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छत्तीसगढ़ में भोंसले शासन Chhattisgarh Bhosla Shashan


नागपुर के मराठा सरदार भोंसले थे। इसके सहीं संस्थापक रघुजी भोंसला ही थे। इसीलिए इन्हें महान रघुजी कहा जाता था। छत्रपति द्वारा सनद प्राप्त कर इनकी शक्ति व सत्ता स्थापित हुई थी। छत्रपति साहूजी ने जो सनद रघुजी को दिया था, उसके अनुसार उन्हें ‘बरार, गोंडवाना, बंगाल, छत्तीसगढ़, पटना, इलाहाबाद, मकसूदाबाद,’ का प्रदेश अधिकृत करने कहा गया। बखर भी इसे उल्लेखित करता है। इन भागों को उन्हें हस्तगत करना व मराठा प्रभाव स्थापित करना था। 1735 से 1755 ई. पर्यन्त रघुजी भोंसले का 20 वर्षीय काल, मराठा इतिहास में बहुत महत्व रखता है। छत्तीसगढ़ में उनकी विजयी सेना ने प्रवेश किया और यहां भी मराठा प्रभुत्व स्थापित किया। भास्कर पंत नामक योग्य ब्राम्हण सेनापति ने यह कार्य संपादित किया। सन् 1741 ई. में तीस हजार सैनिकों के साथ भास्कर पंत ने रतनपुर पर विजय प्राप्त की।

बिम्बाजी का जमींदारों से संबंध :- Bimba G ka Jamidaar se sambandh


राज्य की आय का तीसरा प्रमुख साधन जमींदारों से वसूला जाने वाला टाकोली था। बिम्बाजी अपने जमींदारों से पूर्ववर्ती कलचुरियों की भांति टाकोली वसूलते थे। छ.ग. की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि प्रशासन के समास्त सूत्रों का आधार राजधानी नहीं हो सकता था। छ0ग0 के प्रमुख 32 जमींदारों 68721 रूपए टाकोली के रूप में वसूल होता था।
बिम्बाजी भोंसले स्वयं छत्तीसगढ़ के जमींदारों से, संबलपुर के जमींदारों से वार्षिक टाकोली वसूल करते थे। बिम्बाजी ने जिन जमींदारों को परास्त किया उनसे इकरानामा लिखवाया। भोंसला राजा के आदेश का पालन, विद्रोहियों को सहायता न देना वार्षिक टाकोली पटाना, अतिरिक्त वसूली न करना, राजाओं या जमींदारों को विद्रोह, के लिए उत्तेजित न करना, शांति व्यवस्था बनाए रखना, प्रजा का शोषण न करना। इस तरह से दस धाराएं होती थी, जिन जमींदारों ने नई व्यवस्था के साथ समझौता कर बिम्बाजी की सहयोग दिया उनके साथ अच्छा व्यवहार किया गया।
कांकेर बिम्बाजी के अधीनस्थ था। धीराज सिंह कांकेर के राजा थे। सिहावा तालुक्का कांकेर के अधीन था। बस्तर राजा सिहावा जीतना चाहता था। बिम्बाजी ने कांकेर राजा की सहायता की और बस्तर राजा के पीछे हटने के लिए बाध्य किया। खैरागढ़ के जमींदार ने बिम्बाजी का विरोध किया, वह दंडित हुआ और टाकोली की राशि बढ़कर 24 हजार रूपए वार्षिक कर दिया गया। 1768 ई. में खैरागढ़ पर बिम्बाजी ने आक्रमण किया था। 1784 ई. में पुनः आक्रमण भास्कर पंत के नेतृत्व में हुआ। सरगुजा रियासत पर भी महिपतराव काशी के नेतृत्व में आक्रमण किया गया (1781 ई.)। सरगुजा से 3 हजार रूपए टाकोली ली जाती थी। चांग भखार रियासत पर भी बिम्बाजी ने 1775 ई. में आक्रमण किया और उसे वार्षिक टाकोली देने के लिए बाध्य किया। कोरबा के जमींदार ने बिम्बाजी का विरोध किया था। अतः उस पर आक्रमण किया गया। विद्रोह का कठोरतापूर्वक दमन किया गया। बिम्बाजी कोरबा जमींदार से इतने नाराज थे कि न केवल पांच हजार रूपए का दंड दिया बल्कि जमींदार से इतने नाराज थे कि न केवल पांच हजार रूपए का दंड दिया बल्कि जमींदारी जब्त कर ली गई। जमींदारी जब्त करने की यह एकमात्र घटना थी। चाम्पा जमींदार दीवान कहलाते थे।
1781 ई. में धमधा पर आक्रमण किया गया, पराजय निकट जान जमींदार ने अपनी पत्नी के साथ जल समाधि ले ली। बिम्बाजी का अधीनस्थ होकर जीना उसे सहय नहीं था। उसका पुत्र जमींदार बनाया गया। टाकोली देना उसने स्वीकार किया। टाकोली पटना व अधीनस्थ रहना ये ही दो मुख्य शर्ते थी जो राजा व जमींदारों से स्वकीकार करवाया जाता था।
बिम्बाजी भोंसले का छत्तीसगढ़ के इतिहास में महत्वपुर्ण स्थान है। राज परिवार के होने के कारण नागपुर दरबार में छ.ग. प्रांत महत्व पाया। तीन पत्नियां - आनदीबाई, उमाबाई, रमाबाई थी। किले के चारों और खाइयां खुदवाई। राममंदिर,लक्ष्मीनारायण मंदिर, खंडोवा मंदिर बनवाया। मुसलमानों के लिए रतनपुर में मस्जिद बनवाया।

