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11). बीरम गीत (Biram Geet)

* बीरम गीत खानाबदोंश देवार जाति की स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है। 
* घुमक्कड़ स्वभाव के कारण इन प्रचलित बीरमगीतों में विभिन्न क्षेत्रों के ऐतिहासिक संदर्भो का बखान मिलता है। 
* बीरमगीत के मध्य जब स्त्रियॉ चूड़ी खनकाती है, तब यह गीत उनके करूण एवं हृदयविदारक जीवन से मिलकर रस की वर्षा करता है।

बालगीत 

* छत्तीसगढ़ के बालक-बालिकाओं के गीत भी बड़ी संख्या में प्रचलित है। 
बच्चे इन गीतों को खेलते समय गाते है। 
* मनोरंजन हेतु बने हुए गीतों में कहीं कहीं बाल मनोविज्ञान की बातें भी कहीं गई है। 
* बाल गीतों में प्रमुख गीतों - अटकन-बटकन, फुगड़ी, डॉडीपौहा, भौंरा, कबड्डी गेंड़ी आदि है।

10). पंथी गीत (Panthi Geet)

* पंथी गीत सतनाम पंथ के नृत्यगीत है। ‘
* पथ समुदाय बोधक शब्द है। पंथी गीत में सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरूघासीदास के दिव्य जीवन के वैभव और पंथ के महात्मय का गायन किया जाता है।
* गुरू घासीदास और कबीरदास छत्तीसगढ़ अंचल में सर्वाधिक लोकप्रिय संत के रूप में प्रतिष्ठित है।
* इन्होंने सत्य और ज्ञात का पक्ष ग्रहण कर आचरण की सभ्यता और सहजता पर बल दिया।
* धर्म को अभिजात्य वर्ग के अतिवादी आग्रहों से मुक्त कर सामान्य जन के लिए सुलभ एवं सुगम बनाया।
* वस्तुतः पंथीगीत सत्य की जय का नृत्य गीत है।

09). भजन गीत (Bhajan Geet)

* छत्तीसगढ़ में निर्गुण सगुण, दोनों धाराओं के मतावलंबी है।
* अलग-अलग धाराओं के लोग अपने इष्ट देवी-देवताओं की स्तुति अपने मत के अनुसार करते है।
* इनमें अपने अलग-अलग भजन है।

जाति गीत 

* छत्तीसगढ़ की कुछ विशिष्ट जातियों में कुछ विशिष्ट प्रकार के गीत प्रचलित है, जो अन्य जातियों में नहीं मिलते, यथा-रावत लोगों का बॉसीगीत, देवारों का बीरमगीत, बसदेवाओं को बसदेवागती और सतनामियों का पंथी गीत।

बॉस गीत 

* रावतों के द्वारा गाया जाने वाला बॉस गीत दो-दो व्यक्तियों के द्वारा विभिन्न दलों में गाया जाता है।
बंशीनुमा बॉंस के लगभग चौड़ाई हिस्सू के आकार का यह बॉस का वाद्य बॉसगीत में प्रयुक्त होता है, जिसेसे ‘‘पों पों‘‘ की विशिष्ट आकर्षक ध्वनि होती है।
* एक व्यक्ति के एक बार लंबी सॉस भर लेने के पश्चात् दूसरे दल द्वारा बॉस गाना प्रारंभ होता है। आधे-आधे घंटे की लंबी और विलंबित सॉस के साथ बजती हुई बॉस की भावों की कोमलता ध्वनित किया जाता है।
देवी-देवताओं, गुरूजनों एवं ईष्टों के मंगलाचरण की परिपाटी के आरंभ होकर बॉसगीत महाकाव्य की तरह कथानक के कथाक्रम से जुड़ जाता है।

08). जॅवारा गीत (Jawara Geet)

* चैत्र माह में पुरूषों के प्रधान पर्व के रूप में जॅवारा पर्व मनाया जाता है 
* जिसमें देवी की पूजा-अर्चना के बाद रात्रि को गीत गाने की प्रथा है। 
* इन गीतों में देवी की प्रार्थना, स्तुति, पराक्रम तथा शोभा यशोगान होता है। 
* इन गीतों में देवी को अनेक प्रचलित नामों के अतिरिक्त अन्य आंचलिक नामें से संबोधित किया गया है, 
* यथा-महामाई भवानी, शीतला, जगतारन और माय। ये छत्तीसगढ़ की प्रमुख आराध्य देवियॉ है।

07). होली गीत (Holi Geet)


