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कहां पनहाथ _ Kaha Panhath_HaMar Angana

कुकुर मन पूछी ल अपन संहुराथे
मियाऊं-मियाऊं राग बिलईय्या गाथे
मनखे म मनखे के
कहां हे बिसवास,
सुवारथ म बस अपन
मुड़ी ला नवाथे।
सबके मन, पीरा के बसे हे संसार
हरहिंसा जिनगी ला कउन जी पाथे
बिन मतलब के चिंता म
बोहे हे अगास,
मंगरा कस अपने आंसू ल बोहाथे।
सबके एकठन मतलब हे
ये जिनगी के,
दुख के आंसू के मोल
कउन लगाथे।
सावन के अंधरा ल दिखे
सबो हरियर,
बिन बिहाय गाय ह
कहां पनहाथे।
सबके सुर अलग हे
अलगे हावे राग,
चिरई, एके खोंधरा म
कहां रहि पाथे।
- बलदाऊ राम साहू,

भोभरा जरत हे (Bhombhra Jarat he)

भोंभरा जरत हे राम
लकलक ले जरत हे भुइयां
नइ दिखय कोनो जगा छाइहा
सुहात नइए कुछू बूता काम
भोंभरा जरत हे राम।
चिरई लकाहे भोंगरा में
जपय कृष्ण हरे राम
भोंभरा जरत हे राम।
सुरूज करे अलकरहा अंजोर 
सुन्ना दिखे गांव, गली, खोर
घर कुरिया म सब करे अराम
भोंभरा जरत हे राम।
घरों-घर करसी के पानी
सुनावत हे सबके कहानी 
भजले-भइया सीता राम-राम
भोभरा जरत हे राम

जितेंद्र ‘सुकुमार’


सब वोकरे संतान ये संगी..(Sub Okre Santan Ye Sangi..)

सोन-पांखी के फांफा-मिरगा या बिखहर हो जीव
सबके भीतर बन के रहिथे एकेच आत्मा-शिव
तब कइसे कोनो छोटे-बड़े या ऊंँचहा या नीच
सब वोकरे संतान ये संगी जतका जीव-सजीव

सुशील भोले
मयारु माटी
मेरे गीत सुनें-
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हमरे यह जीवन या विधा ते (Hamare Yah Jivan Ya Vidha te)

कबहूं सतसंग में रंग रहै, कबहूॅ उर आनंद ते बिहरें।
कबहूं कवि सुन्दर काव्य करै, कबहूॅ उपदेशन को उचरै।।
कबहूं पर के उपकारन में, निवछावर ये तन प्राण करै।
हमरे यह जीवन या विधा ते, कबधौ करूणाकर पार करें।।




परयावरण ( साफ रख चारो कोती )

चारोे कोती तोर रे, का का हे तै देख ।
धरती अगास पेड रूख, हवा पानी समेख ।।
हवा पानी समेख, जेखरे ले जिनगी हे ।
‘पंच-तत्व‘ हा आज, परयावरण कहाय हे ।
करव ऐखर बचाव, आय जिनगी के मोती ।
गंदगी ला बहार, साफ रख चारो कोती ।।

प्रस्तुतकर्ता:
रमेशकुमार सिंह चौहान
नवागढ जिला-बेमेतरा (छ.ग.)

बरसै अंगरा जरै भोंभरा





















चढ़के सरग निसेनी सुरूज के मति छरियागे

हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
बढ़े हावे मंझनिया संकलाए हे गरूआ अमरैया तरी
हर-हर डोलत हे पीयर धुंकतहे रे बैहर घेरी-बेरी
बुढ़गा ठाड़े हे बमरी पाना मन सबो मुरझागे
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
भरे तरिया अंटागे रे कइसे थिरागे बोहत नरवा
बिन पानी के चटका बरत हे मनखे मन के तरूआ
चटका बरगे मनखे मन के तरूआ।
नदिया घाट घलो जाके मंझधार म संकलागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
घर के रांपा कुदारी खनत हावे माटी रे कि सान हर
बोहे झौंहा किसानीन देवतहे ढेलवानी रे मेंढ़ ऊपर
हां देवत हे ढेलवाती रे मेंढ़ ऊपर।
मेहनत बन के पसीना माथा ले बोहावत लागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
कहै भौजी कइसे जावौं तरिया रेंगत मैं जरै भोंभरा
पानी नइये खवइया बर रीता परे हे जमो गघरा
रीता परे हावै रे जमो गघरा
ढरकै कबले रे बेरा हर झटकुन कइसे रतियागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
नई सुमावै अब कोइली के तान हर आमा के डारा म न
गूंजत रहिथे रे झेंगुरा मंझनिया भर खार अऊ ब्यांरा म न
हां मंझनिया भर खार अऊ ब्यारां म न
लागै कबलै आशाढ़ रे भुइंया गजब अकुलागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।

'श्रीमती दीप दुर्गवी`

जेेन देखय मुॅह तोरे




मुॅंह तोरे बगराय हे, सबो डहर अंजोर ।
चारो कोती देख तो, कतका तोरे सोर ।।
कतका तोरे सोर, लगय चंदा हा सिठ्ठा ।
गुुरतुर बोली तोेर, मीठ ले जादा मिठ्ठा ।।
नसा घात छलकाय, अपन आंखी मा बोरे ।
बहिया तो बन जाय, जेेन देखय मुॅह तोरे ।।
Post By :सुरता 

पैसा के खेल ईमानदार मन पेल-ढपेल ।


टूटगे आज
मरजादा के डोरी
लाज के होरी ।

पईसा सार
नता-गोता ह घलो
होगे बेपार ।

मन म मया
सिरावत हे, पैसा
हमावत हे ।

बढती देख
ऑंखी पँडरियागे
मया उडा गे ।

करथे तेन
मरथे, कोढियेच
मन फरथे ।

पैसा के खेल
ईमानदार मन
पेल-ढपेल ।

परबुधिया
बनके झन ठगा
ठेंगवा चटा ।

परगे पेट
म फोरा, मुसुवा ह
निकालै कोरा ।

पेट के सेती
शहर जाथे, उहें
पेट कटाथे ।

मया के गीत
मन गुदगुदाथे
फागुन आथे ।


नरेन्‍द्र वर्मा
सुभाष वार्ड, भाटापारा
09425518050  
Post By : संभव