छत्तीसगढ़ में आधुनिक युग का प्रारंभ :- Chhattisgarh me Adhunik yug ka Prambh


1741 ई. में मराठा सेनापति भास्कर पंत ने रतनपुर के राजा रघुनाथसिंह को परास्त किया। रघुनाथसिंह को शासन से पृथक कर अपने व्यक्ति को शासन सूत्र का संचालक नियुक्त किया। बिम्बाजी भोंसले ने पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने सेनापति पांडुरंग को छ0ग0 पर अधिकार करने के लिए भेजा, मगर पांडुरंग को सफलता नहीं मिली, पराजय व निराशा से वह लौटा था। मोहनसिंह बीमार पड़ा और मर गया। इस प्रकार से छत्तीसगढ़ पर मराठा आधिपत्य के मार्ग की मुख्य बाधा दूर हुई। मई 1857 ई. से ही छत्तीसगढ़ के इतिहास का आधुनिक युग का प्रारंभ मानना अधिक समचीन होगा।
बिम्बाजी ने उदारतापूर्वक रतनपुर के कलचुरि राजवंश शिवराज सिंह को उसके परखों के हरेक गॉव के पीछे एक रूपया परवरिश के लगा दिया। यह प्रबंध 1822 ई. तक चलता रहा।
मराठा प्रदेश में जन्में, पले, पढे बिम्बाजी विरासत में मराठा चरित्र पाए थे। 
शासन का पूर्वार्ध :-

बिम्बाजी को अपने पिता से उत्तराधिकार के रूप में जो छ.ग. राज्य मिला था, उसकी सीमा काफी दूर तक फैली हुई थी। वर्तमान छत्तीसगढ़ के जिले तो इसमें सम्मिलित थे ही संबलपुर,पटना के 18 गढ़ भी सम्मिलित थे। बिम्बाजी भोंसले के राज्य की सीमा उत्तर पश्चिम में मंडला तक था। बघेल खंड से उत्तरपूर्व में सरगुजा रियासत तक तथा पूर्व में सबंलपुर तक सीमा थी। दक्षिण में धमतरी, परगना, कांकेर, कुरूद राज्य में थे। बस्तर स्वतंत्र राज्य था। बिम्बाजी को प्रशासनिक सुधार की ओर ध्यान देनेन का मौका पूर्वार्ध में नहीं मिला। रतनपुर के महामाया मंदिर के प्रमुख पुजारी पंडित पचकौड़ को 1758 ई. में ही वार्षिक अनुदान देने की घोषणा की गई। पुराने राजवंश की देवी व उसके मंदिर तथा पुजारी के लिए की गई इस व्यवस्था ने बिम्बाजी की उदारता को प्रदर्शित किया।