* फागुन पूर्णिमा के दिन होली का त्यौहार धूम-धाम से मनाया जाता है। 
* बसंत पंचमी के दिन एरंड़ का वृक्ष बैगा के द्वारा गड़ाया जाता है और लड़के उसी उके पास लकड़ियॉ इकठ्ठा करना शुरू कर देते है। 
* प्रत्येक रात्रि को वहॉ नगाड़े बजाकर गीत गाते है, जो फागगीत के नाम से जाने जाते है। 
* जिस रात होली जलाईं जाती है, उसी रात को गॉव के युवक, बालक, वृद्ध उस स्थल पर एकत्रित होते है। 
* मॉदर,ढोल,डफनी, नगाड़े साथ नृत्य और गान होता है। दूसरे दिन रंग और गुलाल खेला जाता है। 
* होली के उल्लासमय वातावरण के मध्य फागगीत का गान उल्लेखनीय है। 
* होली में गाये जाने वाले गीतों में राधा-कृष्ण के होली खेलने का वर्णन ‘राधे बिन होली न होय, सहर में दे दे बुलौवा राधे को‘ - जैसे फाग गीतों से कृष्ण को आने का आहान किया जाता है।

06). डंडा गीत(Danda Geet)


* छत्तीसगढ़ के पुरूष नृत्यगीतों में डंडागीत प्रमुख है। 
* वस्तुतः यह छत्तीसगढ़ का रासगीत है। 
* गॉव के नवयुवक, चंदन, तिलक, फुलमाला और वस्त्राभूषण सज-धजकर निकलते है। 
* हाथ में डंडा या छोटी लकड़ी होती है। 
* वे वृत्ताकार हो घूम-घूमकर नाचते है। 
* नाचते हुए ताल के अनुसार एक दूसरे-की लकड़ी पर चोट करते है। नृत्य के मध्य ये कभी उझलते, कभी झुकते, कभी थिरकते और कभी मुड़ते हैं। उस समय नवयुवकों के सुकुमार अंगो की लोच देखते ही बनती है।
* डंडा नृत्य बड़ा कलापूर्ण होता है। 
* डंडागीतों में राधाकृष्ण की प्रेम लीलाओं के प्रसंगी के साथ राम लक्ष्मण से संबंधित कथाओं का उद्धरण भी देखा जाता सकता है।

04). करमा गीत (Karma Geet)


* पुरूष वर्ग के प्रमुख नृत्यगीत के नाम से अभिहित करमा नृत्य के संबंध में अनेक दंतकथाए प्रचलित है।
* एक विशिष्ट किंवदंती के अनुसार ‘कर्मसेमी‘ वृक्ष की शाखा की, देवता के रूप में स्थापना की जाती है और उसी का पूजन किया जाता है।
* नृत्य के साथ उच्च स्वर में गीत गाए जाते हैं।

05). मंड़ई गीत (Madaie Geet)

* बॉस के विनिर्मित, मयूर पंख और कौड़ियों से जड़ित यह मॅड़ई स्तम्भ के समान होता है जिसे हिलाते-डुलाते रावत नाचते है।
* छत्तीसगढ़ रावत जाति का यह मॅड़ई,सर्वाधिक महत्व का त्यौहार होता है।
Image result for रावत नाचा* इस त्यौहार की प्राचीन परंपरा पर प्रकाश डालते हुए दयाशंकर शुक्ल ने लिखा हैै, मॅड़ई छत्तीसगढ़ का जातीय * नृत्य उत्सव की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है।
* कार्तिक शुक्ल पक्ष एकदशी के दिन रावत अपने देवी-देवताओं की पूजा कर अपनी मड़ई अपने यजमानों के * यहॉ जा-जाकर गाजे बाजे के साथ करते है।
* नृत्य के साथ बजाने का विशेष महत्व हैै।

03) गौरा गीत (Gaura Geet)


* गौरा भी मुख्यता नारी पर्व है जो दीपावली के बाद धूमधाम से मनाया जाता है। 

* गौरा के अवसर पर महादेव और पार्वती की प्रतिमाएं स्थापित की जाती है और उन्हीं का पूजन किया जाता है। 

Image result for diwali* गीत-गाते नारियॉ इतनी भाव-विभोर हो जाती है कि इन पर देवता चढ़ जाता है, जिसे ‘देवचघी‘ या ‘देवता बइठई‘ के नाम से जाना जाता है। 

* इन गीतों में महादेव और पार्वती स्तुति के अलावा ऐतिहासिक और पौराणिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है।


02) सुवा गीत (Suwa Geet)


