, बिलासपुर हा अपन स्वर मा ढाले हे, छत्तीसगढी के छंद के रचना ला शास्त्रीय गायन के प्रयास ला नेट मा परचारित करके सहयोग करहु
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- गीतकार :
स्व. नारायणलाल परमार
अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार
सुआ नृत्य :- छत्तीसगढ़ के स्त्रियों का यह समूह नृत्य है। नारी मन की भावना, सुख-दुख की अभिव्यक्ति और उनके अंगों का लावण्य ”सुवा नृत्य” या ”सुवना” में देखने को मिलता है। इस नृत्य का आरंभ दीपावली से होता है जो अगहन मास तक चलता है। इस वृत्ताकार नृत्य में एक लड़की जो ”सुग्गी” कहलाती है, धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुग्गा रखती है-कहीं एक तो कहीं दो। ये शिव और पार्वती के प्रतीक होते हैं। टोकरी में रखे सुवे को हर रंग के नए कपड़े और धान के नव मंजरियो से सजाया जाता है। सुग्गी को घेरकर स्त्रियाँ ताली बजाकर नाचती और गाती हैं। इनके दो दल होते हैं। पहला दल जब खड़े होकर ताली बजाते गीत गाता है तो दूसरा दल अर्द्ध वृत्त में झूककर ऐड़ी और अंगूठे की पारी पारी उठाती और अगल बगल तालियाँ बजाकर नाचतीं और गाती हैं /