बम्बाजी का शासन कब से - Bimba g ka Shashan


रतनपुर के प्राचीन महल में प्रवेश कर बिम्बाजी ने छ.ग. के शासन की बागडोर संभाली। 4 फरवरी 1757 ई. से बिम्बाजी भोंसले के शासन को प्रारंभ लिखते है। बिम्बाजी जब नागपुर से रवाना हुए तब अपने साथ अनुभवी व योग्य मराठों को रखे। नए प्रदेश में शासनतंत्र को स्थापित करने और समस्त सूत्रों के केन्द्रीयकरण के लिए अपेक्षित था। नया शासक अपने ढंग से शासन को सुधारने के लिए अपने मराठा सहायकों को पदस्थ किया। घोड़ो महादेव, कृष्णाजी उपाध्ये, महमदर्खा, कादरखां, नीलू पंडित, महाडिक आदि लोगों के साथ बिम्बाजी ने छ0ग0 में पदार्पण किया।
1757 ई. में छ0ग0 आने के पश्चात् भी बिम्बाजी नागपुर की राजनीति में उलझे रहे। 1761 ई. तक नागपुर की राजनीति में रूचि रहने के कारण बिम्बाजी ने छ0ग0 का ख्याल नहीं किया।

छत्तीसगकढ़ के शासक : बिम्बाजी भोंसले | Chhattisgarh ke Shashak


छत्तीसगढ़ के इतिहास में बिम्बाजी भोंसले का महत्वपूर्ण स्थान है। अपने पिता राघोजी राव से उन्होंने छ0ग0 का प्रांत बटवारे में प्राप्त किया। मृत्यु से पूर्व ही राघोजी ने अपना राज्य अपने चार बेटों में विभाजित कर दिया था। जानकोजी को नागपुर राज्य, मुधोजी को चांदा राज्य, साबाजी को बराबर दरव्हा तथा बिम्बाजी को छत्तीसगढ़।
नागपुर की गद्दी के लिए जानको जी और मुधोजी के मध्य संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में बिम्बाजी अपने सहोदर मुघोजी के साथ थे। मुधोजी और जानोजी का अंतिम संग्राम अमरावती के निकट नांदगॉव रहाटगांव में हुआ। इस युद्ध में जानोजी ने विजय संपादन किया। बिम्बाजी को छ.ग. प्रांत मिल गया था मगर नागपुर की राजनीति में उलझे रहने के कारण वे वहां नहीं आ सके। राज्य व्यवस्था वे दीवान नीलकंठ द्वारा करते थे। बाद में घोड़ों महादेव की नियुक्ति की गई।
मोहनसिंह मराठा शासन की एक सीढ़ी था, जिसे बिम्बाजी ने पूर्ण कर दिया। मराठों के एक विश्वास-पात्र सेवक के रूप में राघोजी प्रथम की मृत्यु के समय वह उपस्थित था और उनकी सेवा किया। मोहनसिंह ने लड़ने की मुद्रा बनाई। सैनिकों को एकत्र किया और अधिकार छीनने वाले संघर्ष की तैयारी की। 
मोहनसिंह बीमार पड़ा और मर गया। बिना किसी विरोध के बिम्बाजी भोंसले की छत्तीसगढ़ कार राज्य बिना किसी खून खराबी के प्राप्त हो गया। रतनपुर में मृत्यु 23 जनवरी 1757 ई. स्थानीय इतिहासकारों रेवाराम बाबू और पं. शिवदत्त शास्त्री ने लिखा है ‘‘बिम्बाजी को मोहनसिंह एंव राघोजी भांसले ने विरोध किया मगर वे सब हार गए’’।

मराठा आक्रमण के परिणाम- Maratha Akraman ke Prinaam


सन् 1741 में मराठों ने रतनपुर पर आक्रमण किया। इस आक्रमण ने छ0ग0 के भविष्य को परिवर्तित कर दिया। महान मुगलों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाला छ0ग0 मराठो के अधिकार में चला गया। सन् 1741 ई. में परिवर्तन की प्रक्रिया का प्रारंभ हुआ। अंचल में इस आक्रमण के परिणामों को निम्न शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है।

01. मराठे विजय हुए

सन् 1741 ई. में रतनपुर पर हुए आक्रमण का पहला परिणाम यह निकाला कि सैकड़ों सालों से छ0ग0 पर स्थापित कलचुरियों का राज्य समाप्त हो गया। विजयी मराठों ने पहली सफलता के साथ विजय अभियान को आगे बढ़ाया। पुराने कलचुरि राजा के स्थान पर नए व्यक्ति को रतनपुर का शासन भार सौंपा। यह नया व्यक्ति पुराने राजवंश की समाप्ति का प्रतीक था। सेनापति पंत मराठा सेना को विजय दिलाने में सफल हों।