सुआ नृत्य :- छत्तीसगढ़ के स्त्रियों का यह समूह नृत्य है। नारी मन की भावना, सुख-दुख की अभिव्यक्ति और उनके अंगों का लावण्य ”सुवा नृत्य” या ”सुवना” में देखने को मिलता है। इस नृत्य का आरंभ दीपावली से होता है जो अगहन मास तक चलता है। इस वृत्ताकार नृत्य में एक लड़की जो ”सुग्गी” कहलाती है, धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुग्गा रखती है-कहीं एक तो कहीं दो। ये शिव और पार्वती के प्रतीक होते हैं। टोकरी में रखे सुवे को हर रंग के नए कपड़े और धान के नव मंजरियो से सजाया जाता है। सुग्गी को घेरकर स्त्रियाँ ताली बजाकर नाचती और गाती हैं। इनके दो दल होते हैं। पहला दल जब खड़े होकर ताली बजाते गीत गाता है तो दूसरा दल अर्द्ध वृत्त में झूककर ऐड़ी और अंगूठे की पारी पारी उठाती और अगल बगल तालियाँ बजाकर नाचतीं और गाती हैं /
* छत्तीसगढ़ का नृत्यगीत है।
* कार्तिक माह के कृष्णपक्ष से प्रारंभ होते इस गीत-नृत्य में छत्तीसगढ़ी नारी और कन्याएं अपने जूड़े में धान की बालियॉ खेंचकर एक टोकरे में मिट्टी की बनी सुवा की एक या दो प्रतिमा रखकर घर-घर में जाकर, वृत्ताकार होकर, झुक-झुक कर नृत्य करती है और समवेत स्वरों में सुवागीत गाती है।
* सुवागीत नृत्य को श्री मृकुटधर पांडेय ने ‘छत्तीसगढ़ का गरबा नृत्य कहा है‘
* सुआ नृत्य के उपलक्ष्य में मालकिन रूपया-पैसा अथवा धन-चावल देकर विदा करती है, तब सुआ नृत्य की टोली विदाई गीत गाती है।
कुछ पंक्तिया आप के सामने :
”पइयाँ मै लागौं चंदा सुरज के रे सुअनां
तिरिया जनम झन देय
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर
जहाँ पठवय तहं जाये।
अंगठित मोरि मोरि घर लिपवायं रे सुअना।
फेर ननद के मन नहि आय
बांह पकड़ के सइयाँ घर लानय रे सुअना।
फेर ससुर हर सटका बताय।
भाई है देहे रंगमहल दुमंजला रे सुअना।
हमला तै दिये रे विदेस
पहली गवन करै डेहरी बइठाय रे सुअना।
छोड़ि के चलय बनिजार
तुहूं धनी जावत हा, अनिज बनिज बर रे सुअना।
कइसे के रइहौं ससुरार
सारे संग खइबे, ननद संग सोइबे रे सुअना।
के लहुंरा देवर मोर बेटवा बरोबर
कइसे रहहौं मन बाँध।”

01) भोजली गीत (Bhojli Geet)


भोजली गीत छत्तीसगढ़ का एक लोकगीत है। छत्तीसगढ़ के महिलाएँ ये गीत सावन के महीने में गाती है। सावन का महीना, जब चारों ओर हरियाली दिखाई पड़ती है तब गाँव में भोजली का आवाज़ें हर ओर सुनाई देती हैं। भोजली याने भो-जली। इसका अर्थ है भूमि में जल हो। यहीं कामना करती है महिलायें इस गीत के माध्यम से। इसीलिये भोजली देवी की अर्थात प्रकृति की पूजा करती है।
[1] उदाहरणार्थ, एक भोजली में कहा गया है-

पानी बिना मछरी,
पवन बिना धाने।

सेवा बिना भोजली के

तरसे पराने।

* श्रावण शुक्ल नवमीं के दिन से छत्तीसगढ़ के नारी समाज में भोजली का उत्सव मनाना प्रारंभ हो जाता है।
* एक निश्चित स्थल पर भोजली स्थापित की जाती है जहॉ सब सखी-सहेलियॉ एकत्रित होती है।
* मट्टी से भरी टोकनियों में जवारा बोई जाती है।
* धान या गेहूं के बीज बोकर नित्य-प्रति उनके बिरवों की सेवा की जाती है, हल्दी पानी छिड़का जाता है।
* भोजली का यह कार्यक्रम श्रावण पूर्णिमा तक चलता है,
* भोजली गीतों में भोजली की आरती, स्वागत, जागरण और भोजली ठंडा करने के गीत प्रमुख है।


छत्तीसगढ़ पर्व गीत (Chhattisgarh parv Geet)