02. कलचुरियों की दुर्बलता का ज्ञान

1741 ई. में मराठों की जय और कलचुरियों की पराजय इसी श्रृंखला की एक कड़ी थी। पराजय के कलंक से अधिक कलंक कलचुरियों को लगा। कलचुरियों की दुर्बलता का ज्ञान हुआ।

03. कलचुरियों का खजाना मराठों के अधिकार में

सन् 1741 में रतनपुर पर मराठों के आक्रमण का एक प्रमुख कारण मराठा सरदार रघुजी भोंसले की आर्थिक परेशानी थी। इस परेशानी के चलते ही बंगाल की राह पर पड़ने वाले रतनपुर पर आक्रमण किया गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि रघुनाथ सिंह से संधिवार्ता इसी मुद्दे पर अटक गई थी मराठे उनसे अधिक से अधिक धन ऐठना चाहते थे। संधि वार्ता के मध्य ही मराठों ने आक्रमण कर कलचुरियों को परास्त कर खजाने पर अधिकार कर लिया। 
ऐसी स्थिति में खजाने से नगद और सोना चांदी के जेवराज, बर्तन के रूप में 50 लाख रूपयों की प्राप्ति सहज ही अनुमान लगाई जा सकती है।

04. रतनपुर के नागरिकों से वसूली

कलचुरि राजा का खजाना लूट कर ही मराठों को संतोष नहीं हुआ। विजयी सेना पराजित क्षेत्र को लूटती है, मराठे इस मामले में ज्यादा की बदनाम थे। मराठों का इतिहास लूटमार का इतिहास रहा है। रतनपुर के समृद्ध नागरिकों को आमंत्रित कर मराठों ने नगर की लूट के एवज में धनराशि की मांग की। समझौता वार्ता का दौर चला और अंत में एक लाख रूपए नगद पर समझौता हुआ।

05. रघुनाथ सिंह पद पर बने रहे

मराठों ने रतनपुर को जीतने के बाद भी कलचुरि नरेश रघुनाथ सिंह को प्रमुख के रूप में रहने दिया। राजा के स्थान पर  उसे सामंत नरेश बनाकर छोड़ दिया। जिन रानियों ने सुलह का झंडा फहरा विजय को आसान बनाया था, उनके प्रति कृतज्ञता के भाव से पं. भास्कर पंत ने पुरानी व्यवस्था को ही आंशिक परिवर्तन के साथ चलने दिया हो। किसी ठोस आधार के प्रमाण के साथ कुछ कहना संभव नहीं है। रतनपुर का राजा अशक्त राजा बनकर छोड़ दिया गया था। सामंत राजा बनाकर छोड़ दिया गया था।

06. भास्कर पंत को रघुनाथ सिंह की आह लगी

सन् 1741 ई. में रघुनाथ सिंह पर मराठा सरदार भास्कर पंत ने धोखे से आक्रमण किया था, उसे पराजित कर अपमानित किया था। सन् 1741 में भास्कर पंत और बंगाल के अलिवर्दी खां की संधि हुई परंतु छलकपट के द्वारा अलिवर्दी खॉं ने सैनिकों के द्वारा मनकुटा नामक स्थान पर भास्कर पंत एवं उसके 20 सैनिक-सरदारों कों मार डाला।

07. रघुनाथ सिंह नियंत्रण मुक्त हुए

सन् 1741 ई. में भास्कर पंत ने रतनपुर के राजा को परास्त किया और रतनपुर पर अधिकार कर लिया। राजा को सामंत राजा बनाने को विवश किया अपने प्रतिनिधि के रूप में एक व्यक्ति छोड़ा। रघुजी को रतनपुर पर आक्रमण करना पड़ा और सन् 1741 में रघुनाथ सिंह का प्रकरण समाप्त हुआ। रायपुर शाखा के मोहनसिंह को रतनपुर का प्रबंधक नियुक्त किया गया।

मीर हबीब का आमंत्रण - Mir habib Amantran

छत्तीसगढ़ पर मराठों के आक्रमण का एक कारण मीर हबीब का मराठों को भेजा आमंत्रण था। मीर हबीब का बंगाल के तत्कालीन नवाब से नहीं पटती थी, उसने मराठों को बंगाल पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया।
रतनपुर पर आक्रमण
सन 1741 ई. में रतनपुर पर भास्कर पंत के नेतृत्व में मराठों का आक्रमण हुआ। प्यारेलाल गुप्त ने लिखा है - भास्कर पंत ने सेना सहित बुंदेलख्ांड होते हुए पेंड्रा की ओर से छ0ग0 में प्रवेश किया और ससैन्य रतनपुर पहुंचा और बिना प्रयास उसे उपने अधिकार से ले लिया।
भास्कर पंत को बंगाल पर आक्रमण का आदेश हुआ। भोंसलें की सेना बुंदेलखण्ड होते हुए बिहार, बंगाल जा सकती थी, या दूसरा रास्ता था पूर्व मार्ग की जो लांजी, दर्रे, रायपुर, सारंगढ़, संबलपुर, उड़ीसा होते बिहार का था। भास्कर पंड़ित सीधे बुंदेलखंण्ड पहुंचे।
बाबू गोकुल प्रसाद ने लिखा है - सन् 1741 ई. में जब मराठे छ0ग0 पर चढ़े थे, तब उन्होने अपना केन्द्र के किले को बनाया गया था। सन् 1741 ई. में तत्कालीन जमींदार राघोसिंह को जब वह रतनपुर किले का बचाव कर रहा था, मराठो ने मार डाला।
रघुनाथ सिंह की पत्नी लक्ष्मण कुं. वर और पदम कुंवर ने आपस में सलाह कर किले के बुर्ज से सुलह का सफेद झंडा फहराकर लड़ाई बंद कर दी थी। किलों के फाटक मराठों के लिए खोल दिये गए। मराठा सेना किले के भीतर घुस गई। राजधानी रतनपुर पर मराठों का अधिकार हो गया।
सन् 1741 ई में भोंसलों ने अपना पहला आक्रमण रतनपुर पर किया और किले को चारों ओर से घेर लिया। किला अत्यंत मजबूत था, इसलिए भास्कर पंत की सेना कुछ नहीं कर सकी परन्तु भास्कर पंत ने अपनी चतुराई से वहीं के लोगों को अपने वश में किया और किले का मुख्य द्वार फोड़कर वे अंदर घुस गए। अंदर भयंकर मारकाट हो गई। इस दृश्य का देखकर रघुनाथ सिंह की दोनों पत्नियों ने सफेद वस्त्र बताकर युद्ध समाप्त किया जिसके कारण भास्कर पंत ने युद्ध को रोक दिया शर्त के मुताबिक मराठों ने एक लाख रूपए हरजाने के रूप में वसूल किया।

रघुजी का ऋणग्रस्तता ..Raghu g ka Rindgrastata


रघुजी भोंसला सेना साहब सूबा के पद पर नियुक्त थे। मराठा प्रभाव विस्तार के दौर दौरा में उन्हें एक बड़ी सेना रखनी पड़ी थी। इस सेना के खर्च के लिए उन्हें ऋण लेना पड़ा था। सन् 1742 के लगभग भी रघुजी ऋणगस्त थे। ऋण से मुक्ति पाने का एक ही मार्ग था, वह था आसपास के राज्यों को लूटना। नागपुर से पूर्व दिशा के राज्यों को लूटने के उद्देश्य से सेना भेजी गई थी। छ0ग0 का पद्रेश शामिल था। यही कारण था कि कलचुरियों से कोई लड़ाई का कारण न होते हुए भी उकसाने वाली कोई कार्यवाही द्वारा न किए जाने के बावजूद मराठा सेना ने लूट उद्ेश्य से छ.गत्र पर आक्रमण किया। वास्तव में रघुजी ऋण मुक्त होन का उपक्रम कर रहें है।

छत्तीसगढ़ का उपजाउपन
आक्रमणकारी उसी अंचल पर करता है जो धनी इलाका हो। क्षेत्र उपाजाउ हो, जिससे लगान के रूप में प्रतिवर्ष राशि वसूल की जा सके। छ0ग0 के उपजाउ खेतों के बारे में मराठों को ज्ञात था। यहां की वन सम्पदा और उपजाउ खेत आक्रमण कारियों को आकृर्षित करते थे। छत्तीसगढ़ पर मराठों की शुरू से नजर थी, लालच भरी, वन पहाड़ो से आच्छादित यह अंचल यद्यपि धनी नहीं समझना जाता था, पर धान तथा वनोपज ने इसे लुभावना बना दिया था।
छत्तीसगढ़ का कमजोर शासक
रघुनाथ सिंह 1732 ई. में 60 साल की अव्यस्था में रजनपुर के राजसिंहासन पर बैठा। सन 1740 के लगभग उसका एकमात्र पुत्र मर गया। वे अत्यंत शोक संतप्त हो गए। रतनपुर के रघुनाथसिंह और रायपुर के अमरशहिदों के समय में मध्य प्रांत पर नागपुर के भोसलें का अधिकार हो गया था। उस समय मराठों से ठक्कर लेने में प्रायः भारतीय राजागण कांपते थे।
राज परिवारों में फूट

रायपुर शाखा में मोहनसिंह बड़े महत्वाकांक्षी थे। रतनपुर पर भी वं अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे। मोहनसिंह का नागपुर से सतत् संपर्क था। मराठों को रतनपुर पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया हो। कचलुरि शासकों की फूट का लाभ मराठों ने उठाया। 1745 ई. में रघुजी भोसलें ओर उनके साथ कलचुरि वंश का एक व्यक्ति जिसाका नाम मोहनसिंह था, इसी के द्वारा रतनपुर पर आक्रमण किया गया। 1741 ई. के आक्रमण के पीछे रतनपुर के मोहनसिंह का हाथ था।

मराठों की महत्वाकांक्षा...Maratha ka Mahatwakansha


शिवाजी ने जिस मराठा राज्य की स्थापना की थी, उसका सतत् विस्तार हो रहा था। हर मराठा सरदार राज्य का अधिक विस्तार करना चाहता था। 1734 ई. में सेना साहब सूबा के पद पर रघुजी को नियुक्त किया गया। उसे जो सनद दिया गया उसके अनुसार पूर्व में बंगाल तक भाग उसके क्षेत्र में शामिल था।

मराठा प्रभुत्व का विस्तार करना रघुजी का दायित्व बनता था। 1734 ई. में इसी महत्वाकांक्षी की परिपूर्ति के लिए बंगाल विजय करने मराठा सेना भेजी गई थी। मार्ग में छ.ग. का भाग था। भास्कर पंत ने इसे जीतने का निश्चिय किया।
छत्तीसगढ़ का उड़ीसा बंगाल मार्ग पर स्थित होना...
सन् 1741 ई. में बंगाल विजय के लिए मराठा सेना भेजी गई। मार्ग पर छ0ग0 का प्रदेश था। पीछे का भाग सुरक्षित रहे इस उद्देश्य से भास्कर पंत ने इसे जीता।

छत्तीसगढ़ में भोंसला शासन - CG Bhoshla Shashan

यह राज्य समृद्ध राज्य था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुगल बादशाह जहांगीर को वह एक लाख रूपए कर के रूप में तथा 80 हाथी भेंट स्वरूप दिए। कलचुरि नरेश कल्याण साय के पास 14200 सैनिक तथा 116 हाथी थे। आसपास के राजा इतनी सेना नहीं रख सकते थे। छत्तीसगढ़ उस समय समृद्ध शाली था। कलचुरियों की शासन पद्धति भी उत्तम थी।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी लगभग 1500 सालों तक सतत् शासन का प्रमाण मिलता है।
आक्रमण की सही तिथि
मराठा इतिहासकार सर देसाई के अनुसार आक्रमण प्रारंभ 1741 ई. के दशहरा दिवस से हुआ। दल के मुखिया भास्कर राव थे। बरसात के पश्चात् दशहरा के दिन से ही मराठों का आक्रमण प्रारंभ होता है। 1741 ई. सितंबर व अक्टूबर माह से आक्रमणकारी मराठा सेना छ0ग0 की ओर बढ़ी।

मराठा सेनापति भास्कर पंत कोल्हाटकर के नेतृत्व में छ0ग0 और बंगाल पर आक्रमण के लिए जो सेना भेजी गई।